सादर अभिवादन
देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 26 जनवरी 1950 को 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया था। इसके बाद से हर साल इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस दिन देशभर में राष्ट्रीय अवकाश रहता है।
एक आलेख हमारे पूर्व चर्चाकार भाई कुलदीप सिंह ठाकुर की कलम से
आज हम 76 वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं...
गणतंत्र का अर्थ है... गण का तंत्र, यानी आम आदमी का शासन... अर्थात जहां वंशवाद के आधार पर कोई राजा शासन नहीं कर सकता। जनता अपने लिए सांसद और सरकार का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से करती है। ये सांसद संविधान और संसद के प्रति जवाबदेह होकर राष्ट्रहित में नीतियां और कानून बनाते हैं।
पर आम आदमी को तो वोट तक ही सीमित कर दिया... हर तरफ भ्रष्टाचार है...महिलाएं आज भी गुलामों सा जीवन जी रही हैं...
आतंकवाद का भय...हर आदमी को भयभीत कर रहा है...आज यहां पश्चिमी संस्कृति का बोल-बाला है...
न भाषा अपनी...न संस्कृति सभ्यता... मैकाले की शिक्षा-प्रणाली ही चल रही है...
वोही 100 साल पुराने कानून...
फिर कैसा गणतंत्र...
एक जयचंद और मीर जाफर के कारण हम कई हजार वर्ष गुलाम रहे...
आज तो देश की हर गली में आपको ...कई जयचंद और मीर जाफर मिल जाएंगे
जो जिस डाली पर बैठे हैं...उसे ही काट रहे हैं...
पर अब भारत की जनता जाग रही हैं...
रचनाएं देखें
मैं हैरान हूं,
यह सोचकर ,
किसी औरत ने क्यों नहीं उठाई उंगली ..??
तुलसी दास पर ,जिसने कहा ,
"ढोल ,गंवार ,शूद्र, पशु, नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी।"
अपनी मर्यादा, अपने सिद्धांत
और अपने ममता के अधिकार से
मैं कभी समझौता नहीं करूँगी
न ही किसीको करने दूँगी
फिर चाहे तुम हो
या तुम्हारे पापा
तुमको अपनी
कमजोरियों को
हर हाल में
जीतना ही होगा !
हर रिश्ते की भी एक अवधि है
फिर माता-पिता ही क्यों न हों
कुछ संस्कार मदत करते भी हैं
पर जो संस्कार ही न पूरा करे ?
मैं उन्मुक्त गगन की पंछी हूँ
रिश्ते भी हैं रिश्तेदारी भी की हैं
ज़िम्मेदारियों का एक दायरा है
फिर बचपन सा जीना चाहती हूँ !
बुद्धि बड़ी, भावना छोटी
फिर इंसान की नीयत खोटी !
उलझन, किस ईश्वर को मानें ?
धर्म - जात में फँसे हुए हैं !
हम सब कितने बँटे हुए हैं ।
हम सब कितने बँटे हुए हैं
इक दूजे से कटे हुए हैं !
कब, क्या कहना, किसे, कहाँ पर ,
सब पहले से रटे हुए हैं !
जग देता ढ़ाढ़स झूठा,
मन कहता, मुझसे रब रूठा,
क्रूर बना, यह काल,
अनुत्तरित, मेरा हर सवाल,
वश में यह पल कहां!
घास काटने की मशीन का शोर
आ रहा है अनवरत
साथ में उस तेल की गंध
जो मजदूर ने मशीन में डाला होगा
जनवरी की एक सुबह
पर धूप इतनी तेज है
मानो दोपहर का समय हो
आज बस
वंदन



