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गुरुवार, 7 जनवरी 2021

2001...यात्रा के अनेक पड़ाव होते हैं...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया इंदु सिंह जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

यह बहका-बहका-सा मौसम 

कभी इतना बेईमान नहीं होता, 

खेतों में पानी की फ़िक्र नहीं 

किसान नहीं करेगा समझौता।

-रवीन्द्र सिंह यादव   

आइए अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर ले चलें-

फिर फटेंगे ज्वालामुखी फैलेगा लावा भी कहीं बैठा रह मत लिखा कर कोई कहे भी अगर लम्बी तान कर बैठा है... डॉ. सुशील कुमार जोशी

 

शरम बेच कर
मोटी खाल बेशरम
मोटी खालों के संगम के प्रबंधन का
बेमिसाल इंतजाम कर बैठा है

बैठने बिठाने के चक्कर में बैठा
कोई कहीं जा बैठा है
कोई कहीं जा बैठा है

*****

यात्रा ..इन्दु सिंह


यात्रा के अनेक पड़ाव होते हैं

कुछ अच्छे,कुछ ठीक तो कुछ बेहद बुरे।

पड़ाव न हों तो यात्री थकान से भर जाएँगे।

पड़ाव यात्रा के चलते रहने के लिए आवश्यक हैं।

*****

क्या ख़ूब दोस्ती है | ग़ज़ल | डॉ. वर्षा सिंह

 

यादों के जल रहे हैं ढेरों चिराग यूं तो

कहने को रोशनी है, नहीं है तो कुछ नहीं

मिट्टी के ख़्वाब मिट्टी में मिल गए तो क्या

इक फांस-सी लगी है, नहीं है तो कुछ नहीं

 *****

सीली-सीली शाम ... प्रीति समकित सुराना

जब खुद को रखना होता

है बेवजह की बातों में उलझाकर,

तब ध्यान भटकना तो दूर

पल भर को भी

कोई दूसरा खयाल भी

जेहन में टिकता ही नहीं,...

*****

आँसू क्षणिकाएं... कुसुम कोठारी


रोने वाले सुन आँखों में

आँसू ना लाया कर

बस चुपचाप रोया कर

नयन पानी देख अपने भी

कतरा कर निकल जाते हैं।

*****

 आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले गुरूवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव

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