निवेदन।


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रविवार, 27 मई 2018

1045.....नोच ले जितना भी है जो कुछ भी है तुझे नोचना तुझे पता है

सादर अभिवादन..
आज सत्ताईस मई...
भारत के प्रथम प्रधान मंत्री
माननीय जवाहरलाल नेहरू का निधन
शत-शत नमन
अलग-अलग कहानियाँ
भिन्न-भिन्न दन्त कथाएँ
किसे मानें और किसे न मानें...
बीति ताहि बिसार दे की तर्ज पर आगे बढ़ें...

मन में कुछ आशंका जन्मीं - "कहीं किसी ने उसे दुत्कार कर भगा तो नहीं दिया? भीड़ देखकर वो दूर तो नहीं चली गयी? नहीं-नहीं!" इतने में भीड़ को किनारे करती बुढ़िया विमलेश को पिलाने अपनी चीनी के पानी वाली पन्नी लेकर आयी। झर-झर बहती आँखों से विमलेश स्ट्रेचर पर लड़खड़ा कर खड़ा हुआ...और  बुढ़िया को सैल्यूट करने लगा। 


हर रोज की तरह आज भी 
शाम ढलते ही
रात आयी 
धीरे धीरे
अपनी मुट्ठी बन्द किये
बडी बेसब्री से मिली उससे
कुछ न सूझा
बस गले लगा लिया 


मेरी फ़ोटो
छूटा जो  हाथ एक बार दुनिया की भीड़ में ।
ग़लती हो अपने आप से तो गिला नहीं करते ।।

आंधियों का दौर है , है गर्द ओढ़े आसमां ।
चातक को गागर नीर हम पिला नहीं सकते ।।


थी इक खुशी की मुझको तलाश,
दर्द इक पल का भी, मुझको गँवारा न था,
यूं ही आँखों से कोई बेकरार कर गया,
बस ढ़ूंढ़ता ही रहा, मैं वो करार,
दर्द का आलम, वो ही बेसुमार दे गया....


‘उलूक’ आज 
फिर नोच ले 
जितना भी 
नोचना है 
अपनी 
सोच को 
उसे भी 
पता है 
तू जो भी 
नोचेगा 
अपना ही 
अपने आप 
खुद ही नोचेगा । 

आज अब अतिक्रमण नहीं न करना है
आदेश दें
यशोदा







शनिवार, 26 मई 2018

1044... शोर



श्रेष्ठता की इच्छा कई बार कला को युद्ध में बदल देती है @अजंता देव

Ek kavita roz sir par aag by Kailash Gautam

रौशनी का वादा करते रहो
तारीफों के कसीदे पढ़े जाते रहेंगे,
लोग भूल जायेंगे अपनी तकलीफ
तब कोई नहीं देखेगा तुम्हारी तरफ
जब सचमुच चिराग जलाओगे। @दीपक भारतदीप

सजाए सितारों की बाज़ी
तड़ित तरंगे सी दौड़ती
ढ़लती सर्दी की शाम
सीखता समझता पयाम
साँसें खिंचता युवा कयाम
कल बागवान होगा गृहाराम

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

हित नहीं सधा जीत नहीं मिला
गीत नहीं सधा मीत नहीं मिला
सोर से उखड़ने का है मच गया
शोर

नहीं! पागल नहीं हुई हो तुम। बस, परेशान हो।
एक अरसे से सो नहीं सकी हो। कुछ बेचैन हो।
जाने क्या मचलता रहता है तुम्हारे भीतर।
तुम ने अपनी एक दुनिया रच ली है और उसी को सच मानती हो।
शहर की मसरूफियत और आपाधापी की वह दुनिया तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती।
उससे दूर होने को हम यहां आए, लेकिन तुम
उस दुनिया को यहां भी अपने साथ ही ले आई।


क्रांति ,कविता या शोर

भारत में इस समय हिन्दू धर्म में लाखों सन्यासी, मथाधीस, महामंडलेश्वर,
शंकराचार्य, बापू आदि लगातार आचरण सुधार का प्रवचन दे रहे हैं,
लेकिन भक्तों पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है. इसलिए कि
प्रवचन करने वाले का आचरण उनके उपदेशों के विपरीत है.
अब भला कोई व्यक्ति किसी सन्यासी अथवा शंकराचार्य को
भौतिक वस्तुओं के सभी प्रकार के सुख का भोगना देख रहा हो और
पाई-पाई का हिसाब रख रहा हो. दर्जनों-सैकड़ों आलिशान मठ,
आलिशान गाड़ियाँ लिए घूम रहा हो तो भला
उसके द्वारा भूंके गए उपदेश कैसे असर करेंगे

शोर

खून पसीने को बरबाद होते देखता रहा
बिटिया का दाखिला,मोनू का खिलौना,
एक इज़्ज़त और सुकून की ज़िंदगी
जैसे सब कुछ
सब कुछ कुचल दिया था
उस बेरहम बारिश ने अपने पैरों के तले
वो ज़ोर ज़ोर से चीखकर रोता रहा

शोर

भीड़ विपदा होती है
जो गिर पड़ती है मनुष्यता पर
जिसे रोका जा सकता है सिर्फ मनुष्य हो कर

भीड़ बड़ी कारगर है
मंदिरों-मस्जिदों-गिरजों-गुरुद्वारों में
कच्चा माल है भीड़
भीड़ कच्चा माल है उन्माद के लिए
भीड़ ईधन है सियासत का
भीड़ में फंसी अकेली लड़की याद है

शोर

शोर वेदना की पीड़ा
शोर हृदय का स्पंदन
शोर मदिर नर्तन छुंन छुंन
शोर सुरभि का है वंदन ।


><

हम कर क्या सकते हैं... फिर मिलेंगे

आज की पोस्ट नहीं समझ में आये
मचने वाली है झन्नाटेदार शोर

हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम बीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:: ज्येष्ठ की तपिश (तपन) ::
उदाहरणः
आज भूनने लगी अधर है ,
रेगिस्तानी प्यास।

रोम रोम में लगता जैसे ,
सुलगे कई अलाव ।
मन को , टूक टूक करते,
ठंडक के सुखद छलाव ।

पंख कटा धीरज का पंछी ,
लगता बहुत उदास।

रचना की कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं
यह रचना गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश' की लिखी हुई है

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना आज
 शनिवार 26 मई 2018 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
 चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
28 मई 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें




शुक्रवार, 25 मई 2018

1043..तप्त शिलाओं को सिक्त बूंदों से सहला

रचनाकारों की लेखनी समय -समय पर समसामयिक 
गतिविधियों पर,सामाजिक मूल्यों पर ताथ अन्य मुद्दों पर 
सक्रिय रही है।किसी भी विषय के संदर्भ में एक लेखक के 
विचार पक्ष या विपक्ष में हो सकते है पर लेखन के किसी भी 
जाति या धर्म से परे,निष्पक्ष,स्वतंत्र और व्यापक दृष्टिकोण 
से ही  सार्थक रचनात्मकता का जन्म होता है।

हाँ, यह सही है कि अपनी आत्मिक संतुष्टि के लिए लिखना पहली प्राथमिकता होती है पर शायद कुछ भी लिखने के पहले किसी भी 
लेखक को उस रचना के सकारात्मक और नकारात्मक 
प्रभाव के बारे में विचार कर लेना चाहिए।
 ||सादर नमस्कार ||

चलिए अब आपकी रचनात्मकता की दुनिया में 

आदरणीय ज्योति खरे जी
चाहती है नदी 
पहाड़ को चूमते बहना
और पहाड़ 
रगड़ खाने के बाद भी 
टूटना नहीं चाहता


🔷💠🔷💠🔷💠🔷
आदरणीया वसुंधरा पांडे जी
धुसर आकाश आँधी से घुटा-घुटा सा
आपस मे ख़ुसूर-फुसुर करते कमरे के परदे
अजीब हतासा से फड़फड़ा रहे
बाहर पीली भूरी रेत ही रेत छाई हुई
घुसर आकाश आंधी से घुटा-घुटा सा
ऐसे सांझ से उबरना मुश्किल
अकसर भीतर का घना अवसाद
सूरज की बुझती रोशनी के साथ


🔷💠🔷



आदरणीय पुरुषोत्तम जी


जा सागर से मिल, जा तू बूंदे भर ला,
प्यासी है ये नदियां, दो घूंट पिला,
सूखे झरनों को नव यौवन दे,
तप्त शिलाओं को सिक्त बूंदों से सहला,
बहता चल तू मौजों के साथ यूं ही....
🔷💠🔷💠🔷

