स्नेहिल अभिवादन
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वसंत धरा पर ऋतुचक्र परिवर्तन कै अंतर्गत प्रकृति को नवीन रुप से श्रृंगारित करने का वार्षिक त्योहार है।
वसंत
वसंत
जीवन की खुशहाली है,आशा है यौवन और
श्रृंगार का अद्भुत राग है।
श्रृंगार का अद्भुत राग है।
वसंत पर लिखी गयी अनगिनत रचनाओं में से कुछ
प्रसिद्ध रचनाकारों की लेखनी से उदृत बंध
मेरी पसंद के आप भी आनंद लीजिए-
प्रसिद्ध रचनाकारों की लेखनी से उदृत बंध
मेरी पसंद के आप भी आनंद लीजिए-
★
सखि वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया ।
किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी--
पिक-स्वर नभ सरसाया ।
सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"
★★★★★
चैन मिटायो नारि को मैन सैन निज साज ।
याद परी सुख देन की रैन कठिन भई आज ।।
परम सुहावन से भए सबै बिरिछ बन बाग ।
तृबिध पवन लहरत चलत दहकावत उर आग ।।
कोहल अरु पपिहा गगन रटि रटि खायो प्रान ।
सोवन निसि नहिं देत है तलपत होत बिहान ।।
★★★★★
भारतेन्दु हरिश्चंद्र
★★★★★
धूप बिछाए फूल-बिछौना,
बगिय़ा पहने चांदी-सोना,
कलियां फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!
गोपालदास "नीरज"
बगिय़ा पहने चांदी-सोना,
कलियां फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!
गोपालदास "नीरज"
★★★
रंग-बिरंगी खिली-अधखिलीकिसिम-किसिम की गंधों-स्वादों वाली ये मंजरियां
तरुण आम की डाल-डाल टहनी-टहनी पर
झूम रही हैं...
चूम रही हैं--
कुसुमाकर को! ऋतुओं के राजाधिराज को !!
इनकी इठलाहट अर्पित है छुई-मुई की लोच-लाज को !!
तरुण आम की ये मंजरियाँ...
उद्धित जग की ये किन्नरियाँ
नागार्जुन
★★★★★
पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


और चलिए अब हमारे प्रिय रचनाकारों
की लेखनी से निसृत बसंत की रचनाओं का
आस्वादन करते हैं-
★★★★★
आदरणीय विश्वमोहन जी
मिलिन्द उन्मत्त मकरन्द मिलन मे,
मलयज बयार मदमस्त मदन में/
चतुर चितेरा चंचल चितवन में,
कसके हुक वक्ष-स्पन्दन में//
प्रणय पाग की घुली भंग,
रंजित पराग पुंकेसर रंग/
मुग्ध मदहोश सौन्दर्य सुधा,
रासे प्रकृति पुरुष संग //
★★★★

नवयौवना धरा
इठला कर
कोमल दूर्वादल से
अपने अंग-अंग में
पीली सरसों का उबटन लगा
अपनी धानी चूनर को
हवा में लहराती है
★
पंछियों के स्वर मधुर खोने लगे
चाँद तारे क्लांत हो सोने लगे
क्षीण होती प्रिय मिलन की आस है
मलिन मुख से जा रहा मधुमास है !
वन्दना के स्वर शिथिल हो मौन हैं
करें किसका गान अतिथि कौन है
भ्रमित नैनों में व्यथा का भास है
भाव विह्वल जा रहा मधुमास है !

