गुरुवारिय प्रस्तुतिकरण के क्रम को बढाते हुए..
ज़रूरी है युद्ध—
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थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी
यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी,
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मौन का पड़ाव
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दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
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थप्पड खाकर वो 'डिस' उनकी
यूं, थोड़ी हमने भी चख दी थी,
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।।प्रातःवंदन।।
"मैं चलते-चलते
इतना थक गया हूँ,
चल नहीं सकता
मगर मैं सूर्य हूँ,
संध्या से पहले
ढल नहीं सकता "
कुँअर बेचैन
जीवन की गतिशीलता और इस पर विचार व्यक्त का इससे सुंदर भावपूर्ण रूप और क्या हो सकता, साथ ही प्रस्तुतिकरण पर नजर जरूर डाले..✍️
इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम
जो बिन बोले गुफ्त़गू कीं ऑंखों से ऑंखों ने सनम
और तुम मुस्कुराये हर ज़ख्म का इलाज़ हो गया है ।
जब से तुझको नज़र भर कर देखी हैं ऑंखें सनम
आशिकों की तरह आशिकाना मिज़ाज हो गया है
इश्क़ में तेरे डूबी जिस्म से रूह में समा गये सनम
दुनिया कहती है मेरा दीवानों सा अंदाज़ हो गया है ।
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है अंधेरा तो उजाला भी
यहां पर आयेगा
यह मयूरा वन के भीतर
इस तरह हर्षायेगा
जिंदगानी लेगी करवट ..
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इसे वो पढ़ें जो हर वक्त कहते हैं कि ''क्या करें...फुरसत ही नहीं मिल रही''....
पहले ऊपर का चित्र देखिए फिर पढ़िए आज की ये पोस्ट...ये उनके लिए है जो हर..
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वह चेतावनी भी देती है।
आंखें दिखाती है,
बार-बार,
बिना चिल्लाए ।
मगर हम हैं कि..
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फिल्म समीक्षाः मानवीय संबंधों पर बनी बेहतरीन फिल्म केडी
इन दिनों मुझे तमिल फिल्में देखने का चस्का लग गया है. बेशक, दक्षिण भारतीय फिल्मों में पर लाउड होने का आरोप लगता है और ज्यादातर मामलों में सही हो होता है. पर अब हिंदी फिल्में लाउड हो रही हैं और ज्यादातर हिंदी फिल्मों में कथानक गुम हो रहा है...
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।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️
“जीवन का अर्थ खोजने के लिए नहीं, बल्कि उसे जीने के लिए है।”
“जीवन का उद्देश्य खुश रहना है।”
“हर पल का अर्थपूर्ण तरीके से जीना ही जीवन का अर्थ है।”
“दूसरों की सेवा करना ही जीवन का सच्चा अर्थ है।” –
“अपनी पूरी क्षमता तक जीना ही जीवन का अर्थ है।”
आपकी दृष्टिकोण से जीवन की परिभाषा क्या है?
जो मस्तक झुकते आए हैं,
अब उन्हें जरा तन जाने दो,
जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,
उसे फिर से स्वर बन जाने दो।
बाज़ार सजा है झूठों का,
तुम अपना सच ले अड़ जाओ,
इतिहास लिखे जो कायरता,
उस पन्ने को फट जाने दो।
मैं जल हूँ
घर से नदी-नालों तक
करता कल-कल हूँ
उत्तर से दक्षिण तक
चलता पल-पल हूँ
मुझमें कचरा न फैलाओ
मुझे बचाओ
घने बादल न चुराओ
मुझे बचाओ
“तुम जो भी हो, तुम जो भी करते हो, तुम अद्भुत और अद्वितीय हो. इस बात पर कभी शक मत करो।”
“यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह कर सकते हो, तो तुम कर सकते हो. और यदि तुम्हें लगता है कि तुम यह नहीं कर सकते हो, तो तुम सही हो।”
“खुशी वह यात्रा है, मंजिल नहीं।”
“सफलता वह नहीं है जो आप हासिल करते हैं, बल्कि वह है जो आप बन जाते हैं जब आप उसे हासिल करते हैं।”
“सफलता अंतिम गंतव्य नहीं है, बल्कि यात्रा का आनंद लेने की प्रक्रिया है।"
मौन बदलता है दृष्टिकोण।
देखने देता है दूसरा पक्ष ।
यज्ञ की समिधा है मौन ।
मौन गहरे पैठ पा जाता है मर्म।
मौन है गहरे कूप का जल ।
मन प्रांत कर देता शीतल ।
मौन का आकाश है स्वतंत्र।
मौन की व्याख्या है मौन ।
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ. (सुश्री) शरद सिंह जी की रचना से.
सादर अभिवादन.
रविवारीय अंक में पढ़िए पसंदीदा रचनाएँ -
कविता | भ्रम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
तू ही संत असंत महंत है, तू क्षितिज है छोर दिगंत है,
तू अनादि-आदि न अंत है, तू असीम अपार, अनंत है,
तू अघोर घोर जयंत है, तू ही सर्व लोक चरा-चरम्,
तू ही डम-ड-डम, तू ही बम-ब-बम, तू त्रयम्बकम्, तू शिव:-शिवम्.