आदरणीय लोकेश जी


बिखर गई गुले-एहसास पे ग़म की शबनम
मिला रक़ीब बन के था जो मोतबर यारों

मिला नहीं है अपने आप से मुद्दत से नदीश
उलझ गया है वो रिश्तों में इस कदर यारों

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया प्रियंका श्री जी
वो चार लोग क्या कहेंगे

पर वक़्त,
उस पल न था साथ,
पर कहती हूँ,
आप सब से,
मन की यही बात।
जो ठाना है ,
गर तुमने कुछ करने का,
🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया कविता रावत जी




मैं मेधावी छात्र योजना के अंतर्गत भी नहीं आता हूँ क्योंकि मेरा प्रवेश वर्ष 2016 में हुआ जबकि यह योजना 2017 शुरू हुई है। मेरी घर 
की माली हालत किसी से छिपी नहीं है। घर में पिताजी फलों का 
हाथ ठेला कर जैसे-तैसे घर चला रहे हैं और मैं अपना थोड़ा-बहुत 
खर्च अपनी पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर 
बड़े ही संघर्षपूर्ण ढंग से निकाल पा रहा हूँ।


🔷💠🔷💠🔷💠🔷



हम-क़दम के 20 वें अंक के लिए 
कृपया यहाँ देखें

आपके द्वारा सृजित रचनाओं का संसार कैसा लगा
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में


उम्मीद से भरी हर सुबह का आकाश चाहिए

न बुझे कभी, चीर दे तम ऐसा प्रकाश चाहिए

इसके बाद थोड़ा सा मुस्कुरा भी दीजिए

गुरुवार, 24 मई 2018

1042....थम जाती रह-रहकर हवा खरके न पात-पाती ...

सादर अभिवादन। 
अति कटु है  तपिश  मास ज्येष्ठ की  
बरबस याद आती रस भरे फल श्रेष्ठ की 
थम जाती रह-रहकर  हवा खरके न पात-पाती 
आमों के बाग़ में कोयल मोहक मधुर गीत गाती।   

आइये अब चलते हैं आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर -


परियों के देश से क्‍या धरती पे आ रही है ...
डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट "आकुल"


संदेश मैं प्रकृति का आई यहाँ बताने,
मानव  की’ बेरुखी ही धरती को’ खा रही है.
खो जाउँगी न भू पर यदि स्‍वच्‍छता रहेगी,
इस डर से ति‍तलियों में मायूसी’ छा रही है. 



post-feature-image

काम पूरा होने के बाद जब प्रतिमा जाने लगी, तब शिल्पा ने उसे दो मिनट रुकने कहा। प्रतिमा ने गुस्से से ही कहा, ''अब और क्या काम हैं? पहले ही मुझे देरी हो रहीं हैं।'' 

''अरे, सिर्फ़ दो मिनट।'' शिल्पा ने उसे खुर्ची पर बैठने कहा। एक प्लेट में गरम नाश्ता और मिठाई लेकर आई। प्रतिमा को मिठाई खिलाते हुए शिल्पा बोली, ''जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई, प्रतिमा!'' प्रतिमा एकदम से आश्चर्यचकित हो गई। खुशी के मारे उसकी आंखे भर आई!



My Photo

 यहाँ ऊपर से पूरी नुब्रा घाटी नजर आती है ..सुंदर..नयनाभि‍राम। हमने बहुत सी तस्‍वीरें उतारी। अब हम मंदि‍र में थे । वहाँ बुद्ध शाक्‍य मुनि‍ की प्रति‍मा थी। गुरू पद्मनाभम के साथ ही अन्‍य भी। तभी हमने मूर्ति की फोटो ली। यहाँ एक पुजारी बैठे थे। उन्‍होंने मना नहीं कि‍या। मगर जब मेरी तस्‍वीर मूर्ति के साथ ली गई और साथ में पुजारी भी उसी फ्रेम में आ रहे थे। उन्‍होंने अपनी आंखे बंद कर ली। जब तस्‍वीर क्‍लि‍क हो गई तो कहने लगे कि‍ ये आपने अच्‍छा नहीं कि‍या। अब आपके साथ जरूर कुछ बुरा होगा। हमने बोला - ये क्‍या बात हुई। जब तस्‍वीर नहीं उतारनी थी तो क्‍लि‍क करने से पहले ही मना करते। 


आसार नजर आ रहे हैं बेवकूफ होशियारों में शामिल हो कर जल्दी ही उजड़ने जा रहे हैं..... डॉ. सुशील कुमार जोशी 

चारों तरफ से 
हो रहे होशियारों 
के हल्ले गुल्ले में से 
होशियारी निकाल 
कर होशियार 
हो लेने के 
मंसूबे बना रहे हैं 




मचलें जब सागर की लहरें,
चंदा को बाँहों में भरने,
जब उफने उदधि किनारों पर,
तब एकाकी मँझधारों पर,
ढूँढ़े नैया अपना केवट !!!


