शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं रविवारीय अंक में पाँच रचनाएँ-
राजर्षि कहें अब राम से,
अभी शेष है युद्ध कला।
आह्वान ही दिव्यास्त्रों का,
अरु प्रयोग है युद्ध कला।।
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किताबें गुदगुदाती हैं, हँसाती है
कभी-कभी सच को छिपाकर
खेल खिलाती हैं।
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सजाया तुमने वफ़ा का रिश्ता मेरी ही कामयाबियों से,
मैं हारा तो तुम जुदा हुईं—दिल फिर भी तुम पर लुटा हुआ है।
तुम्हारे लहजे से साफ़ ये लगता सलीक़ा छूटा हुआ है।
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मोबाइल पर बहुत कुछ अच्छा भी
होता है
प्रात उदित नवजीवन की बेला यूँ खिलती
रेशों रेशों, धानों धानों
छिटक तिनके
अंक भर अपने प्रात लेती, हिये की संवेदी
निकृष्ट विचार न मैल रहे,
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
अच्छा संकलन है यह रवींद्र जी। 'काव्य कूची' की उत्कृष्ट कविताओं को 'पांच लिंकों का आनंद' में स्थान नहीं दिया जाता है जो न्यायोचित नहीं लगता। कृपया इस ओर ध्यान दें।
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