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शुक्रवार, 19 मार्च 2021

2072... मेरी चिड़िया उड़ी नहीं...

 शुक्रवारीय अंक में

आपसभी का स्नेहिल अभिवादन--
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विचारों के विशाल
सिंधु की लयबद्ध
लहरें मथती रहती है
अनवरत,
मंथन से प्राप्त 
विष-अमृत के घटो का
विश्लेषण करता
जीवन नौका पर सवार 
'उम्र'...
सीमाहीन मन 
शापग्रस्त देह लिए...
नाव के पाल पर बैठे
अनजान पक्षी की 
भाषा में उलझकर
अक़्सर भटक जाती है 
मंजिल से 
भूलकर यात्रा का उद्देश्य।

#श्वेता

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आइये आज की रचनाओं का आस्वादन करें
-----
जब किसी मासूम मन का विश्वास टूटता है,उस पीड़ा को सहना 
आसान नहीं होता है सरल मन सहज स्वीकार नहीं कर पाता है सत्य। अत्यंत भावपूर्ण,मर्मस्पर्शी और मन को तरल करता जीवंत कथा-काव्य जिज्ञासा जी की लेखनी से -

बिछोह

चिड़िया ने रखी एक ख्वाहिश
गुड़िया से करी नन्हीं सी फरमाइश
थोड़ा बाहर निकालो न
बादल दिखाओ न

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प्रेम का रंग मन के कैनवास पर जीवन का सबसे
अनूठा चित्र उकेरता है।
  प्रिय के लिए प्रतीक्षारत
संपूर्ण समर्पित भावों को
 सहजता से अभिव्यक्त करती 
ज्योति खरे सर की रचना-
 
मुझे मालूम है
प्रेम के वास्तविक रंगों से
परिचय करवाने 
वह अजनबी जरूर आएगा
जब तक 
इंतजार के खूबसूरत
दिनों में
खुद को संवार लेती हूं----

-----/////-----

स्त्रियां जीवनभर अपना सर्वस्व
अपनों के लिए लुटाती है 
किंतु अभावों से जूझती, छोटी-छोटी जरूरतों के लिए मोहताज़, 
किस प्रकार दयनीय जीवन जी जाती है, कहानी कुछ 
भाग्यहीन स्त्रियों की,
 विह्वल करती  सुधा देवरानी जी
 रचना  में-

मन तोड़ पाई जोड़ , संचित करे जो आज
रोगन शिथिल तन ,  कुछ भी न सोहती

सेहत अनमोल धन, बूझि अब दुखी मन
मन्दमति जान अपन भाग अब कोसती।
-----/////-----

जीवन पथ की विपरीत परिस्थितियों और अबूझ पहेलियों को सहजता से स्वीकार करें तो यात्रा आसान हो जायेगी, यह भाव सरलता से अभिव्यक्त करती रेखा जोशी जी की रचना- 

 जीवन सफर


खुशी नहीं गम भी चलें संग संग

जीत नहीं, मिलती हार की ठोकरें भी

हो जाते हैं अपने भी पराये कभी

आंसुओं की होती है यहाँ बरसात भी

कंटीली राहों पर

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और चलते-चलते पढ़िये-

यह तेरा वह मेरा है, यह मोह-माया का फेरा है, सच को तुम भी समझो बाबू ,यह जीवन रैन-बसेरा है... जीवन के सबसे गूढ़ रहस्य का सार समझाती उर्मिला सिंह जी की रचना

प्राण पखेरू



मृग तृष्णा सदा छलती रही  उम्र को
भटकती काया बांहों में आसमाँ भरने को
अनमोल जिन्दगी निरर्थक ही रही जगत में
अंत समय कर्मों की भरपाई करते रहगये।।

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आज के लिए इतना ही
कल पढ़ना न भूले प्रिय
विभा दी के द्वारा संकलित विशेष अंक।
#श्वेता


शुक्रवार, 12 मार्च 2021

2065...ज़माने के हिसाब से बदलना जरूरी है

 शुक्रवारीय अंक में आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन-

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 लेखन आत्मसंवाद होता है मन के भावों का प्रतिबिंब। आत्मविश्लेषण जितना ज्यादा होता है विचारों की उज्ज्वलता उतनी ही मुखरित।

लेखन के बाज़ारवाद के सम्मोहन, कुछ पा लेने की होड़ से अलग भावनाओं को महसूसकर शब्द देने का प्रयास,जिससे शांति और सुख का अनुभव हो, स्वांतःसुखाय लेखन है शायद...।

