शीर्षक पंक्ति: आदरणीय नूपुरं जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
विनम्र श्रद्धांजलि!
अपने स्वर से दुनिया को विविधतापूर्ण मनोरंजन देनेवाली आशा जी अपने पीछे संगीत का समृद्ध ख़ज़ाना छोड़ गयीं. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे.
उनके कुछ नग़्मे जो मेरे दिल को छू गये-
सोमवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
झूमर से झूमते अमलतास फूले
रास्तों के किनारे सोनमोहर बिछे
छज्जे-छज्जे पर बोगनवेलिया लगे
मजाल है कि कोई भी रंग छूट जाए
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धीरे-धीरे कुछ आँखों को इसमें भी कला नज़र आई,बेतरतीब सी ये आदत, एक अजीब सी पहचान बन पाई।जो था कभी आलस का खेल, अब बन गया एक तमाशा,
लोग यहाँ तस्वीरें खींचें, जैसे कोई अनोखा नज़ारा।
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कितनी चट्टानें थीं भारी
रस्तों में पावन सलिला के,
राह बनाती उन्हें तोड़ती
ठुक-ठुक चलती थी अंतर में!
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यूनियन अध्यक्ष ने माइक संभाला, सभा शुरू हुई. आज उनका लहजा बदला हुआ था, आवाज में गुस्सा था और ऊँची थी, "साथियों, प्रबंधन कहता है कि कारखाना घाटे में है! जिसके कारण वे इसे चलाने में असमर्थ हैं, वे सरकार से इसे बंद करने की परमिशन मांग रहे हैं. लेकिन आज हमारे पास वो सच है जो इनके मुहँ बन्द कर देगा."
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आज पढ़िए...'पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना'

कितनी चट्टानें थीं भारी
जवाब देंहटाएंसुंदर अंक
आभार
वंदन
सुंदर प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंसुप्रभात! स्वर साम्राज्ञी आशा भोंसले जी को विनम्र श्रद्धांजलि! आज के अंक में 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु आभार !
जवाब देंहटाएंआशा ताई को विनम्र श्रद्धान्जलि 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷सुंदर अंक ।
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