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शनिवार, 16 मई 2026

4744 ..पीड़ा से ही परिचय था जब गुरु आनंद मित्र बन आया

 सादर अभिवादन



पिछले 10 दिन तक हम सब अपनी श्वेता के पितृ शोक शामिल थे, कल लगभग महीने भर बाद
शांत हृदय से  श्वेता ब्लॉग जगत में पुनः आई 
अपनी वेदना 
 लेकर, उनकी इस लेखनी को नमन...

.....लिखा नहीं जा रहा था उनसे
अनुभव नहीं न था उनको अपनी पीड़ा को व्यक्त करते उनकी लेखनी लड़खड़ा रही थी
 
धीरे-धीरे मन पर एक संवेदनहीनता का परत चढ़ा रही है। 
पिछले कई दिनों से ऐसा लग रहा है कि मैं किसी श्मशान के प्रतीक्षालय में बैठी हूॅं।
तीव्र होती मृत्यु की गंध धीरे-धीरे मन पर एक संवेदनहीनता का परत चढ़ा रही है। 
पापा की अनगिनत बातें,उनकी यादें दिल-दिमाग से लगाए बस सोचती रही 

और रात को अस्पताल से वापस लौटकर थोड़ा सा लेटी ही थी कि CCU  से
फोन आ गया कि "आ जाइये"।
पापा चले गये...
आधी रात को जब पापा को बर्फ़ पर लिटाकर लौटे तो मन 
उन्हीं के पास मंडरा रहा था कैसे रात बीती कब सुबह हुई कुछ पता नहीं चला।
पढ़िए और महसूस कीजिए उनके दुःख को....
***



चाहे हो कोई ऐरा-गैरा, या हो कोई खास यहाँ,
वक़्त पड़ने पर एड़ियाँ रगड़नी पड़ती हैं बेसाख्ता यहाँ।
गर की किसी ने ऐसी-तैसी, तो मान-सम्मान सब जाता है,
पर जो सबको एक लाठी से हाँके, वही असल में पछताता है।




तभी उसके फोन की स्क्रीन चमक उठी. आकाश का मैसेज था. "प्रिया, तुम्हें आज मुंबई में फिर से देखा तुम्हारा सुबह जल्दी उठकर बोरिवली स्टेशन पर मुझे लेने आना, अपने घर ले जाना, फिर रामजी का मेवाड़ भोजनालय, तुम्हारा मीटिंग में समय से पहुँचने का जुनून और फिर वे बब्बन भाई जो मुझे छोड़ने आए. इन सब के बीच तुम्हारे व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू आज मैंने देखा, तुम कुछ अपरिचित सी लगने लगी. तुम्हारे इस रूप ने मुझे गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन उसे देख मन कुछ भय भी पैदा हुए. उनपर मिलने पर बात करेंगे. उम्मीद है तुम्हारी मीटिंग सफल रही होगी."

मुस्कुराते हुए मैसेज का जवाब टाइप करने लगी— "मीटिंग सफल रही, आकाश. हम बात करेंगे लेकिन ये मुंबई अभी तुम्हें और भी बहुत कुछ दिखाएगी."





मुद्दत से दिल में थी प्यास 
जाने कब पूरी हो आस 
मिल कर जब बैठेंगे पास 
बाटेंगे खुशियाँ तब ख़ास !







धूप के ज़ेवरों से घर सदा जगमगाऊँ मैं, 
तपिश-ए-दहर से आँगन को बचाये हूँ।

किरन की ओट में रखकर मैं साया बुन रहा हूँ, 
नज़र से धूप की हर चाल को उलझाये हूँ।





पीड़ा से ही परिचय था जब 
गुरु आनंद मित्र बन आया,  
ह्रदय को श्वासों की डोर में 
पिरो के चारु हार बनाया ! 




यूँ तो मेरे पास अपना कुछ भी नहीं, आजन्म निःस्वता ही
है मेरी पहचान, फिर
भी वो कहते हैं
मेरे पास
है अंतहीन सपनों की ज़मीन
और एक मुट्ठी भर
आसमान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान ।
***
सादर
कल मिलिएगा भाई रवीन्द्र जी से
वंदन

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