निवेदन।


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शनिवार, 31 जनवरी 2026

4639 ..ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी!

 सादर अभिवादन 


जनवरी जा रहे हो तुम
लम्बी प्रतीक्षा देते हुए इकट्ठा
11 माह का इंतजार झेलना होगा
खैर जग की रीति है
जो है सो 

रचनाएं देखें




अब 
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
उसे नहलाती धुलाती,
ब्रश कराती,
और तो और खुद से पहले खाना भी खिलाती है,
चोट उसे लगी है इस कल्पना में भी,
वो खुद ही रोती है,





समुन्दर की असंख्य लहरों पर 
डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी 
बढ़ता जाता है जहाज 
आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं 
क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद 
आकाश छू रहा है लहरों को 





ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी!
नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!
सत्ता की भूख में,
लालच की आग में—
इंसानियत जले तो
हुकूमत नहीं चलेगी!
नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!
जब रक्षक ही
गोली चलाएँ,
तो बताओ—




"नीलम मैम ने आंखें नीचे कर लीं लेकिन कुछ कहा नहीं। देव सर का हृदय धड़कने लगा। समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें? डर था कि कहीं कोई बात नीलम मैम को बुरी न लग जाए। अचानक नीलम मैम बोली-"एक छात्र कह रहा था आप जैसा गणित कोई नहीं पढ़ाता!"देव सर ने नीलम मैम की तरफ देखते हुए कहा कि आप जैसी हिंदी भी कोई नहीं पढ़ाता। दोनों मुस्कराने लगे। फिर दोनों ही शांत हो गए। लेकिन पिलखन का पेड़ साक्षी था कि इस शांति में भी एक अपनापन था। एक प्रेम कहानी थी और दो प्रेमी थे जो प्रेम डगर पर चल पड़े थे।





चैता के 
गीत कहाँ 
शहरों के हिस्से,
वक़्त की 
किताबों में 
टेसू के किस्से,
स्मृतियों में
मृदंग
बजते करताल.




फिर दुनिया के ज्ञानियों से ज्ञान मिला
कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन ही।
अपने व सगे ही क्यों भला .. साथ तो तन भी 
छोड़ ही तो जाता है हमारा .. कभी-ना-कभी।
लगा फिर तो बौना .. बदल जाना यकायक तेरा .
*****
मौसम बदल रहा है
देश के कायदे भी बदल रहे हैं
कब क्या हो जाए
पता नहीं
जिधर से तेज हवा आए
पीठ उसकी ओर कर लें

वंदन

आज बस
सादर वंदंन

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

4638...चुप भी एक गुनाह है

 शुक्रवारीय अंक में 

आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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शहीद दिवस

आज महात्मा गाँधी जी की

पुण्यतिथि है।

वैचारिक मतभेदों को

किनारे रखकर,

फालतू के तर्क-वितर्क में

पड़े बिना

आइये सच्चे मन से बापू को कुछ

श्रद्धा सुमन अर्पित करें।

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दुख से दूर पहुँचकर गाँधी।

सुख से मौन खड़े हो

मरते-खपते इंसानों के

इस भारत में तुम्हीं बड़े हो


- केदारनाथ अग्रवाल 


एक दिन इतिहास पूछेगा

कि तुमने जन्म गाँधी को दिया था,

जिस समय अधिकार, शोषण, स्वार्थ

हो निर्लज्ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्द्व

सद्य: जगे, संभले राष्ट्र में घुन-से लगे

जर्जर उसे करते रहे थे,

तुम कहाँ थे? और तुमने क्या किया था?


- हरिवंशराय बच्चन


गाँधी तूफ़ान के पिता

और बाजों के भी बाज थे ।

क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।


-रामधारी सिंह "दिनकर"


तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,

हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,

तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,

हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!

तुम पूर्ण इकाई जीवन की,

जिसमें असार भव-शून्य लीन;

आधार अमर, होगी जिस पर

भावी की संस्कृति समासीन!


- सुमित्रानंदन पंत


युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख

युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,

तुम अचल मेखला बन भू की

खींचते काल पर अमिट रेख


-सोहनलाल द्विवेदी




आज की नियमित रचनाऍं- 

गए ढूँढने जो यहाँ क़ातिलों को,
मिला उनके हाथों में क़त्ल-ओ-सामान।
 
थी बस्ती कभी ख़्वाब की रौशनी,
बना मोड़ हर आज तो श्मशान।


फूल बासी 
चढ़ रहे हैं 
देवता के माथ पर,
नहीं मेहंदी 
हलद के रंग 
चाँदनी के हाथ पर,
मिल रहे हैं 
खुशबुओं के
संग हवाओं में ज़हर.


यदि मेरे हाथ में शासन की बागडोर हो


टीवी पर आने वाले झूठे विज्ञापनों के जाल से
मुक्त करूं आम जनता को
बढ़ावा मिले योग और सात्विकता को
हर बच्चे की पहुँच हो
संगीत व नृत्य तक
पेड़ लगाना अनिवार्य हो जाये

हर बच्चे के जन्म पर....


कार,लिफ़ाफ़ा और लड्डू 


 चाची की आवाज़ ने बातचीत में दखल दिया. वे गर्म चपातियाँ लिए वहाँ थीं. खड़ी थीं. "बनस्थली में तो खादी पहननी पड़ती है. कुर्ता-पायजामा या सलवार-कमीज, सब खादी का. मेरी भांजी बताया था. और किताबें भी वहीं से मिलेंगी. कॉलेज बताएगा कि क्या चाहिए, और कैम्पस में ही प्रकाशक से भी कम दाम में मिल जाएंगी. खादी का कपड़ा और दर्जी भी वहीं मिल जाएंगे. उनका अपना सिस्टम है."