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पढ़िए हमारे प्रिय चिट्ठाकारों की
विचारों की सघनता और समझिए 
कुछ कही-अनकही भावनाओं को-
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अपने आस पास की हलचलों को,
समसामयिक घटनाओं को महसूसकर बिना किसी को सीधा इंगित किये सारी बातें कहने की कला सुशील सर की
क़लम बखूबी जानती है। उनकी नयी रचना में पढ़िए 
मुखौटाधारियों के लिए विशेष संदेश-

खड़ा हो लेता है


तुम्हैं भी
जमाने के हिसाब से
बदलना जरूरी है
मेमने के बारे में किसलिये सोचते हो
भेड़िये को देखो
ध्यान मत भटकाओ

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नये शब्द प्रयोग और अपने अलग अंदाज़ में
मनोभावों को सलीकें से पेश करने का हुनर नासवा सर की गज़लों की पहचान है। नज़ाकत,नफ़ासत और रूहानियत को महसूस कीजिए, पढ़िए उनकी नयी ग़जल-

तीरगी के शह्र आकर छूट,परछाई गई



आसमां का चाँद, मैं भी, रूबरू तुझसे हुए,
टकटकी सी बंध गई, चिलमन जो सरकाई, गई.
 
यक-ब-यक तुम सा ही गुज़रा, तुम नहीं तो कौन था,
दफ-अतन ऐसा लगा की बर्क यूँ आई, गई.
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प्रकृति से जुड़ाव जीवन में नवीन उत्साह एवं सकारात्मकता का संचरण करते हैं।  अपने स्पष्ट विचार रखते हुए हर विषय पर गगन सर के लेख तर्क और तथ्यों के साथ
विषयों को स्पष्ट रखते हैं। पशु-पक्षियों से जुड़े उनके अनुभव मानवीय संवेदना का सुंदर रूप है पढ़िये उनके नये लेख में-


इतने दिनों के इनके साथ से इनकी आदतें, इनके खाने का अंदाज, खाते समय की सतर्कता सब धीरे-धीरे समझ में आने लगी हैं। जैसे की मैना खिलंदड़ी स्वभाव की होती है ! टिक कर नहीं खाती ! खाते-खाते कभी-कभी कुछ आवाज भी करती है ! ऊपर खाते हुए कुछ गिर जाता है तो नीचे आ चुगना शुरू कर देती है ! एक बार में ज्यादा नहीं खाती। कबूतर मस्त-मौला लगता है ! संगिनी खाती है तो कभी-कभी गर्दन फुला अलग खड़ा देखता रहता है ! खाता कम है, गिराता ज्यादा है ! औरों की बनिस्पत देर तक खाता है ! शायद खुराक ज्यादा होती हो ! कौवा झटके से आ कुछ खा, कुछ दबा झट से उड़ जाता है ! बेहद चौकन्ना रहता है। मिट्ठू मियाँ की बात ही अलग है। कम आते हैं, हरी मिर्ची का लालच देने के बावजूद ! टिंटियाते भी खूब हैं। पर उनसे ही सबसे ज्यादा रौनक लगती है।
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मन की वेदना को प्रभावशाली भावों में पिरोये हैं हरीश जी ने चिट्ठा जगत में स्वागत है आप जैसे नये क़लमकारों का।
आप भी पढ़िए और  उनकी रचना और उत्साह बढ़ाइये।


मेरे ख्वाब याद सांसो तक मे समाया था वो.. 
पल भर में ही बेवजह अलविदा कह गया 

लड़ रहा था खुदा तक से भी जिसे पाने के लिए 
खुदा कसम उसी के लिए सबकुछ चुपचाप सह गया
-----////----
 
अपने पूरे जीवन में हम सभी के लिए बचपन की स्मृतियाँ सबसे अमूल्य होती है। आधुनिक जीवन शैली में अनायास ही मन पीछे मुड़-मुड़कर उन नन्हें पाँवों के निशान दुलराता है। आप भी पढ़िए कितने कोमल भाव लिखे है ज्योति सिंह जी ने-

बचपन की हर तस्वीर



कच्ची मिट्टी की काया थी 
मन मे लोभ न माया थी ,
स्नेह की बहती धारा थी 
सर पर आशीषों की छाया थी ,

