सादर अभिवादन
बरस रहा है पसीना
टप टप, टप टप.
नौतपा का चौथा दिन
रचनाएं
दीवारों से नहीं बना है
असली घर है रिक्त आकाश,
वातावरण विशुद्ध बना लें
अंतर से उमड़ पड़े प्रकाश !
वायु शुद्ध हो, प्राण शुद्ध हों
भाव विमल मुस्कान सजीली,
घर के भीतर रहने वाला
हर इक छेड़े तान सुरीली !
"चलो प्रिया, अब आज का काम तो बहुत अच्छे से मुकम्मल हो गया," आकाश ने गहरी साँस लेते हुए मुस्कुराकर कहा. "अब बताओ, इस खूबसूरत फोर्ट एरिया को एक्सप्लोर करने का तुम्हारा क्या प्लान है?
प्रिया ने अपने बैग को कंधे पर संभाला और आकाश की ओर देखकर आत्मीयता से मुस्कुरा दी.
जीवन की राह सँवारी,
छाँव सुला देती।
जलते पथरों पर
नंगे पाँव चलना सीखा,
हौसले खिल उठे।
बरस रहा है पानी रिमझिम,
तर हो गई है सूखी मिट्टी,
जुताई के लिए तैयार हैं खेत,
अब गूंजना चाहिए फ़ज़ाओं में
उल्लास में तर संगीत।
आशंकित जीव है मनुष्य
एक आम धारणा है कि यदि मैंने उपासना नहीं कि तो ईश्वर नाराज हो मुझे और मेरे परिवार को दंडित कर देंगे ! यह डर तो बचपन से इंसान के मन में बैठ जाता है, पर वह यह भूल जाता है कि प्रभु हम सबके पालनहार हैं, न्यायप्रिय हैं, दयालु हैं, बेवजह वे किसी को दंड नहीं देते ! हमारे कर्म ही हमारा भाग्य निर्धारित करते हैं ! पर अनहोनी का डर उसके दिलो दिमाग पर ताउम्र हावी रह उससे कुछ ना कुछ उल्टा-सीधा करवाता ही रहता है ! देखा जाए तो यह भी तो प्रभु की इच्छा अनुसार ही होता है...!
सादर समर्पित
सादर वंदन




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