शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ. जेन्नी शबनम जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच चुनिंदा रचनाएँ-
यक़ीन की
धरती कब-कब हिली
आसमाँ से दुःख की बदली कब बरसी
यादों के पिंजरे में हर अनकहा पड़ा है
मेरा मन ही है जो सब जानता है
उम्मीद की हवा झुलस गई
मोहब्बत की शाख टूट गईं
*****
हम मिले
गिरजे की उन सीढ़ियों पर
जहां न
जाने कितने नाउम्मीद
लोगों के
कदमों के निशान थे
कितनी
उदासियों का ठौर था
कितने
कनफेशन सर झुकाये बैठे थे
*****
झांकता, कभी खिड़कियों से,
जाग उठता, कभी पवन की झिड़कियों से,
शाख की, रंगीनियों से,
पर, रूबरू हो न सका, उन टहनियों से,
झूलती, उनकी पत्तियों से,
कब हुआ जीर्ण, टूटकर शाख से, वो कब गिरा!
पता ही ना चला....
व्यस्तताओं से रहा, इक गिला,
कब हुआ रंगी, शाम का बादल, कब दिन ढ़ला!
पता ही ना चला....
*****
अश्वत्थामा
बेचारा।जीने को अभिशप्त। हाँफ रहा है बुरी तरह । आधा जागे। आधा सोये।
राजा जनक को देखता है। महर्षि अष्टावक्र के चरणों पर। अपने सपनों का अर्थ पूछते।
कौन सच । वह सच। या यह सच!
*****
फिर मिलेंगे।