चिंता रहित बहुत ही मासूम सी जिंदगी लगती है 
बचपन की हर तस्वीर सुहानी लगती है।

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पौराणिक पात्र आज के संदर्भ में किसी के लिए प्रेरणा है,अनुकरणीय है,आदरणीय हैं तो किसी के लिए मात्र एक कथा।  प्रतिभा जी की लेखनी से निकली सहज,सरल अभिव्यक्ति भाव विह्वल करने के साथ मनोभावों की गूढ़ता को समझाने में भी सक्षम है आप भी पढ़िए उनकी समृद्ध लेखनी से- 

राग-विराग-7


मन में तर्क-वितर्क चलते हैं राम की भक्ति, संसार से विमुख नहीं करती, लौकिक जीवन के लिये एक कसौटी बन जाती है. सांसारिकता से कोई अंतर्विरोध नहीं. गृहस्थ के लिये तो राम-भक्ति ही ग्रहणीय है संयम और संतुलन रखते हुए आदर्शों के निर्वाह का संकल्प. राम की भक्ति सदाचार और निस्पृहता का सन्देश देती है. सांसारिक संबंधों रमणीयता ,नैतिकता का उत्कर्ष भावों की उज्ज्वलता, परस्पर निष्ठा और विश्वास और भी कितनी कोमल संवेदनाएँ  समाई है ..

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और चलते-चलते

हर विषय पर एक अलग सोच जिसमें आडंबर और कृत्रिमता का विरोध हो,समाज को खासकर युवावर्ग को 
सड़ी गली मानसिकता एवं परंपराओं से अलग और भ्रममुक्त
दृष्टिकोण प्रदान किया जा सके वहाँ सुबोध सर की लेखनी की धार देखते ही बनती है।
स्त्री पुरूष की समानता पर उनके विचार अगर आत्मसात किया जाए तो शायद स्त्रियों की दशा इतनी दयनीय न हो, उनकी  विचारणीय रचना के भाव स्पष्ट हैं-


अन्योन्याश्रय रिश्ते


बँटना तो क्षैतिज ही बँटना,
यदि हो जो बँटना जरुरी।
ऊर्ध्वाधर बँटने में तो आस
होती नहीं पुनः पनपने की।
है नारी संबल प्रकृति-सी,
सार्थक पुरुष-जीवन तभी।
फिर क्यों नारी तेरे मन में  
है भरी हीनता मनोग्रंथि ?
बस

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कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।



शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

2044... न आओ अब साथ मेरे

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।

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जीवन की 
सूखी लकड़ी की नोंक में
 सोयी नन्हीं-सी आशा
जब अंधेरी परिस्तिथियों की
ख़ुरदरी ज़मीं से रगड़ाती हैं
 पलभर जीने की चाह में 
 संघर्षरत 
 दामिनी-सी चमककर 
उजालों की दुनिया से
साक्षात्कार करवाती है।
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आइये आज की रचनाएँ  पढ़ते हैं-
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न आओ अब साथ मेरे 

बहुत दूर तक  ना तुम 
आ सकोगे  साथ  मेरे 
शून्य मैं ,शिखर हो तुम
कब आ पाओगे हाथ मेरे ;
मरीचिका  में व्यर्थ की 
 ना खुद को  छलने दो मुझे 
  न  आओ  अब साथ मेरे   
अकेले ही चलने दो मुझे !

चुप से आँसू  हँसी में क्यों छलके,
मुसकराहट ये खोखली ना हो.
 
नींद कमबख्त दूर है बैठी,
रात पहलू में जागती ना हो.
 
खुशबुओं से महक उठा मौसम,
तू कहीं पास ही खड़ी ना हो.


बालू पर लिखा एक नाम

बालू पर पसरने का मन हुआ 
भुरभुरी बालू पर 
दाहिने हाथ की 
तर्जनी से 
एक नाम लिखा 
सिंधु की दहाडतीं लहरें 
अपनी ओर आते देख 
तत्परता से लौट आया 



अगली सुबह 
अब उसी शाख पर 
नई सृजन देख रही हूँ 
छोटी-छोटी कोमल पत्तियां  
नन्हे शिशु के कोमल तन सा 
जन्म देकर नई रचना को 
 प्रकृति हमें समझाती है 


अनमनेपन का
प्रकृति से अथाह प्रेम
झलकता है 
उसकी आँखों से 
प्रेम में उठतीं  
ज्वार-भाटे की लहरें 

दीवारों सी फ़ितरत मिली है मुझे भी
कि रह कर भी घर में न रहता हुआ मैं 

धुआँ है या शोला, जो दिखता ग़ज़ल में
सुलगती कहानी है...कहता हुआ मैं




अंतराल के
नीरव
रौरव को
नयन नीर से
अंतस ही में
धीरे धीरे
पाट रही हूँ 

उस सोख्ता कागज पर अगर स्याही वाली पेन की निब हल्के से टच कराते थे तो स्याही की एक बूंद उस पर बन जाती थी ,फिर वह बूंद धीरे धीरे चारों ओर वृत्ताकार शेप में फैलने लगती थी। उस वृत्त की न कोई सीमा न कोई परिधि न कोई अंत होता था।