आई वसंत ऋतू सर्दी को देती विदाई
तन मन में हर्ष भरती
फूली सरसों पीली पीली
लेकर आई वासंती बयार
मौसम परिवर्तन का
करती आगाज
धरती ने किया नव श्रृंगार |
दिन और अवधि के हिसाब से
हो जाता हैं अंत बसंत का
प्रत्येक वर्ष
लेकिन सच पूछो तो
बसंत छाया रहता हैं
एक उम्मीद की तरह
वर्षभर
हमारे अंदर

हरित धरा मुखरित शाखाएं
कोमल सुषमा बरसाई है
वन उपवन ताल तड़ाग
वल्लरियां मदमाई है।
कुसुम कलिका कल्प की
उतर धरा पर आयी हैं
नंदन कानन उतरा है
लो, वसंत ऋतु आयी है।
★
सुमन भये सौरभ विहीन
रंग ना भावे सुर्ख चटकीले
खंजन नयन बदरी से सीले
चाँद लुटाये चांदनी रुखी
कैसो री अब वसंत सखी।
रंग ना भावे सुर्ख चटकीले
खंजन नयन बदरी से सीले
चाँद लुटाये चांदनी रुखी
कैसो री अब वसंत सखी।
★★★★★
आदरणीया अभिलाषा चौहान
वसंत हो मेरे जीवन मेंआदरणीया अभिलाषा चौहान

वसंत हो तुम मेरे जीवन में,
जीवन के हर पलछिन में।
कितने मौसम आएं-जाएं,
कितने दुख के बादल छाएं।
चाहे बेमौसम हों बरसातें,
चाहें घिर के आएं काली रातें
★★★★★

ऐ रितुराज वसंत ! तुम तो बहुत खुशनुमा हो न !!!
आते ही धरा में रंगीनियां जो बिखेर देते हो.....
बिसरकर बीती सारी आपदाएं..........
खिलती -मुस्कराती है प्रकृति, मन बदल देते हो,
सुनो न ! अब की कुछ तो नया कर दो.........
ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो।
आते ही धरा में रंगीनियां जो बिखेर देते हो.....
बिसरकर बीती सारी आपदाएं..........
खिलती -मुस्कराती है प्रकृति, मन बदल देते हो,
सुनो न ! अब की कुछ तो नया कर दो.........
ऐ वसंत ! तुम सबको खुशियों की वजह दे दो।
★★★★★
आदरणीय पुरुषोत्तम कुमार जी
रूप अतिरंजित कली कली मुस्काई,
प्रस्फुटित कलियों के सम्पुट मदमाई,
स्वागत है बसंत ने ली फिर अंगड़ाई।
कूक कोयल की संगीत नई भर लाई,
मंत्रमुग्ध होकर भौंरे भन-भन बौराए,
स्वागत है बसंत ने ली फिर अंगड़ाई।
★★★★★
आदरणीया अनुराधा जी
ऋतुराज बसंत
हवाओं में
झूमतीं फसलें
महकती अमराई
सूरज की किरणों से
धरती इठलाई
पीले लहराते
सरसों के खेत
जैसे पीली चूनर
ओढ़कर गोरी
★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीया अनुराधा जी
ऋतुराज बसंत
हवाओं में
झूमतीं फसलें
महकती अमराई
सूरज की किरणों से
धरती इठलाई
पीले लहराते
सरसों के खेत
जैसे पीली चूनर
ओढ़कर गोरी
★★★★★
और चलते-चलते
आदरणीया रेणु जी
ये मन कितना अकेला था
एकाकीपन में खोया था ,
किसी ख़ुशी का इन्तजार कहाँ
बुझा - बुझा हर रोयाँ था ;
बरसे सहसा तपते मन पे
शीतल मस्त फुहार से तुम !
मधु सपना बन ठहर गए -
थकी मांदी सी आँखों में ,
हो पुलकित मन ने उड़ान भरी -
थकन बसी थी पांखोंमें ;
उल्लास का ले आये तोहफा -
मीठी मन की मनुहार से तुम !!
★★★★★
आपको आज का यह विशेषांक कैसा लगा?
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया सदैव मनोबल में वृद्धि करती है। आपके विचार प्रतिक्रिया के माध्यम से अवश्य प्रेषित करे।
अगला विषय जानने के लिए कल का अंक पढ़ना न भूले।
आज के लिए इतना ही
आज्ञा दें
#श्वेता सिन्हा
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