Image result for दादी का चित्र

बोलो माँ ! आज कहाँ तुम हो ,
 है अवरुद्ध कंठ और सजल नयन 
बोलो ! माँ आज  कहाँ  तुम हो ?
कम्पित अंतर्मन -कर रहा प्रश्न -
बोलो माँ आज कहाँ तुम हो ? 
जिसमे   समाती  थी  धार मेरे दृग जल की, 
 खो गई वो  छाँव  तेरे  आँचल की ;



Profile photo

 मीना सुबह से बरगद की टहनी ला देने के लिए अनुरोध पर अनुरोध कर रही थी... पिछले साल जो टहनी लगाई थी वह पेड़ होकर, उसके बाहर जाने की वजह से सूख गई थी... वट-सावित्री बरगद की पूजा कर मनाया जाता है... फर्श पर गिरती मीना के हांथ में बेना आ गया... बेना से ही अपने पति की धुनाई कर दी... घर में काम करती सहायिका मुस्कुरा बुदबुदाई "बहुते ठीक की मलकिनी जी... कुछ दिनों पहले मुझ पर हाथ डालने का भी बदला सध गया..."।

हम-क़दम के बीसवें क़दम
का विषय...

आज के लिए बस इतना ही। 
मिलेंगे फिर अगले गुरूवार। 
रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 23 मई 2018

1041..कलमकारों को मुक्त चिंतन के परिवेश के लिए...


।।शुभ भोर वंदन।।

ये करें और वो करें
ऐसा करें वैसा करें
ज़िंदगी दो दिन की है
दो दिन में हम क्या क्या करें
                      -नज़ीर बनारसी


हैं न इसी तरह का जद्दोजहद..

ज्यादा तो नहीं ..बस..

कलमकारों को मुक्त चिंतन के परिवेश के लिए कुछ करें..



सफल मानवीय व्यवस्था के लिये संवेदना और विचार का समन्वय करें..



तो फिर इन्हीं विचारों के इर्दगिर्द रहते नज़र डालें आज की लिंको पर...✍

⚫⚫⚫

स्वप्न मेरे ...ब्लॉग से..



लौट के इस शहर आओ साब जी

कश पे कश छल्लों पे छल्ले उफ़ वो दिन

विल्स की सिगरेट पिलाओ साब जी

मैस की पतली दाल रोटी, पेट फुल

पान कलकत्ति खिलाओ साब जी...



⚫⚫⚫

आदरणीय रजनीश जी की कलम से..



जिंदगी के सफर में

मंजिल दर मंजिल

एक भागमभाग

में लगा हुआ

हमेशा हर ठिकाने पर 

यही सोचा

कि क्या यही है वो मंजिल

जिसे पा लेना चाहता था
पर मंजिल दर मंजिल
बैठूँ कुछ सुकून से 


⚫⚫⚫

श्री की अभिव्यक्ति से..



सच्ची मोहब्बत से भी नवाजा तो

उन्हें

जिनकी हथेलियों में मोहब्बत की 

लाइन खींचना ही भूल गया।

मोहब्बत तो करी थी उसने भी टूट के

ये ख़ुदा! उसका यार क्यों उससे



⚫⚫⚫

डाँ इंदिरा जी की खूबसूरत रचना..




क्या कह तुम्हें करूँ सम्बोधित 

लिखते लगती लाज 

प्रिय लिखते ही कलम निगोड़ी 

कंप जाता है हाथ ! 

जाने किस विधि लिखना चाहूँ ...





⚫⚫⚫

ब्लॉग डायरी  से..


