।।प्रात:वंदन।।
हँस देता जब प्रात, सुनहरे
अंचल में बिखरा रोली,
लहरों की बिछलन पर जब
मचली पड़तीं किरनें भोली,
तब कलियाँ चुपचाप उठाकर पल्लव के घूँघट सुकुमार,
छलकी पलकों से कहती हैं ’कितना मादक है संसार’!
महादेवी वर्मा
उपर्युक्त कालजयी रचना के साथ
आज की लिंकों में शामिल रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें..✍
आदरणीय एम.वर्मा जी,
आदरणीय अरुण साथी जी,
आदरणीया अनिता सैनी जी,
आदरणीया अनुराधा चौहान जी,
आदरणीय ज्योति खरे जी
धूप में देखिये पसीना सुखाने आया है
खंजरों को वह जख्म दिखाने आया है
नींद में चलते हुए यहाँ तक पहुंचा है
लोगों को लगा कि राह बताने आया है
चोरी करने की अपनी अद्भुत प्रतिभा के दम पर देशभर में दोनों की बड़ी ख्याति थी। कहा जाता है कि दोनों चोर अपने पेशे में इतने माहिर थे की किसी के आंख..
बन मधुमास मिलेंगे दोबारा
लौटेगें हसीं ख़्वाब, नक्षत्र बन
चमकेगा सौभाग्य का सितारा
हृदय में उमड़े स्वप्न गूँथू
दमकना जिंदगी तुम दुल्हन बन के
अस्तित्व अपना जताने उठाना
कब चुपके से आकर
खड़ी हो जाती है ज़िंदगी
मौत के किनारे पर
तब इंसान बेबस
होकर रह जाता है
जाने वाला कब चुपचाप से
फागुन की
समेटकर बैचेनियां
दहक रहा टेसू
महुये की
दो घूंट पीकर
बहक रहा टेसू---
सुर्ख सूरज को
चिढ़ाता खिलखिलाता
प्रेम की दीवानगी का
रूतबा बताता
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍




