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सोमवार, 21 मई 2018

1039 ....हम-क़दम का उन्नीसवाँ अंक

सादर नमस्कार
 आज के विशेषांक के मूल विषय पर बातें करना अति आवश्यक है।
मानव प्रकृति पुत्र कहलाता है। जीवन-यापन के लिए मनुष्य प्रकृति 
पर निर्भर है। सभ्यता के विकास की अंधी दौड़ में शहरीकरण 
के दवाब,बढ़ती जनसंख्या और तीव्र उन्नति की लालसा ने सबसे 
ज्यादा अत्याचार पेड़ों पर ही किया है।

पेड़ काटते कंक्रीट बोते हम आने वाले विनाश की दस्तक को 
अनसुना कर अपने अस्तित्व पर छाये खतरे से आँख फेर रहे है। 
इतना समझना तो होगा न कि आँख बंद कर लेने से 
सच्चाई नहीं बदल सकती है।

फ्लैट संस्कृति में बालकनी में बोनसाई लगाकर हम हरियाली 
और पर्यावरण के संतुलन के सुखद परिणाम का भ्रम पालने लगे हैं।
जरुरत है प्रकृति के प्रति  अपनी बोनसाई  सोच को बदलने की।
आप ने कभी कोई पेड़ लगाया है? या किसी पेड़ को कटने से रोकने 
की कवायद की है?  या फिर मेरी तरह बस कलम चलाकर 
बदलाव का सुखद स्वप्न देखते हैं?

हमक़दम के दिए गये विषय पर सभी रचनाकारों की जागरूक रचनात्मकता को नमन है। सभी रचनाकारों की विविधता पूर्ण 
वैचारिकी प्रवाह से निसृत रचनाओं के गर्भ में एक ही संदेश 
निहित है लोककल्याण के निहितार्थ पेड़ो को नष्ट न करें।
आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुये आपके लिखे 
रचनाओं का आस्वादन करते हैं।

 विशेष सूचना
रचनाएँ क्रमानुसार नहीं सुविधानुसार लगायीं गयीं हैं-
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आदरणीया साधना वैद जी
आओ ना ! 
ठिठक क्यों गए ? 
चलाओ कुल्हाड़ी ! 
करो प्रहार !
सनातन काल से ही तो 
झेलती आई हूँ मैं 
अपने तन मन पर 
तुम्हारे सैकड़ों वार ! 
भय नहीं है मुझे तुम्हारा 
तुम्हारे इस आतंक के साये में ही तो 
गुज़ारा है मैंने अपना जीवन सारा ! 


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आदरणीया आशा सक्सेना जी
मनुष्य अपने स्वार्थ में
इतना अंधा हो गया कि यह तक भूला
 द्रुत गति से पेड़ काटे तो जा सकते है
 पर एक पेड़ लगाना
  उसे बड़ा करना है कितना मुश्किल
 दूर से एक लकड़हारा आया
 हाथ में लिए कुल्हाड़ी पेड़ काटने के लिए 
प्रकृति नटी ने देख उसे भय से
वृक्ष की ऊंचाई पर पनाह पाई

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आदरणीया कुसुम कोठारी जी की कलम से दो रचनाएँ
ठंडी बयार का झोंका
पहले वृक्षारोपण करो
जब वो कोमल सा विकसित होने लगे
मुझे काटो मै अंत अपना भी
तुम पर बलिदान करुं
तुम्हारे और तुम्हारे नन्हों की
आजीविका बनूं

🔷💠🔷

हे मूरख नर
महा अज्ञानी
क्या कर रहा
तूं अभिमानी
अपने नाश का
बीज बो रहा
क्यों कहते
तूझे सुज्ञानी
आज तक विज्ञान
खोज मे
एक बात तो साफ हुई
कितने ग्रह उपग्रह है
लेकिन
इस धरा को छोड,
ना है मानव कहीं

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आदरणीया डॉ. इन्दिरा गुप्ता की लिखी दो रचनाएँ
आँख के अंधे नाम नयन सुख
ओ  मूरख अज्ञानी रुकजा 
क्यूँ पाँव कुल्हाड़ी मार रहा 
जो तेरा जीवन सरसाता
क्यों वार उसी पर कर रहा ! 
आँख के अंधे नाम नयन सुख 
करते हो वैसा  भरते हो 
दूषित श्वास तुम्हें मारेगी 

🔷💠🔷

मत बैठो उस ढहती कगार पर 
ना पतन की राह निकालो 
मेरा क्या मैं काष्ठ निर्जीव 
तुम अपना तो भला विचारों ! 

एक कटे और दस उगे 
फिर पांच से पचास 
पीढ़ी दर पीढ़ी यही सुमारग 
दिखलाओ इंसान ! 

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आदरणीया सुधा सिंह जी कलम से प्रवाहित
 याद रहे सामने तुम्हारे चुनौती बड़ी है.
अब मेरी निस्वार्थ सेवा का फल देने की घड़ी है

अपनी भावी पीढ़ी के शत्रु तुम न बनो.
उनके अच्छे भविष्य की नीव धरो.
कम से कम अपने जन्मदिन
पर ही वृक्षारोपण करो.
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आदरणीया मीना शर्मा जी
ठहरो, कुल्हाड़ी ना चलाओ !
इसकी बलि लेकर पाप ना कमाओ !
एक साधारण सा पेड़ है ये तुम्हारे लिए !
पर क्या जानते हो,
पेड़ कभी साधारण नहीं होता !!!!!

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आदरणीया आँचल पाण्डेय जी की रचना

सर पे सूरज चढ़ चुका है
ताप मौसम का बढ़ चुका है
तर बतर तन गर्मी से
ना कटता तरु अब कुल्हाड़ी से
अब थोड़ा सा विश्राम करूँगा
पेड़ के नीचे एक नींद भरूँगा
ज्यों बैठा मै छाँव तले
आँखों में गहरी थकान भरे


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आदरणीया सुधा देवरानी जी
बस बहुत हुआ ताण्डव तेरा
अबकी तो अपनी बारी है
हम पेड़ भले ही अचल,अबुलन
हम बिन ये सृष्टि अधूरी है

वन-उपवन मिटाकर,बंगले सजा
सुख शान्ति कहाँ से लायेगा
साँसों में तेरे प्राण निहित तो
प्राणवायु कहाँ से पायेगा...

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आप के द्वारा सृजित हमक़दम का यह अंक 
आपको कैसा लगा कृपया अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के 
द्वारा अवश्य अवगत करवाइयेगा।

हमक़दम का अगला विषय जानने के लिए
कल का अंक देखना न भूले।

अगले सोमवार फिर मिलेंगे नये विषय पर  
आपके द्वारा सृजित रचनाओं के साथ।

आज के लिए बस इतना ही

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