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बुधवार, 7 जनवरी 2026

4616..हो नजरो में..

 ।।उषा स्वस्ति ।।

प्रकृति कैसे बताऊं तू कितनी प्यारी,

हर दिन तेरी लीला न्यारी,

तू कर देती है मन मोहित,

जब सुबह होती प्यारी।

नरेंद्र शर्मा 

लिजिए प्रस्तुतिकरण के क्रम को आगे बढाते हुए..

खैर, बस दो शब्द और

वह कौन शख्स है

जो एकदम फक्कड़ 

जैसा हंसता है...

और फिर झट से

चुप हो जाता है ऐसे 

जैसे रोते बच्चे को

मां मिल गई हो..

✨️

ये पंछी कहाँ से आते हैं ?

बच्चों द्वारा दिया गया सरप्राइज

        

ये पंछी कहाँ से आते हैं

और दूर कहाँ उड़ जाते हैं

हम इनके गीतों को सुनते,

सपने बुनते रह जाते हैं !

✨️

फलक



हो नजरों में, पर कितने अंजान, अब तलक,

लगे पास, पर दूर कितने, वो फलक!

जी चाहे, छू लूं इन हाथों से,

उन रंगों को, उन पंखों को, उन अंगों को,

हटा दूं, बादलों के वो पर्दे,

तोड़ दूं, हदें,

जगती, कैसी ये ललक!

✨️

कविता, थलपरी

माथे पर सिन्दूर 

और सिकर 

मिश्रित ही बहता है 

सुर्य की तपती 

किरणों से झुलसती है देह 

बार-बार उठाती है घमेला ..

✨️

मुफ्तखोरी

जब भी, जो भी जुबां पे आता है तुम्हारी, बक देते हो, 

मुफ्त में जिसका भी लिखा हुआ मिल जाए पढ़ देते हो, 

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '✍️


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