।।शुभ भोर वंदन।।
ये करें और वो करें
ऐसा करें वैसा करें
ज़िंदगी दो दिन की है
दो दिन में हम क्या क्या करें
-नज़ीर बनारसी
हैं न इसी तरह का जद्दोजहद..
ज्यादा तो नहीं ..बस..
कलमकारों को मुक्त चिंतन के परिवेश के लिए कुछ करें..
सफल मानवीय व्यवस्था के लिये संवेदना और विचार का समन्वय करें..
तो फिर इन्हीं विचारों के इर्दगिर्द रहते नज़र डालें आज की लिंको पर...✍
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स्वप्न मेरे ...ब्लॉग से..
लौट के इस शहर आओ साब जी
कश पे कश छल्लों पे छल्ले उफ़ वो दिन
विल्स की सिगरेट पिलाओ साब जी
मैस की पतली दाल रोटी, पेट फुल
पान कलकत्ति खिलाओ साब जी...
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आदरणीय रजनीश जी की कलम से..
जिंदगी के सफर में
मंजिल दर मंजिल
एक भागमभाग
में लगा हुआ
हमेशा हर ठिकाने पर
यही सोचा
कि क्या यही है वो मंजिल
जिसे पा लेना चाहता था
पर मंजिल दर मंजिल
बैठूँ कुछ सुकून से
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श्री की अभिव्यक्ति से..
सच्ची मोहब्बत से भी नवाजा तो
उन्हें
जिनकी हथेलियों में मोहब्बत की
लाइन खींचना ही भूल गया।
मोहब्बत तो करी थी उसने भी टूट के
ये ख़ुदा! उसका यार क्यों उससे
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डाँ इंदिरा जी की खूबसूरत रचना..
क्या कह तुम्हें करूँ सम्बोधित
लिखते लगती लाज
प्रिय लिखते ही कलम निगोड़ी
कंप जाता है हाथ !
जाने किस विधि लिखना चाहूँ ...
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ब्लॉग डायरी से..
दरअसल कानून की भाषा बोलता हुआ यहां अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।
मध्यप्रदेश का एक किसान 45 डिग्री सेल्सियस में 4 दिन से मंडी में अपनी फसल की तुलाई होने का इंतज़ार लाइन में लगकर करता है और अन्तः उसकी मौत हो जाती है। अब मरने से पहले मूलचंद नामक इस किसान ने "हे राम" या "भारत माता की जय" या "मेरा भारत महान" का जयघोष किया था या नहीं,.....
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और आज की अंतिम कड़ी में आनन्द ले नीतू सिंघल जी के दोहे..

नैनन के मोती बहि भए पानी पानी..,
ओ रे पिया ए रतन अमोलक, हाय ए मोल न जानी,
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी,
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी..,
निसदिन करि ए कहि बतिया, गह गह गयउ बखानी
लागे मोही तुहरी दुनिया बिरानी
नैनन के मोती बहि बहि भए पानी पानी
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।।इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍