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विभा दी के द्वारा संयोजित 
कल का अंक पढ़ना न भूले।
-श्वेता

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

2023 ...विषैले सांप कुचले जायेंगे,ये मेरा वादा है

शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
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चश्मों से
परावर्तित होकर
बनने वाले परिदृश्य
अब समझ में नहीं आते 
तस्वीरें धुंधली हो चली है
निकट दृष्टि में आकृतियों की
भावों की वीभत्सता से
पलकें घबराहट से
स्वतः मूँद जाती हैं,
दूर दृष्टि में
विभिन्न रंग के
सारे चेहरे एक से... 

#श्वेता

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आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-

सोचों की रोशनदानविहीन वातानुकूलित कमरों में मानो ऐ साहिब!
अपनापन की गौरैयों का पहले जैसा रहा आवागमन भी अब कहाँ ?
रूहानियत बेपता, रुमानियत लापता, मिलते हैं अब मतलब से सब,
प्यार से सराबोर जीता था मुहल्ला कभी, वो जीवन भी अब कहाँ ?



सोन चिरैया सुख सपना
विकट विदाही विकलता
कली से कमलिनी का क्लेश
क्षण-क्षण क्षत हो छलकता


यूं ही नहीं आता वसंत
लड़नी होती है, लंबी लड़ाई
धूप को
कोहरे के साथ।

मेरी गलियों की मिट्टी से, तुम्हारी सांस रुकती है 
खिले हर फूल की खुशबू, तुम्हारे दिल में चुभती है 
मगर जो ठान बैठे हैं,वो भागीरथ इरादा है 
विषैले सांप कुचले जायेंगे,ये मेरा वादा है 



भाग्य में शून्य स्तूप आया,
बदल दे हाथ के लकीरों
को, ऐसा कोई
मेहरबाँ न
मिला,
ज़िन्दगी जीने के लिए, सभी
दौड़े जा रहे हैं बेतहाशा,
नए दिन के साथ
नए षड्यंत्र,
वही

लुहार


पास ही की सीट पर बैठे एक हेंडसम नौजवान ने हाथ का इशारा किया और लड़की को अपनी सीट दी,हल्की मुस्कान के साथ दोनों ने एक-दूसरे का स्वागत किया। लड़की अब सहज अवस्था में थी। सीट मिलते ही वह अपने आपको औरों की तुलना में बेहतर समझने लगी।
....
कल मिलिएगा विभा दीदी से

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

2016...मोम की दीवार थी पिघल गई

शुक्रवारीय अंक में आप सभी का
स्नेहिल अभिवादन
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पढ़ने के क्रम में मिली एक गज़ल
 आपको भी अच्छी जरूर पसंद आयेगी -

जो दिख रहा है सामने वो दृश्य मात्र है।
लिखी रखी है पटकथा मनुष्य पात्र है।।

नये नियम समय के हैं असत्य सत्य है,
भरा पड़ा है छल से जो वही सुपात्र है।

विचारशील मुग्ध है कथित प्रसिद्ध पर,
विचित्र है समय,विवेक शून्य  मात्र  है।

है साम-दाम-दंड-भेद का नया चलन,
कि जो यहाँ सुपात्र है, वही कुपात्र है।

घिरा  हुआ  है  पार्थ  पुत्र चक्रव्यूह में,
असत्य  सात  और सत्य  एकमात्र है।

कहीं कबीर, सूर की, कहीं नज़ीर है,
परम्परा से धन्य ये गज़ल का छात्र है।
©आलोक श्रीवास्तव 
------//////------
आइये अब आज की रचनाएँ पढ़ते हैं 

अवशेष 

चाय की चुस्कियां
आराम कुर्सियां
वैचारिक उल्टियां
प्रायोजित संगोष्ठियां
मुक्ति की बातें
विद्रुप ठहाके

एक मोती क्या जो टूटा उस माल से

कौन रुकता यहाँँ है किसी के लिए
सोच उसकी भी आगे निकल ही गई
तेरे जाने का गम तो बहुत था मगर
जिन्दगी को अलग ही डगर मिल गई


ज़िंदगी भी रेत-सी फिसल गयी

मुस्कुराए हम भी वो भी हंस दिए,
मोम की दीवार थी पिघल गई.
 
