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सोमवार, 18 मई 2026

4746..समसामयिक आंधी तूफानों के चलते जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है

 सादर अभिवादन
प्रि-मानसूनी बारिश औ समसामयिक आंधी तूफानों के
चलते जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है
और इससे अछूता नेट-वर्क भी नहीं
क्या तेल क्या तैलोपरि व्यवस्थाओं के चौपट होने चलते
हम भी पिट गए
-रचनाओं पर नज़र डालें



लोग बताते हैं कि
मरने से ठीक पहले तक
वह जिंदा था—
क्योंकि
उसकी साँसें चल रही थीं,
वह चल रहा था।





"सर, बजट के हिसाब से कुछ 1BHK मैंने शॉर्ट लिस्ट किए हैं, वे इन्हीं तीनों इलाकों में हैं. मुंबई में जगह छोटी मिलती है, लेकिन यहाँ लाइफ बड़ी है" संदीप ने अपनी पेशेवर मुस्कान के साथ कहा.

आकाश को संदीप ने डेढ़ बजे तक तीनों इलाकों में करीब सात फ्लैट दिखाए. अंत में उसने अंधेरी की एक सात मंजिला इमारत की तीसरी मंजिल के एक फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर भीतर कदम रखा. कमरा इतना छोटा था कि कोटा या जयपुर के किसी बड़े मकान का छोटे से छोटा कमरा भी इससे बड़ा होता. दीवारें सीलन की हल्की गंध और मुंबई की हवा की नमी से भरी थीं. उसने खिड़की खोलकर बाहर देखा—सामने इमारतों का एक अनंत जंगल था, जिसमें हर खिड़की के पीछे एक अलग संघर्ष चल रहा था.





मंत्री जी सड़क पर सरपट दौड़े जा रहे थे।तीन-चार अधिकारी छाता लिए उनके पीछे-पीछे भाग रहे थे।सूरज सिर पर चमक रहा था पर मंत्री जी की चमक के आगे वह भी पस्त दिखाई दिया।भोलू यह सब देखकर भौंचक था।उसने अपनी ज़िन्दगी में देवताओं को कभी धरती पर उतरते नहीं देखा था।आज यह सब देखकर उसकी आँखें फटी जा रही थीं।उसे लगा कि जीते जी देवता ज़मीन पर आ गए हैं।
यह सड़क पर उतरना भर नहीं है।यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई पुण्य-स्नान के लिए नदी में उतरता है।मैंने जीवन में सिर्फ़ त्याग सीखा है।चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र का त्याग करना पर्याप्त नहीं था,सो अब अपना काफिला भी त्याग रहा हूँ।काफिले में पहले चालीस गाड़ियाँ चलती थीं,अब मात्र चार हैं।ये गाड़ियाँ भी मुझे कार्यकर्ताओं ने दे रखी हैं।मेरा कुछ नहीं है।मैंने मंत्रिपद के अलावा सब त्याग दिया है।’


परिवार - हाइकु


बने समाज 
सशक्त औ’ सुदृढ़ 
परिवारों से 

जो कुछ पाया 
उपकार मानते
परिवार का 





सादर समर्पित
सादर वंदन

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