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बुधवार, 12 अगस्त 2026

4832..मेरे हिस्से का स्पंदन

 ।।प्रातःवंदन ।।

कौन शासन से कहेगा, कौन समझेगा,

एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है।

~ दुष्यंत कुमार

प्रस्तुतिकरण के क्रम को आगे बढ़ाते हुए..

दोगलेपन पर तंज़




कैसे बेच देते हैं लोग चंद सिक्कों में ज़मीर को,
जहाँ फ़ायदा हो, वहीं झोंक देते हैं मोम-से शरीर को।

कल दिल्ली के आंदोलन के बच्चे दिख रहे थे सभी को,
आज झारखंड के बच्चे अकेले पार कर रहे शमशीर को।

                                ✨️


उंगलियों के बीच पहले उसे खूब मरोड़ा जाता है 

तब कहीं जाकर तागे को सूई में डाला जाता है।

कर्णधार देश का जिसे बताते हैं सभी सयाने

उसी युवा को सड़क पर सरेआम रघोड़ा जाता है।

✨️

एक प्रेयसी का रोष 

तुम्हारे इन निर्जीव तंत्रों से,

अब मुझे ईर्ष्या सी होने लगी है

मेरे हिस्से का स्पंदन, मेरे हिस्से की भोर,

यह निष्ठुर 'स्क्रीन' हर दिन निगलने लगी ह

​तुम कहते हो, "यह हमारे कल के लिए है,"

स्वर्णिम भविष्य की इस क्रूर वेदी पर,

तुमने हमारे हँसते हुए आज को बलिदान किया

✨️

मेरी श्रेष्ठ लघुकथा : वर्ष 2025 - स्व-मूल्यांकन के आधार पर रचनाकारों द्वारा चयनित श्रेष्ठ लघुकथाओं का संकलन

 https://laghukathaduniya.blogspot.com/2026/06/2025.html?m=1

✨️

झर रहा बारिश का मौसम 
कर रहे श्रृंगार झरने 
चल पड़े बादल यहा पे 
सिंधु से जल को है भरने..
✨️
।।इति शम।।
धन्यवाद 
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत आभार, आज के इस बेहतरीन अंक में मेरी रचना *दोगलापन पर तंज* को शामिल करने के लिए 🙏

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