दरअसल कानून की भाषा बोलता हुआ यहां अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।

मध्यप्रदेश का एक किसान 45 डिग्री सेल्सियस में 4 दिन से मंडी में अपनी फसल की तुलाई होने का इंतज़ार लाइन में लगकर करता है और अन्तः उसकी मौत हो जाती है। अब मरने से पहले मूलचंद नामक इस किसान ने "हे राम" या "भारत माता की जय" या "मेरा भारत महान" का जयघोष किया था या नहीं,.....





⚫⚫⚫

और आज की अंतिम कड़ी में आनन्द ले नीतू सिंघल जी के दोहे..
My photo

नैनन के मोती बहि भए पानी पानी..,

ओ रे पिया ए रतन अमोलक, हाय ए मोल न जानी,

लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,

नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,

निसदिन करि ए कहि बतिया, गह गह गयउ बखानी

लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी

नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी
⚫⚫⚫

हम-क़दम के बीसवें क़दम
का विषय...
...........यहाँ देखिए...........

⚫⚫⚫
।।इति श ।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह..✍


मंगलवार, 22 मई 2018

1040....संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे।

जय माँ हाटेशवरी...
राजा राममोहन राय
एक प्रखर-प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है। वे भारतीय भाषायी प्रेस के सही अर्थों में संस्थापक थे। जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता राजा राममोहन राय पैनी पैठ के चिंतक थे।

उन्होंने आंदोलन और पत्रकारिता के कुशल संयोग से दोनों क्षेत्रों को गति प्रदान की। उनके आन्दोलनों ने जहाँ पत्रकारिता को चमक दी,वहीं उनकी पत्रकारिता ने आन्दोलनों को सही दिशा दिखाने का कार्य किया। राय हिन्दी, अँग्रेजी के अलावा फारसी, अरबी, संस्कृत एवं बांग्ला भाषा के भी जानकार थे।

राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे।
दूसरी लड़ाई उनकी अपने ही देश के नागरिकों से थी। जो अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। 
राजा राममोहन राय एक प्रखर-प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है। वे भारतीय भाषायी प्रेस के सही अर्थों में संस्थापक थे। जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता राजा राममोहन राय पैनी पैठ के चिंतक थे।   

राजा राममोहन राय ने 'ब्रह्ममैनिकल मैग्ज़ीन' संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन-प्रकाशन किया। बंगदूत एक अनोखा पत्र था। इसमें बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ किया जाता था।

राजा राममोहन राय के जुझारू और सशक्त व्यक्तित्व का इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि सन् 1821 में अँग्रेज जज द्वारा एक भारतीय प्रतापनारायण दास को कोड़े लगाने की सजा दी गई। फलस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई।

इस बर्बरता के खिलाफ राय ने एक लेख लिखा। लेख में उठाए मुद्‍दे थे-
1. जूरी प्रथा आरंभ की जाए।
2. न्यायाधीश और दंडाधिकारी के पद अलग किए जाएँ।
3. न्यायालय की कार्रवाई आम जनता के लिए खुली हो।
4. उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति हो।
5. पंचायतें कायम की जाएँ।
6. भारतीय जनमानस पर आधारित विधि का निर्माण हो।

राजा राममोहन राय की दूर‍दर्शिता और वैचारिकता के सैकड़ों उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। वे अँग्रेजी के हिमायती थे लेकिन हिन्दी के प्रति उनका अगाध स्नेह था।
वे रू‍ढ़िवाद और कुरीतियों के विरोधी थे लेकिन संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे।
आज उनके पावन दिवस पर इन महापुरुष को मेरा कोटी कोटी नमन......
....अब कुछ पढ़ी हुई रचनाओंं से......


स्वार्थ
भीगे तेरे आँसू में
दामन भी मेरे,
छलनी मेरा हृदय भी
हुआ दर्द से तेरे,
डोर जीवन की मेरी
है साँसों में तेरे,
मेरी डोलती नैया
है हांथों में तेरे,


छांह भी मांगती है पनाह....अश्वनी शर्मा
रेगिस्तान में जेठ की दोपहर
किसी अमावस की रात से भी अधिक
भयावह, सुनसान और सम्मोहक होती है
आंतकवादी सूरज के समक्ष मौन है
आदमी, पेड़, चिड़िया, पशु



नख से शिख तक ज़िंदा रहूँगी
मैं हीर थी,
हूँ
और रहूँगी !
मुझे भी जीने का हक़ है,
कुछ कहने का हक़ है
....

