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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

4700 ..रात को जब खिड़की से आये देख उसे दिल घबरा जाए

 सादर अभिवादन

प्राचीन कथा


दरअसल रावण की बेटी और हनुमान जी की ये कथा थाईलैंड के रामकियेन नामक रामायण में मिलती है जिसके अनुसार रावण की एक बेटी थी। जिसका नाम सुवर्णमछा था। वो देखने में बहुत ही सुंदर थी। उसे सोने की जलपरी कहा गया है। राम सेतु निर्माण के समय हनुमान जी और वानर सेना समुद्र में पत्थर फेंक कर जमाते थे, लेकिन कुछ समय बाद वे गायब हो जाते थे। जब हनुमान जी को इस घटना का पता चला तो वे समुद्र में उतर कर देखने लगे कि आखिरी चट्टान कहां गायब हो रही है। उन्होंने देखा कि पानी के अंदर रहने वाले लोग उन्हें कहीं ले जा रहे हैं। तब उन लोगों के पीछे हनुमान जी गए और देखते हैं कि एक मत्स्यकन्या उन सबकी नेता है तो उसे चुनौती देते हैं, परंतु वो कन्या हनुमान जी को देखकर ही उनके प्रेम में पड़ जाती है। हनुमान जी ये समझ जाते हैं और तब वापस समुद्र के तल पर ले आते हैं और उससे पूछते हैं। तुम कौन हो वह बताती है कि मैं रावण की बेटी हूं, फिर हनुमान जी कन्या को समझाते हैं कि रावण ने कितने बुरे कार्य किए हैं और क्यों हम यह पुल बना रहे हैं तब वह कन्या समझ जाती है और सभी चट्टान लौटा देती है।

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थोड़ा रुक जाओ, अपने दिल की बात सुनो।
जल्दी मत करो, अभी समय है समझने का।

जैसे कच्चे आम को धीरे-धीरे चखते हैं,
वैसे ही जीवन को आराम से महसूस करो।




रात को जब खिड़की से आये
देख उसे दिल घबरा जाए
मन चाहे कर दूँ मैं शोर
को सखी साजन ? ना सखी चोर !
**
जैसे ही वो घर में आये
मेरी साँस गले घुट जाए
रौब दाब है उसका जबरा
को सखी साजन ? ना सखी ससुरा !





शाम के आठ बजे प्रिया ऑफिस से सीधे 'मेवाड़ भोजनालय' पहुँची. रामजी काउंटर पर थे,
प्रशांत बाबू अभी नहीं आए थे.

"काका, आज चमत्कार हो गया. टीम ने वह कर दिखाया जो नामुमकिन लग रहा था,
" प्रिया ने उत्साह से कहा.

रामजी ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया. "प्रशांत बाबू कहते हैं कि जब इंसान खुद को
छोटा समझना बंद कर देता है, तो पहाड़ भी हिला सकता है.
आज उनकी एसोसिएशन की मीटिंग है,
वे देर से आएंगे."

प्रिया ने बाहर सड़क की ओर देखा. भीड़ भाग रही थी. अब उसे कोई डर नहीं था.
उसने महसूस किया कि उसका अक्स अब आईने से बाहर आकर खुशबू हो रहा था.



अबके फागुन 
टेसू नहीं खिले
बेरंग, उदास जंगलों 
में पत्तों के बिछावन
संगीनों की नोंक से रक्तरंजित 
मासूमों के दर्द सहला रहे हैं...।





यह सभ्यता जन्मी नहीं -
अपलोड हुई है।
जिसमें मनुष्य नहीं रहते,
प्रोफ़ाइल्स बसती हैं।
आँखें अब देखने के लिए नहीं?
सिर्फ़
दिखाने के लिए खुलती हैं।
जितना दिल नहीं धड़कता
उससे ज्यादा तो
नोटिफिकेशन बजते हैं।





आना सुख था, जाना भी है 
किया पसार, समेट रही अब, 
जग इक अनुभव, कब यह दुख है?
बिखरे सूत्र लपेट रही अब ! 

निर्मल दृष्टि से सृष्टि सुंदर
देव सहायक, हैं सुखदायक 

सादर समर्पित
सादर वंदन

1 टिप्पणी:

  1. बृहस्तिवार
    मेरा दिन नही है
    आज पम्मी जी को फिर से आना था
    भूल गई होंगी वे
    उसे क्षमा कर दीजिएगा
    सादर

    जवाब देंहटाएं

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