फीफा विश्वकप फुटबॉल
जादू सर चढ़कर बोल रहा है।
जादू सर चढ़कर बोल रहा है।
फीफा विश्वकप का यह 21वाँ संस्करण है। 31 दिन चलने वाले इस खेल उत्सव में 32 टीमें प्रतिभागी हैं। विश्व के तमाम देशों के दल रंग-बिरंगी जर्सी पहने दर्शकों से खचाखच स्टेडियम में अपनी खेल प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन कर रहे हैंं।
यह एक ऐसा सर्वजन परिचित खेल जिससे बच्चा- बच्चा परिचित है ।
सवा सौ करोड़ आबादी वाले हमारे देश का इस विश्वस्तरीय प्रतियोगिता
में प्रतिभागी न होना निराशाजनक है। यह सही है संसाधनों की कमी तो सदैव रही है पर फिर भी क्रिकेट जैसे खेल के प्रति जो रुझान है वैसा किसी अन्य खेल के प्रति दृष्टिगत नहीं है।
में प्रतिभागी न होना निराशाजनक है। यह सही है संसाधनों की कमी तो सदैव रही है पर फिर भी क्रिकेट जैसे खेल के प्रति जो रुझान है वैसा किसी अन्य खेल के प्रति दृष्टिगत नहीं है।
सादर नमस्कार
चलिए आज की रचनाओं की ओर
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मन उच्छल प्रिय हलचल पल पल,
तल विकल लहर ज्यों मचल मचल//
हिय गह्वर भर भाव भंवर,
आकुल नयन घन आर्द्र तरल//
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तल विकल लहर ज्यों मचल मचल//
हिय गह्वर भर भाव भंवर,
आकुल नयन घन आर्द्र तरल//
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आदरणीय मनोज कायल जी
अजनबी हो गया हूँ अपने आप से
ख़ुदा जब से तुम्हें मान लिया
बदल गयी जिंदगानी मेरी
रूह ने मेरी लिबास जब से तेरा ओढ़ लिया
लिबास जब से तेरा ओढ़ लिया
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आदरणीया डॉ.अपर्णा त्रिपाठी जी
कीमत नही चुका पाओगे, धरती मां के आंचल का
बस बातों से हरा न होगा, बंजर सीना जंगल का
पैसा छोड कुछ पुण्य कमाओ, पेडं लगा वीरानों में
करती हूँ आह्वाहन मै, बस पढे लिखे समझदारों से
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आदरणीय पंकज प्रियम् जी
सब लगे हैं अपनी सुनाने में।
दुश्मनों से नहीं है कोई खतरा
अपने ही लगे हैं अब सताने में।
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आदरणीया मीना भारद्वाज जी
गुजरे कुछ पल
सांझ सकारे
विश्रांति पल
कुदरत के संग
देते उमंग
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आदरणीया डॉ.इन्दिरा जी
अधर लालिमा जबई लगाऊं
मन ही मन शरमा जाऊं
अधर बैठ कान्हा मुस्काये
लाली नाय लगा पाऊ !
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उलूक के पन्ने की एक पुरानी कतरन
आदरणीय सुशील सर की कलम से

ईडियट
‘उलूक’ को
कहाँ कुछ
समझ में
आता है
बहुत बार
बहुत से
झाडुओं
की कहानी
झाडू
लगाने वालों
के मुँह से
सुन चुका
होना ही
काफी
नहीं होता है
उलूक के पन्ने की एक पुरानी कतरन
आदरणीय सुशील सर की कलम से

ईडियट
‘उलूक’ को
कहाँ कुछ
समझ में
आता है
बहुत बार
बहुत से
झाडुओं
की कहानी
झाडू
लगाने वालों
के मुँह से
सुन चुका
होना ही
काफी
नहीं होता है