रात भर कश्ती संभाले थी लहर,
दिन में अपना रास्ता बदल गई.


एक चोर का डैमेज कंट्रोल

प्रश्न
प्रश्न होता है
क्या होता है
अगर किसी को
बता दिया जाता है
किसने बताया
किसको बताया
किसलिये पूछना चाहता है


एज़िज्म

एजिज्म'' यानी आयुवाद या बुजुर्गों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता, वृद्धों के प्रति अनुचित व्यवहार ! उनके रहन-सहन, चलने-फिरने, बातचीत करने का मजाक उड़ाना, एजिज्म कहलाता है ! उम्रदराज लोगों को बेकार मानना, यह सोचना कि घूमना, फिरना, शॉपिंग, प्यार, मोहब्बत और नए नए शौक रखना यह सब उनके लिए नहीं हैं ! यानी उम्र की वजह से भेदभाव करना एजिज्म के अंतर्गत आता है ! विश्व में पहले से ही पांव पसार चुकी यह धारणा, भावना या प्रवृत्ति अब धीरे-धीरे हमारे समाज में भी पैठती जा रही है ! वृद्ध लोगों को मुर्ख, व्यर्थ और मन के जड़त्व का पर्याय ठहरा दिया गया है ! युवा लोग काफी गंभीरता से मानने लगे हैं कि एक निश्चित समय के बाद स्मार्ट, पारंगत, सफल व सुंदर होना असंभव होता है ! 
....
कल का अंक मेें 

विभा दी की अनूठी प्रस्तुति

सादर


-श्वेता सिन्हा

 





 

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

1981 ...कई उलझन खुद-ब-खुद सुलझ जाती है

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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वर्ष भर का हिसाब-किताब 
सारे महीनों के क्रियाकलाप,
रंग,धूप,सीलन, नमी गुनता
अपने हिस्से की ओस चुनता,
भारी स्मृतियों के थैले लादे
नयी उम्मीद के करता वादे,
भावहीन समय की सीढ़ी उतरता
 दर्द की परतें छिल रहा है
साल हज़ार बीस के कैलेंडर में
दिसंबर बचे दिन गिन रहा है...।

#श्वेता

आइये आज की रचनाओं का आस्वादन करें।


रसहीन उत्सव

सुबह से शाम तक
रात में भी सोने के पहले
एक चिंतन कि
कल की कल-कल
मन में असंतोष
खुशियाँ सारी समाप्त,

दर्द होंठों में दबाकर


उम्र भर संघर्ष करके
रोटियाँ अब कुछ कमाई
झोपड़ी मे खाट ताने
नींद नैनों जब समायी
नींद उचटी स्वप्न भय से
क्षीण काया जब बिलखती
दर्द होठों में दबाकर
भींच मुट्ठी रूह तड़पती...


चालाक चिड़ियाँ

चिड़िया फिर आई
प्याले पर बैठी,
इधर-उधर मुंडी हिलाई,
पूँछ उठाई फिर फुदककर 
कूद गई प्याली में!
फर्र-फर्र पंख फड़फड़ाती,
छींटे उड़ाती
पानी से
खेलती रही देर तक।


सपनों का अपराध नहीं है



चुटकी भर शब्दों की चाहत कोई विशद ग्रंथ हो जाना 
रहे व्याकरण से अनजाने संज्ञा क्या है और क्रिया क्या
क्या सम्भव है परिणति उनकी,किसने देखे नयन संजोए
जिन सपनों को कोई परिचय अपना भी मिल नहीं सका था 


नानी का लालटेन

बहुत दिन बाद आज जब मैं
अपने ननिहाल गई तो
आज भी खूंटी पर टांगा 
वो लालटेन देखा
जिसे नाना जी बड़े ही
प्यार से लाए थे नानी के लिए
कहते थे तुम्हारी आंखेंं


क्यूँ हुए विचलित


क्यूँ हुए  विचलित तुम
किसी ने तुम्हारा दिल तो नहीं दुखाया  
या मन  की गहराई में
कोई  बुरा ख्याल आया  |

"उलझन-सुलझन"


" यदि जीवन में  आपको कोई

सच्चा दोस्त मिल जाएं तो 

जीवन की आधी समस्याएं तो

यूँ ही समाप्त हो जाती है, 

कई उलझन खुद-ब-खुद सुलझ जाती है।"


-----////----////-----

कल पढ़िए विभा दी के द्वारा

संकलित विशेष अंक


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