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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

4641कभी न चाहते हुए भी कुछ लिखना जरूरी हो जाता है

 सादर अभिवादन 

आज भाई रवींद्र जी को आना था
हम उठ गए तो ..

सभ्य होने का मतलब
यह नहीं कि कोई आपको शासित करे।
नर्मी भी एक शक्ति है।
और कभी-कभी—
चले जाना,
छोड़ देना,
सबसे बड़ा साहस होता है।




“कुछ नहीं, बस यूँ ही.” आयुष को सामने देखा तो मम्मा ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया. पूछने लगी, “कैसा है? तेरी शकल कैसी हो गयी है? तू ठीक से खाया पिया कर. दस-पाँच दिन में जब भी पापा कोटा आएंगे तेरे लिए चाची से बनवा कर बेसन के लड्डू और मठरी भिजवा दूंगी.

माँ के स्नेह से आयुष की आँखें भी नम हो गईं. शगुन ठीक थी. उसका लक्ष्य आईआईटी एंट्रेंस क्रैक करना है, न कि बीच के टेस्ट.

तभी पापा ने कहा, “माँ बेटे का मिलन हो गया हो तो, चल कर चाय पी लें? आगे भी चलना है.”





पास ही पहाड़ की बाहों में
लिपटे घर से
नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर 
गूँज उठता है -
“लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,
हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,
मायें मेरिये, शिमले दी रावें,
चम्बा कितनी दूर…, 
चम्बा कितनी दूर…!”






आज के दिन तुम्हें याद करना
सबसे जरूरी है
क्योंकि
आज भी वैसे ही दिन हैं
जैसे तब थे जब तुम थे
‘उलूक’ नतमस्तक है तेरे सामने
जब तू नहीं है
राष्ट्रपिता बापू
आज ही नहीं हर दिन तेरा दिन है
नमन |





अपनी नासिक से कानपुर की यात्रा के दौरान मुझको अपने ही कंपार्टमेंट में कुछ अग्निवीरों से मुलाकात करने का मौका मिला। बोगी में हम दूर थे लेकिन कानपुर में उतरते समय हम सब एक ही गेट पर खड़े थे तो मैंने सोचा कि उनके कुछ अनुभव और उनके अपनी नौकरी के प्रति विचारों को साझा किया जाए. वह जो अग्निवीर बने वे बहुत ही संतुष्ट है और सरकार की भविष्य की नीतियों के प्रति भी उनके अंदर एक आश्वासन है, जो उन्हें एक सुरक्षित भविष्य देगा।


बस
वंदन

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