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व्यक्तिगत कुंठा जब दंभ का चोला पहन, शब्दों का रूप अख्तियार करती है, तो अनर्थ ही होता है
खुद के गुमान में डूबे ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि जब आपका व्यवहार, बर्ताव, कथनी करनी का फर्क, ढोंग या उदण्डता लोगों को बार-बार दिखाई देती है, तो वे आपको नकार देते हैं ! आपका समाज को खंडित, विखंडित करने या देश को तनावग्रस्त या कमजोर करने का प्रयास जनता कतई बर्दास्त नहीं करती ! झूठे किस्से, कहानियों, आरोपों को वह समझने-पहचानने लगी है ! समय बदल रहा है, जितनी जल्दी हो समझ व संभल जाएं नहीं तो अप्रासंगिक होते देर नहीं लगेगी ! हाल ही के बहुतेरे उदाहरण सामने हैं ! बड़े-बड़े तीसमारखाँ निपटा दिए जनता ने ! क्योंकि अब देश के अवाम को राष्ट्रबोध, स्वयंबोध, शत्रुबोध, इतिहासबोध अच्छी तरह होने लगा है ! अब वह बहकावे में नहीं आती !*****
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल (बनारस यात्रा भाग -1)
इस बार ग़ज़ल कुंभ का आयोजन धर्म और अध्यात्म की प्राचीन नगरी काशी (बनारस-वाराणसी)में 10/11जनवरी,2026 को हुआ।इस बार इस कार्यक्रम में हम सभी साथियों ने ग़ज़ल पाठ तो किया ही साथ ही अपने परिजनों के संग पावन नगरी काशी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ सारनाथ जैसे ऐतिहासिक महत्व के स्थलों के भ्रमण का आनंद भी लिया।*****
फिर मिलेंगे.
रवीन्द्र सिंह यादव
जावेद अख्तर
भारतीय सिनेमा के एक दिग्गज कवि, गीतकार और पटकथा लेखक हैं। उनका जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था। वे हिंदी सिनेमा के उन चुनिंदा व्यक्तित्व में से हैं जिन्होंने शब्दों के माध्यम से भारतीय समाज और सिनेमा की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जावेद अख़्तर भारतीय सिनेमा और साहित्य के एक ऐसे स्तंभ हैं, जिनका लेखन अपनी सादगी, गहराई और सामाजिक चेतना के लिए पहचाना जाता है। उनकी शैली को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: पटकथा लेखन, गीत और कविता।
जावेद अख़्तर की सबसे बड़ी खूबी उनकी भाषा की सादगी है। उनके अनुसार, लेखन ऐसा होना चाहिए जिसे अधिक से अधिक लोग आसानी से समझ सके। वे कठिन उर्दू या हिंदी शब्दों के बजाय बोलचाल की भाषा का उपयोग करते हैं, जिससे उनके गीत और कविताएँ सीधे दिल को छूती हैं।
उनके फिल्मी गीत मात्र मनोरंजन नहीं होते, बल्कि उनमें जीवन के गहरे फलसफे छिपे होते हैं। लगान, कल हो ना हो और दिल चाहता है जैसी फिल्मों में उनके लिखे गीत मानवीय भावनाओं और अस्तित्व के सवालों को खूबसूरती से व्यक्त करते हैं।
तरकश,लावा,इन अदर वर्ड्स इनकी प्रमुख कृतियॉं है।
वे केवल एक लेखक ही नहीं, बल्कि एक प्रखर वक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। वे राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। जावेद अख्तर सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर निडरता से अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं।
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आइए आज पढ़ते हैं उनकी कुछ ग़ज़लें
और सुनते हैं कुछ शाइरी।
जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो
फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है
किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो
ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने
क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो
इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँ है
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो
तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो
ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो
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याद उसे भी एक अधूरा अफ़्साना तो होगा
कल रस्ते में उस ने हम को पहचाना तो होगा
डर हम को भी लगता है रस्ते के सन्नाटे से
लेकिन एक सफ़र पर ऐ दिल अब जाना तो होगा
कुछ बातों के मतलब हैं और कुछ मतलब की बातें
जो ये फ़र्क़ समझ लेगा वो दीवाना तो होगा
दिल की बातें नहीं है तो दिलचस्प ही कुछ बातें हों
ज़िंदा रहना है तो दिल को बहलाना तो होगा
जीत के भी वो शर्मिंदा है हार के भी हम नाज़ाँ
कम से कम वो दिल ही दिल में ये माना तो होगा
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मिसाल इसकी कहाँ है कोई ज़माने में
कि सारे खोने के ग़म पाए हमने पाने में
वो शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में
जो मुंतिज़र न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलटके आने में
लतीफ़ था वो तख़य्युल से, ख्वाब से नाज़ुक
गँवा दिया उसे हमने ही आज़माने में
समझ लिया था कभी इक सराब को दरिया
पर इक सुकून था हमको फ़रेब खाने में
झुका दर॰ख्त हवा से, तो आँधियों ने कहा
॰ज्यादा फ़॰र्क नहीं झुकने-टूट जाने में
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दर्द अपनाता है पराए कौन
कौन सुनता है और सुनाए कौन
कौन दोहराए फिर वही बातें
ग़म अभी सोया है, जगाए कौन
अब सुकूँ है तो भूलने में है
लेकिन उस शख्स को भुलाए कौन
वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं
कौन दुख झेले, आज़माए कौन
आज फिर दिल है कुछ उदास-उदास
देखिए आज याद आए कौन
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मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं
तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं
कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ
कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं
कभी तो बात की उसने, कभी रहा ख़ामोश
कभी तो हँसके मिला और कभी मिला भी नहीं
कभी जो तल्ख़-कलामी थी वो भी ख़त्म हुई
कभी गिला था हमें उनसे अब गिला भी नहीं
वो चीख़ उभरी, बड़ी देर गूँजी, डूब गई
हर एक सुनता था लेकिन कोई हिला भी नहीं
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