निवेदन।


फ़ॉलोअर

सोमवार, 19 मई 2025

4493 ...समस्या समाधान और जीवन में खुशी के लिए महत्वपूर्ण है

 सादर अभिवादन

रविवार, 18 मई 2025

4492 ,,,, छोड़ा बनाकर दुश्मन को फकीर, धन्य धन्य भारत के सैन्य वीर ।

 सादर अभिवादन

कुछ सोच .....
इतने खामोश भी रहा न करो
ग़म जुदाई में यूँ किया न करो

ख़्वाब होते हैं देखने के लिए
उन में जा कर मगर रहा न करो

कुछ न होगा गिला भी करने से
ज़ालिमों से गिला किया न करो

अपने रूत्बे का कुछ लिहाज़ 'मुनीर'
यार सब को बना लिया न करो

- मुनीर नियाजी

देखें कुछ रचनाएं




समय से पूर्व
और आवश्यकता से अधिक
जब मिलने लगे
जो भी ज़रूरी है
तो मानना चाहिए कि
ऊपरवाला साथ है
और कृपा बरस रही है !






चाहत यही है काश वो घर-घर दिखाई दे
वादी में काश्मीर में केसर दिखाई दे

ऐसा न काश एक भी मंज़र दिखाई दे
हाथों में हमको यार के खंजर दिखाई दे







बलूचियों को यह भी लगता है कि पाकिस्तान ने अपने  बदहाल आर्थिक तंत्र को दुरुस्त करने के लिए चीनियों को उनके इलाके में बुला लिया है। चीन ने  62 अरब डॉलर का भारी निवेश किया है और वह बलूचिस्तान में  ग्वादर पोर्ट को संचालित करता है। चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपैक) के तहत इस बंदरगाह से चीन जहां दुनिया से जुड़कर अपना माल बेचने की राह आसान करता है, वहीं बलूची मानते हैं कि यह उनकी आज़ादी में दख़ल है और उनकी ज़मीन पर कब्ज़े की साज़िश है। चीन का विस्तारवादी अतीत भी उन्हें ऐसा सोचने पर मजबूर करता है। बलूचिस्तान न केवल पाकिस्तान का सबसे बड़ा राज्य है बल्कि प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा, रेडियम जैसे कई महत्वपूर्ण खनिजों के भंडार भी वहां हैं। पहले-पहल सिंगापुर की एक कंपनी इसका संचालन कर रही थी, फिर चीन ने इसे अपने ही देश की कंपनी को दे दिया।






पिता जी, मैं आपके लिए अमरफल लेकर आया हूं। व्यापारी पिता ने चौंकते हुए कहा कि क्या कह रहे हो? अमरफल जैसा कुछ होता भी है?

बेटे ने जवाब देते हुए कहा कि पिता जी, जब मैं बाजार पहुंचा, तो फल की सभी दुकानें देखी। तरह-तरह के फल बाजार में बिक रहे थे। मैं सोचने लगा कि क्या लूं? तभी मेरी नजर एक बुजुर्ग पर पड़ी। वह भूख से तड़प रहा था। मैंने फल के पैसे से खाना खरीदा और उस बुजुर्ग को खिला दिया।

खाना खाने के बाद उस बुजुर्ग ने जिस तरह सच्चे मन से मुझे आशीर्वाद दिया, वह मुझे किसी अमरफल से कम नहीं लगा। अब आप बताइए, मैंने कोई गलत किया। पिता ने गदगद होकर कहा, बेटा, तुमने बहुत अच्छा काम किया।






बदला बना ऐसा नजीर
सटीक निशाने पर थे सब तीर
छोड़ा बनाकर दुश्मन को फकीर
धन्य धन्य भारत के सैन्य वीर ।

आंख उठाकर अब देखा अगर
तो भारत मचायेगा ऐसा कहर
टूट टूटकर सब जायेगा बिखर
दुश्मन न आयेगा नक्शे में नजर ।






"क्या फर्क पड़ता है,
कुछ देर बरसेंगे फिर गायब" ...
कुछ देर को ही सही
उनके बरस जाने से फैली
सौंधी गंध के लिए हम
उनके शुक्रगुजार नहीं होते
शुष्क चट्टान की तरह
अपने चोचलों में मग्न रहते हैं

****
आज बस
सादर वंदन

शनिवार, 17 मई 2025

4491...ये वहम भी मत पाल कर रखिये...

शीर्षक पंक्ति:आदरणीय नीलांश जी की रचना से। 
सादर अभिवादन। 
शनिवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ-

न खिलती ये कलियाँ न उड़ते परिंदे 

जो गुलशन में तुमसे मुतासिर न होते! 