मेरी फ़ोटो
एक पलायन ऐसा भी .......
ये नामालूम सी दूरी है बनाई
सुनो तुम जानते हो न
निगाहों की भी उम्र होती है ..... निवेदिता


मंजिलें और खुशियाँ
पर मंजिल दर मंजिल
बैठूँ कुछ सुकून से
इसके पहले ही
हर बार
मिल जाता है
एक नया पता
अगली मंजिल का
अब तक के सफर में
कई कदम चलने
कई जंग लड़ने
वक्त के पड़ावों को
पार करते करते


आओ फासलों को गुनगुनाएं
नदी वापस नहीं मुड़ा करती
और रूहें आलिंगनबद्ध नहीं हुआ करतीं
इक सोये हुए शहर के आखिरी मकान पर दस्तक
नहीं तोड़ा करती शताब्दियों की नींद
आओ फासलों को गुनगुनाएं 
इश्क न जन्मों का मोहताज है न शरीर का ...

मेरी फ़ोटो
मुक्तक
निहारना चांद को भला सा लगता है ।
सौंदर्य का रसपान भी अच्छा सा लगता है ।।
खूबसूरती की कमी तो सूरज में भी नहीं ।
बस नजरे चार करना ही टेढ़ी खीर सा लगता है ।।


देश सबका है :)
मत करो देशका विभाजन
जातिवाद और धरम के नाम पर
क्योकि धरती सबकी है
देश सबका है !!
क्योकि धरती सबकी है
देश सबका है !!



हम-क़दम
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम बीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
:: ज्येष्ठ की तपिश (तपन) ::
उदाहरणः
आज भूनने लगी अधर है ,
रेगिस्तानी प्यास।

रोम रोम में लगता जैसे ,
सुलगे कई अलाव ।
मन को , टूक टूक करते,
ठंडक के सुखद छलाव ।

पंख कटा धीरज का पंछी ,
लगता बहुत उदास।

रचना की कुछ पंक्तिया दी गई है
यह रचना गीतकार जानकीप्रसाद 'विवश' की लिखी हुई है

उपरोक्त विषय पर आप सबको अपने ढंग से
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना शनिवार 26  मई 2018 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं। चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
28 मई 2018  को प्रकाशित की जाएगी ।
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें


   
धन्यवाद।



   

















सोमवार, 21 मई 2018

1039 ....हम-क़दम का उन्नीसवाँ अंक

सादर नमस्कार
 आज के विशेषांक के मूल विषय पर बातें करना अति आवश्यक है।
मानव प्रकृति पुत्र कहलाता है। जीवन-यापन के लिए मनुष्य प्रकृति 
पर निर्भर है। सभ्यता के विकास की अंधी दौड़ में शहरीकरण 
के दवाब,बढ़ती जनसंख्या और तीव्र उन्नति की लालसा ने सबसे 
ज्यादा अत्याचार पेड़ों पर ही किया है।

पेड़ काटते कंक्रीट बोते हम आने वाले विनाश की दस्तक को 
अनसुना कर अपने अस्तित्व पर छाये खतरे से आँख फेर रहे है। 
इतना समझना तो होगा न कि आँख बंद कर लेने से 
सच्चाई नहीं बदल सकती है।

फ्लैट संस्कृति में बालकनी में बोनसाई लगाकर हम हरियाली 
और पर्यावरण के संतुलन के सुखद परिणाम का भ्रम पालने लगे हैं।
जरुरत है प्रकृति के प्रति  अपनी बोनसाई  सोच को बदलने की।
आप ने कभी कोई पेड़ लगाया है? या किसी पेड़ को कटने से रोकने 
की कवायद की है?  या फिर मेरी तरह बस कलम चलाकर 
बदलाव का सुखद स्वप्न देखते हैं?

हमक़दम के दिए गये विषय पर सभी रचनाकारों की जागरूक रचनात्मकता को नमन है। सभी रचनाकारों की विविधता पूर्ण 
वैचारिकी प्रवाह से निसृत रचनाओं के गर्भ में एक ही संदेश 
निहित है लोककल्याण के निहितार्थ पेड़ो को नष्ट न करें।
आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुये आपके लिखे 
रचनाओं का आस्वादन करते हैं।

 विशेष सूचना
रचनाएँ क्रमानुसार नहीं सुविधानुसार लगायीं गयीं हैं-
🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया साधना वैद जी
आओ ना ! 
ठिठक क्यों गए ? 
चलाओ कुल्हाड़ी ! 
करो प्रहार !
सनातन काल से ही तो 
झेलती आई हूँ मैं 
अपने तन मन पर 
तुम्हारे सैकड़ों वार ! 
भय नहीं है मुझे तुम्हारा 
तुम्हारे इस आतंक के साये में ही तो 
गुज़ारा है मैंने अपना जीवन सारा ! 


🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया आशा सक्सेना जी
मनुष्य अपने स्वार्थ में
इतना अंधा हो गया कि यह तक भूला
 द्रुत गति से पेड़ काटे तो जा सकते है
 पर एक पेड़ लगाना
  उसे बड़ा करना है कितना मुश्किल
 दूर से एक लकड़हारा आया
 हाथ में लिए कुल्हाड़ी पेड़ काटने के लिए 
प्रकृति नटी ने देख उसे भय से
वृक्ष की ऊंचाई पर पनाह पाई

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया कुसुम कोठारी जी की कलम से दो रचनाएँ
ठंडी बयार का झोंका
पहले वृक्षारोपण करो
जब वो कोमल सा विकसित होने लगे
मुझे काटो मै अंत अपना भी
तुम पर बलिदान करुं
तुम्हारे और तुम्हारे नन्हों की
आजीविका बनूं

🔷💠🔷

हे मूरख नर
महा अज्ञानी
क्या कर रहा
तूं अभिमानी
अपने नाश का
बीज बो रहा
क्यों कहते
तूझे सुज्ञानी
आज तक विज्ञान
खोज मे
एक बात तो साफ हुई
कितने ग्रह उपग्रह है
लेकिन
इस धरा को छोड,
ना है मानव कहीं

🔷💠🔷💠🔷💠🔷

आदरणीया डॉ. इन्दिरा गुप्ता की लिखी दो रचनाएँ
आँख के अंधे नाम नयन सुख
ओ  मूरख अज्ञानी रुकजा 
क्यूँ पाँव कुल्हाड़ी मार रहा 
जो तेरा जीवन सरसाता
क्यों वार उसी पर कर रहा ! 
आँख के अंधे नाम नयन सुख 
करते हो वैसा  भरते हो 
दूषित श्वास तुम्हें मारेगी 

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मत बैठो उस ढहती कगार पर 
ना पतन की राह निकालो 
मेरा क्या मैं काष्ठ निर्जीव 
तुम अपना तो भला विचारों ! 

एक कटे और दस उगे 
फिर पांच से पचास 
पीढ़ी दर पीढ़ी यही सुमारग 
दिखलाओ इंसान ! 

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आदरणीया सुधा सिंह जी कलम से प्रवाहित
 याद रहे सामने तुम्हारे चुनौती बड़ी है.
अब मेरी निस्वार्थ सेवा का फल देने की घड़ी है

अपनी भावी पीढ़ी के शत्रु तुम न बनो.
उनके अच्छे भविष्य की नीव धरो.
कम से कम अपने जन्मदिन
पर ही वृक्षारोपण करो.
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आदरणीया मीना शर्मा जी
ठहरो, कुल्हाड़ी ना चलाओ !
इसकी बलि लेकर पाप ना कमाओ !
एक साधारण सा पेड़ है ये तुम्हारे लिए !
पर क्या जानते हो,
पेड़ कभी साधारण नहीं होता !!!!!

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आदरणीया आँचल पाण्डेय जी की रचना

सर पे सूरज चढ़ चुका है
ताप मौसम का बढ़ चुका है
तर बतर तन गर्मी से
ना कटता तरु अब कुल्हाड़ी से
अब थोड़ा सा विश्राम करूँगा
पेड़ के नीचे एक नींद भरूँगा
ज्यों बैठा मै छाँव तले
आँखों में गहरी थकान भरे


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आदरणीया सुधा देवरानी जी
बस बहुत हुआ ताण्डव तेरा
अबकी तो अपनी बारी है
हम पेड़ भले ही अचल,अबुलन
हम बिन ये सृष्टि अधूरी है

वन-उपवन मिटाकर,बंगले सजा
सुख शान्ति कहाँ से लायेगा
साँसों में तेरे प्राण निहित तो
प्राणवायु कहाँ से पायेगा...

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आज के लिए बस इतना ही

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