सादर अभिवादन
कितनी खूबसूरत है ये पंक्तियां
जिंदगी क्या है।
कभी तानों में कटेगी,
कभी तारीफों में;
ये जिंदगी है यारों,
पल पल घटेगी !!
पाने को कुछ नहीं,
ले जाने को कुछ नहीं;
फिर भी क्यों चिंता करते हो,
इससे सिर्फ खूबसूरती घटेगी,
ये जिंदगी है यारों पल-पल घटेगी!
-गुलज़ार
चलिए आगे बढ़ें ....
किसी क्षण में वह परम मिल
उसी पथ पर ले चले,
दूर होगी हर इक कलल
संग उसके मन हँसे !
कान्हा पर सब खीझें
मटकी फूट गई
मन ही मन पर रीझें !
कान्हा तुम आ जाओ
यमुना तीर खड़ी
बंसुरी सुना जाओ !
तुम खुश क्यों नहीं रहते हो? तुम्हें किस बात की चिंता है जो तुम्हें खुश होने से रोकती है। सिकंदर ने कहा कि मुझे अभी पूरी दुनिया जीतनी है। मुझे विश्व सम्राट बनना है। पूरी दुनिया को जीतने से पहले मैं खुश कैसे हो सकता हूं। जब तक मेरा लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक मैं चैन से नहीं बैठ सकता हूं।
तब डायोजनीज ने पूछा कि जब तुम पूरी दुनिया जीत लोगे, तब क्या करोगे? सिकंदर ने कहा कि तब मैं खुश हो जाऊंगा। मैं भी आपकी तरह आनंद उठाऊंगा। इस पर डायोजनीज ने कहा कि तो इसके लिए तुम्हें दुनिया जीतने की क्या जरूरत है। अभी से आनंद उठा सकते हो। तुम्हें किसने रोका है। यह सुनकर सिकंदर चुप हो गया।
पिछले दिनों किसी और जगह जा रही थी तो यह दृश्य दिखा और बच्चों सी उछल पड़ी मैं।
इस पहाड़ की चोटी तक चढ़ी हूँ छुटपन में और बादलों को आग़ोश में भरा है।
जाने कितनी ही बार मेरा हुआ मन,
पिता की विशाल गोद में सिर रख ,
सो जाऊं निश्चिंत भूल कर सब द्वंद
मिले श्री चरणों में शरण अवलंबन ।
तुमसे अलग होकर इन दिनों तुम्हीं को खोज रहा हूँ, जैसे कोई प्यासा रेत में पानी तलाश रहा हो। तुम्हारी वह नन्ही-सी हथेली, जिसके स्पर्श भर से पूरी दिल्ली खूबसूरत लगने लगती थी। तुम्हें याद होगा, वह कालकाजी—मैजेंटा लाइन से वॉयलेट लाइन तक का पैदल रास्ता।
आज बस
सादर वंदन







