गुरुवारिय प्रस्तुतिकरण लिए आज फिर हाजिर हूं
नई सरकार, वही सम्राट
जम्हूरी, जलालत ललाट,
नई सरकार, वही ' सम्राट'।
जो नैतिकता को काट- काट,
और मर्यादा छांट- छांट।
इज्जत आबरू चाट- चाट,
नराधमों में बांट- बांट।नई सरकार, वही बांट- बांट।
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वसंत-पंचमी का त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर पीटने की तरह हो गया है ! न कोई..
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वो लम्हा तुम जरा बताओ,
जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,
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अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
समाज में अपराध कब नहीं थे? हमेशा थे। किन्तु अब दिनों-दिन अपराध की जघन्यता बढ़ती जा रही है। कोई इंटरनेट को दोष देता है तो कोई पहनावे को, तो कोई वर्तमान वातावरण और संगत को। क्या अतीत में पहनावों में परिवर्तन नहीं हुए? या फिर आपसी संपर्क नहीं रहा? अतीत तो युद्धों के भयावह वातावरण से ग्रस्त था।
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शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंस
सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे
एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी,
सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे।
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पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
सुंदर अंक
जवाब देंहटाएंआज काफी समय उपरांत
आपकी रचना इस के मंच में
आभार
सादर
सुंदर लिंक और हार्दिक आभार!
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