सादर अभिवादन
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
निवेदन।
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फ़ॉलोअर
सोमवार, 19 मई 2025
4493 ...समस्या समाधान और जीवन में खुशी के लिए महत्वपूर्ण है
रविवार, 18 मई 2025
4492 ,,,, छोड़ा बनाकर दुश्मन को फकीर, धन्य धन्य भारत के सैन्य वीर ।
सादर अभिवादन
शनिवार, 17 मई 2025
4491...ये वहम भी मत पाल कर रखिये...
न खिलती ये कलियाँ न उड़ते परिंदे
जो गुलशन में तुमसे मुतासिर न होते!
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बोलने से तेरे रंग बरसते हैं
हँसती जो हो तुम फूल महकते हैं
तेरी धड़कनों का प्रीत होना चाहता हूँ
मैं तेरा गीत होना चाहता हूँ
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1214शाम की हल्की धूप ने उन पर सुनहरी लकीरें खींच दी हैं। दूर क्षितिज में थकामाँदा सूरज उसमें उतरने के लिए मचल रहा है। सागर के वक्ष पर आसमान में छाई नारंगी रंग की परछाई ऐसे लग रही है- मानो किसी कोमलांगी ने लहरों पर रंगोली सजा दी हो। यह अद्भुत दृश्य मन को बाँधे जा रहा है। सूर्यास्त के एक-एक क्षण को कैमरे में उतार रही हूँ।*****सँभाल कर रखियेकिन्हीं एहसासों का नाम है ग़ज़ल,
उन एहसासों को सँभाल कर रखिये
ये ग़ज़ल नहीं रहेगी उम्र भर,
ये वहम भी मत पाल कर रखिये
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
शुक्रवार, 16 मई 2025
4490 ....गमले में लगा पौधा बन गया हूं
सादर अभिवादन
गुरुवार, 15 मई 2025
4489...स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होती है...
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं ब्लॉगर.कॉम पर प्रकाशित पसंदीदा रचनाएँ-
माँ – चाबी रख ली? और धूप का चश्मा?
मैं – हाँ, ये भी रख लिए.
माँ - और अपना मोबाइल?
मैं – वो भी रख लिया.
माँ – अपनी वाटर बॉटल ज़रूर साथ ले जाना.
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बंदी राजा बनने से आजाद पंछी बनना भला
बंदी राजा बनने से आजाद पंछी बनना भला
जेल के मेवे-मिठाई से
रूखा-सूखा भोजन भला
स्वतंत्रता का अर्थ खुली
छूट नहीं होती है
अत्यधिक स्वतंत्रता सबकुछ
चौपट करती है
*****
खाने के लाले हैं घर में, खैरात माँग इतराते हैं।
धर्म नहीं है उनको प्यारा, नफ़रत, हिंसा प्यारी हैं।
अपनी कौमों के माथे पर लिखते वे गद्दारी हैं ।
दहशतगर्दी फैलाना ही, धर्म जिन्होंने माना है
इंसानी जानों की कीमत, उनको क्या समझाना है।
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“स्मृति-मंजूषा”
मगर कहते हैं ना कि "साँझ के सूरज
को देख पाखी भी अपने आप को समेट नीड़ की तरफ लौटने लगते हैं।” वैसे ही मेरे मन में भी ख्याल आया कि
अपने लिखे को समेट कर पुस्तक के रूप में साकार करने का समय आ गया है। अपने पढ़ने
की किताबों की आलमारी में अपने लिखे का भी स्थान तो बनता ही है, इसी सोच
के साथ अपने ब्लॉग “मंथन” की पिटारी से रचनाओं के मोती चुन कर अपनी डिजिटल डायरी में संकलित कर उसको
13 जुलाई 2019 को पोस्ट अपनी एक
कविता के शीर्षक पर नाम दिया “स्मृति-मंजूषा”!!
अप्रकाशित
संकलन के बाद भी काफी काम थे जिससे प्रूफ़ रीडिंग और प्रकाशन
से संबंधित काम जिसको तय करना समय ले रहा था ।
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
बुधवार, 14 मई 2025
4488..यही दस्तूर है...
।।प्रातःवंदन।।
" स्वागत एवं अभिनन्दन करते सब हैं
इस नये विहान का
धन्य हो तुम रश्मियाँ जो आई हो
लेकर जीवन इस भू पर
नयी चेतना के साथ।
ये मेरे प्रभात के मधुर क्षण में
इस विश्व को प्रेम, शांति और आनन्द
के अवसर दे सकें
शुभकामनाओं के साथ !"
परंतप मिश्र
बुधवारिय प्रस्तुतिकरण में शामिल रचनाए...
चीजें जैसी हैं, वैसी हैं
हम उन्हें खींच कर
बनाना चाहते हैं
जैसी हम उन्हें देखना चाहते हैं
यही खिंचाव तो तनाव है
तनाव भर देता है मन को..
✨️
मिटाया था तूने सुखी-चैनों का सिंदूर,
अब तू भी मिट यही नीति यही दस्तूर,
ज़ो हमें छेड़ता है उसे छोड़ते नहीं मगरूर,
बिखरेगा तू, होगा खंड-खंड, चूर-चूर।..
✨️
सच ही कहते हैं .....
हम इंसानों की बडी अजीब -सी
फितरत है ........
जो होता है , संतोष नहीं
जो नहीं है ,बस भागे चले जाते हैं
उसके पीछे ..
चैन ,सुकून सब खो बैठते हैं
बस होड़ा-होड़ .....।
अब देखो न...
✨️
तुम तक कोई नहीं पहुँच पायेगा
जो तुम नजदीक आते लोगो से
दूर भाग जाते हो वो
तुमको सच में बहुत दूर ले जायेगा
तरसते रह जाओगे किसी की आहट को..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️
मंगलवार, 13 मई 2025
4487 .....आज तक मेरे इतने करीब कोई नहीं आया
सादर अभिवादन

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