सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष
बोझ से ख्वाहिशोँ के थक जाओगे
दिल मेँ अरमान कम ले कर चलो
गुजरी बातोँ का चर्चा क्योँ हर घडी
झगडे पुराने सभी दफन कर चलो
>>>>>>>>>>>mohinder kumar
अपने आस-पास के क्षेत्रों में
कम से कम 5 और अधिकतम
अपनी छमता अनुसार
फलदार वृक्ष लगाकर
आदिवासी समुदाय पर यह अत्याचार तभी रुकेगा
जब वो एक जुट होकर अपने वोट की ताकत पहचानेगें|
भाजपा - कांग्रेस से दूर रहेंगे|
यह इस मानसिकता को भी त्यागेंगे कि
वो राजा थे और राजा है| अब लोकतंत्र आ गया है|
अपनी भागीदारी के लिए लड़ना होगा|
लुप्त होती प्रजाति है ? जिसके संरक्षण के लिए एक दिन निर्धारित कर उसे बचाने के उपाय सोचे-बताए जाते हैं ! कहाँ है पुरानीु पीढ़ियों को तोड़ने को आतुर, मंदिरों-देवालयों में प्रवेश को ले आंदोलन को आयोजित करने वाले संगठन ? उन्हें यह भेद-भाव क्यों नहीं दिखाई देता ? वह शायद इसलिए, क्योंकि यह सब निर्धारित करने वाला आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है।
अगर उनके किसी साथी को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया जाता है
तो भी वे हड़ताल कर देते हैं और बहाना बनाते हैं उत्पीड़न का.
वे कभी सरकारी तंत्र को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने, भ्रष्टाचारियों को
अपने संगठन से बाहर करने की मुहिम नहीं चलाते.
अयोग्य कर्मचारियों पर नियमानुसार
कार्रवाई भी उन्हें नागवार गुजरती है
अगर
समय मिले तो बतलाना
बेबस
लाचार
हीन
ये तोहमते
हम पे
कभी मत लगाना
कभी मत लगाना
41 साल पहले की तारीखों में दर्ज चुनौतियां
कहीं गहरी हुई हैं. विकास और प्रगति के
तमाम दावों के बावजूद देश की
आधी आबादी अपने हालातों से
जद्दोजहद करती हुई दिखती है.
कितने ही मौसम आये थे
सरदी गरमी भी लाए थे
लेकिन बसंत से गिला ही क्या
जो सपनों में भी तड़पाया था
फिर मिलेंगे ..... तब तक के लिए
आखरी सलाम
विभा रानी श्रीवास्तव