*****


इस युद्धक माहौल में एक कहानी ये भी---
बहुत समझाने पर पहला वाला तैयार हुआ कि फ्रंट अटैक में वो नहीं रहेगा। पीछे वाली टीम में रहेगा। दूसरे वाले ने पाकिस्तानी चौकी पर हमले से पहले सिर मुंडा लिया। क्यों मुंडाया, ये किसी को आजतक नहीं पता चल पाया। क्योंकि उस हमले में उनकी शहादत हुई। मौत से पहले कई पाकिस्तानी सैनिकों की गर्दन काटी थी उस महावीर ने। उस हमले में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी दौड़ा-दौड़ा कर मारा था।*****मैं तेरा गीत होना चाहता हूँ

बोलने से तेरे रंग बरसते हैं 

हँसती जो हो तुम  फूल महकते हैं 

तेरी धड़कनों का प्रीत होना चाहता हूँ 

मैं तेरा गीत होना चाहता हूँ 

*****

1214शाम की हल्की धूप ने उन पर सुनहरी लकीरें खींच दी हैं। दूर क्षितिज में थकामाँदा  सूरज  उसमें उतरने के लिए मचल रहा है। सागर के वक्ष पर आसमान में छाई नारंगी रंग की परछाई ऐसे लग रही है- मानो किसी कोमलांगी ने लहरों पर रंगोली  सजा दी हो। यह अद्भुत दृश्य मन को बाँधे जा रहा है। सूर्यास्त के एक-एक क्षण को कैमरे में उतार रही हूँ।*****सँभाल कर रखियेकिन्हीं एहसासों का नाम है ग़ज़ल,

उन एहसासों को सँभाल कर रखिये

ये ग़ज़ल नहीं रहेगी उम्र भर,

ये वहम भी मत पाल कर रखिये

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


शुक्रवार, 16 मई 2025

4490 ....गमले में लगा पौधा बन गया हूं

 सादर अभिवादन

गुरुवार, 15 मई 2025

4489...स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होती है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं ब्लॉगर.कॉम पर प्रकाशित पसंदीदा रचनाएँ- 

 कल मातृदिवस था

माँ – चाबी रख लीऔर धूप का चश्मा?

मैं – हाँये भी रख लिए.

माँ - और अपना मोबाइल?

मैं – वो भी रख लिया.

माँ – अपनी वाटर बॉटल ज़रूर साथ ले जाना.

*****

बंदी राजा बनने से आजाद पंछी बनना भला

बंदी  राजा  बनने से आजाद पंछी बनना भला
जेल के मेवे-मिठाई से रूखा-सूखा भोजन भला

स्वतंत्रता का अर्थ खुली छूट नहीं होती है
अत्यधिक स्वतंत्रता सबकुछ चौपट करती है

*****

1462

खाने के लाले  हैं घर में, खैरात माँग इतराते हैं।

धर्म नहीं है उनको प्यारा, नफ़रत, हिंसा प्यारी हैं।

अपनी कौमों के माथे पर लिखते वे गद्दारी हैं 

दहशतगर्दी फैलाना हीधर्म जिन्होंने माना है

इंसानी जानों की कीमतउनको क्या समझाना है।

*****

“स्मृति-मंजूषा”

मगर कहते हैं ना कि "साँझ के सूरज को देख पाखी भी अपने आप को समेट नीड़ की तरफ लौटने लगते हैं।वैसे ही मेरे  मन में भी ख्याल आया कि अपने लिखे को समेट कर पुस्तक के रूप में साकार करने का समय आ गया है। अपने पढ़ने की किताबों की आलमारी में अपने लिखे का भी स्थान तो बनता ही है,  इसी सोच के साथ अपने ब्लॉग मंथनकी पिटारी से रचनाओं  के मोती चुन कर  अपनी डिजिटल  डायरी में संकलित कर उसको  13 जुलाई 2019 को पोस्ट अपनी एक कविता के शीर्षक पर नाम दिया स्मृति-मंजूषा”!!  अप्रकाशित संकलन के बाद भी काफी काम थे जिससे  प्रूफ़ रीडिंग और प्रकाशन से संबंधित काम जिसको तय करना समय ले रहा था ।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

बुधवार, 14 मई 2025

4488..यही दस्तूर है...

 ।।प्रातःवंदन।।

" स्वागत एवं अभिनन्दन करते सब हैं

इस नये विहान का

धन्य हो तुम रश्मियाँ जो आई हो

लेकर जीवन इस भू पर

नयी चेतना के साथ।

ये मेरे प्रभात के मधुर क्षण में

इस विश्व को प्रेम, शांति और आनन्द

के अवसर दे सकें 

शुभकामनाओं के साथ !"

 परंतप मिश्र

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण में शामिल रचनाए...

सरल और तरल







चीजें जैसी हैं, वैसी हैं 

हम उन्हें खींच कर

 बनाना चाहते हैं 

जैसी हम उन्हें देखना चाहते हैं 

यही खिंचाव तो तनाव है 

तनाव भर देता है मन को..

✨️

ऑपरेशन सिंदूर

मिटाया था तूने सुखी-चैनों का सिंदूर,

अब तू भी मिट यही नीति यही दस्तूर,

ज़ो हमें छेड़ता है उसे छोड़ते नहीं मगरूर, 

बिखरेगा तू, होगा खंड-खंड, चूर-चूर।..

✨️

फितरत

सच ही कहते हैं .....

हम इंसानों की बडी अजीब -सी 

फितरत है ........

 जो होता है , संतोष नहीं 

जो नहीं है ,बस भागे चले जाते हैं 

  उसके पीछे ..

चैन ,सुकून सब खो बैठते हैं 

  बस होड़ा-होड़ .....।

    अब देखो न...

✨️

होगा कुछ यू एक दिन कि 

तुम तक कोई नहीं पहुँच पायेगा

जो तुम नजदीक आते लोगो से 

दूर भाग जाते हो वो 

तुमको सच में बहुत दूर ले जायेगा

तरसते रह जाओगे किसी की आहट को..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️



मंगलवार, 13 मई 2025

4487 .....आज तक मेरे इतने करीब कोई नहीं आया

 सादर अभिवादन

कुछ सोच .....

कुछ सोच कर ही मिलाया होगा
ऊपरवाले ने , आज तक मेरे
इतने करीब कोई नहीं आया.....

देखें कुछ रचनाएं


मैं से मोक्ष...बुद्ध
मैं
नित्य सुनती हूँ
कराह
वृद्धों और रोगियों की,
निरंतर
देखती हूँ
अनगिनत जलती चिताएँ
परंतु
नहीं होता
मेरा हृदयपरिवर्तन।





महिलाओं में ही नहीं,
मैं पुरुषों में भी खोजता हूं मां,
इंसानों में ही नहीं,
जानवरों में, परिंदों में,
पेड़ पौधों में,
फूल पत्तियों में,
यहां तक कि निर्जीव चीज़ों में भी
मैं खोजता हूं मां।





बांहें पसार भारत ने किया सत्कार,
यहाँ जो भी मित्र भाव से आया !
पर डर कर कभी न सिर झुकाया !
कायरों ने पीठ पीछे किया घात,
मारा निहत्थों को, उजाङा सुहाग !
भारत न भूलेगा ये अक्षम्य अपराध !


युद्ध के बाद की कुछ कवितायें



युद्ध के बाद शायद फिर बैठ सकूं
उस टेरेस पर जहाँ बैठती थी तुम्हारे साथ
और जी सकूं गुजरती हुई दोपहर को
देखते हुए आसमान के बदलते हुए रंग
मन के किसी उदास कोने में याद है तुम्हारी
और उन खोए हुए सुख के दिनों की जो हमने साथ जिए
कामना है इतनी सी कि काश कोई होता
जो पुकारता मेरा नाम
ठीक वैसे ही जैसा पुकारते थे तुम.






प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में कुछ तो खास है कि वे अपने विरोधियों के निशाने पर ही रहते हैं। इसका खास कारण है कि वे अपनी विचारधारा को लेकर स्पष्ट हैं और लीपापोती, समझौते की राजनीति उन्हें नहीं आती। राष्ट्रहित में वे किसी के साथ भी चल सकते हैं, समन्वय बना सकते हैं, किंतु विचारधारा से समझौता उन्हें स्वीकार नहीं है। उनकी वैचारिकी भारतबोध, हिंदुत्व के समावेशी विचारों और भारत को सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाने की अवधारणा से प्रेरित है। यह गजब है कि पार्टी के भीतर अपने आलोचकों पर भी उन्होंने कभी अनुशासन की गाज नहीं गिरने दी,यह अलग बात है कि उनके आलोचक राजनेता ऊबकर पार्टी छोड़ चले जाएं। उन्हें विरोधियों को नजरंदाज करने और आलोचनाओं पर ध्यान न देने में महारत हासिल है। इसके उलट पार्टी से नाराज होकर गए अनेक लोगों को दल में वापस लाकर उन्हें सम्मान देने के अनेक उदाहरणों से मोदी चकित भी करते हैं।


विकास - राष्ट्रवाद की राष्ट्र में
बातें जब कभी  होतीं !
सूख रह पेड़ों  की टहनियां -पत्ते
वे भी हिलते !
*

पूर्वांचल में विकास आया
कछुओं ने गुनगुनाया
सभाओं से  फरमाया करते
अपना बंटाधार सुनाया ?
*
हो रहे हिन्दुओं पर आक्रमण
घूम रहे फिरकापरस्त
हिन्दुओं - छिना आत्म रक्षात्मक
सत्तर साल का इतिहास


*****

आज बस
सादर वंदन
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...