पिगी बैंक में सूअर ही क्यों🤔


कपड़ों की फिक्र न करो,"भले ही इतिहास, जिज्ञासाएं, कथाएं, कुछ भी हों, आज पिगी बैंक का मतलब या पर्याय सिक्के जमा करने के लिए बने किसी भी आकार और रूप के उपकरण से हो गया है ! ये चाहे मिट्टी से बनें हों, प्लास्टिक से या किसी भी दूसरी धातु से, बच्चों में अत्यंत प्रिय, इनका नाम पिगी बैंक ही होता है ! समय के साथ अब इनकी बनावट भी बदली है और यह विभिन्न आकारों-प्रकारों में मिलने लगा है ! पर भले ही इसका आकार-प्रकार और इसको बनाने में प्रयुक्त पदार्थ बदल गए हों, पर जो चीज नहीं बदली, वह है इसका बचपन से सीख देता आ रहा यह संदेश कि बचत  करना अच्छी बात है और यह नियम लोगों के बड़े होने पर आदत में तब्दील होता चला जाता है !  


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

4637..वही बांट- बांट..

 गुरुवारिय प्रस्तुतिकरण लिए आज फिर हाजिर हूं

नई सरकार, वही सम्राट

 जम्हूरी, जलालत ललाट,

नई सरकार, वही ' सम्राट'।

जो नैतिकता को काट- काट,

और मर्यादा छांट- छांट।


इज्जत आबरू चाट- चाट,

नराधमों में बांट- बांट।नई सरकार, वही  बांट- बांट।

✨️

वसंत-पंचमी लघुकथा



वसंत-पंचमी का त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर पीटने की तरह हो गया है ! न कोई..

✨️

सवाल

वो लम्हा तुम जरा बताओ,

जब मैं तुम्हारे संग नहीं था,

✨️

चर्चा प्लस  

अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है 

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                             

     समाज में अपराध कब नहीं थे? हमेशा थे। किन्तु अब दिनों-दिन अपराध की जघन्यता बढ़ती जा रही है। कोई इंटरनेट को दोष देता है तो कोई पहनावे को, तो कोई वर्तमान वातावरण और संगत को। क्या अतीत में पहनावों में परिवर्तन नहीं हुए? या फिर आपसी संपर्क नहीं रहा? अतीत तो युद्धों के भयावह वातावरण से ग्रस्त था। 

✨️

बुलंदी के मस्त,ताब तेवर


शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंस

सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे

एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी,

सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे।

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️



बुधवार, 28 जनवरी 2026

4636..किसकी है जनवरी..

प्रातःवंदन 

 "किसकी है जनवरी,

किसका अगस्त है?

कौन यहाँ सुखी है, कौन यहाँ मस्त है?

सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है

गालियाँ भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है

चोर है, डाकू है, झुठा-मक्कार है

कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है

जैसे भी टिकट मिला

जहाँ भी टिकट मिला

शासन के घोड़े पर वह भी सवार है

उसी की जनवरी छब्बीस

उसी का पन्द्रह अगस्त है

बाक़ी सब दुखी है, बाक़ी सब पस्त है….."

नागार्जुन 

सामाजिक सार लिए कथन के साथ  ,

बुधवारिय प्रस्तुतिकरण में शामिल रचनात्मक रूप कुछ इस प्रकार है✍️ 

मनुष्य

अगर मुझे मनुष्य होना सीखना हो

तो मैं तुम्हारे मौन से शुरू करूँगा

जहाँ करुणा

किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती।

अगर मुझे कोई प्रश्न सताने लगे

तो उत्तर मैं किताबों में नहीं

तुम्हारी आँखों के ठहराव में खोजूँगा

जहाँ गहराइयों में जवाब तैरते हैं..

✨️

ख़ाली किनारे

✍️ अनीता सैनी

……..

यहाँ इस

समाज नाम की

चारदीवारी में

किसी न किसी को

कुछ न कुछ बचाने का ज़िम्मा

चुपचाप सौंप दिया जाता है।

✨️

एक त्योहार....



(१)

सत्तहत्तर वर्षों से

ठिठुरता गणतंत्र

पदचापों की

गरमाहट से

जागकर

कोहरे में लिपटा

राजपथ

पर कुनमुनाता है।..

✨️

स्पर्शबिंदु" - "The Tangent"

मैं जानता हूँ—

तुम मुझे समग्र रूप से

स्पर्शित नहीं कर सकती

क्योंकि

तुम एक सरल रेखा हो

और मैं—वृत्त।..

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

4635....मौसमी देशभक्त बनने के लिए

जिन लोगों में आत्म-बोध की प्रबल भावना होती है, वे अपनी शक्तियों और कमजोरियों के प्रति अधिक जागरूक होते हैं, अधिक आत्मविश्वासी होते हैं और उनमें उच्च आत्म-सम्मान होता है ।  इसके विपरीत, जिसकी व्यक्तिगत पहचान संरचना जितनी अधिक फैली हुई है, व्यक्ति उतना ही अधिक भ्रमित प्रतीत होता है और उनका आत्म-सम्मान उतना ही कमजोर होता है।
व्यक्तिगत पहचान का निर्माण और विकास समाज, परिवार, दोस्त, जाति, नस्ल, संस्कृति, धर्म, स्थान, रुचि, , बौद्धिक स्तर,आत्म-अभिव्यक्ति और जीवन के अनुभवों जैसे विभिन्न आंतरिक और बाह्य कारकों से प्रभावित होता है।
एक प्रश्न है मेरा
पर क्या आपने
अपने अस्तित्व को
चिन्हित करते सारे आभूषण
उतारकर कभी 
स्वयं को पहचानने के प्रयास किया है?
स्वयं पर लगे नाम,उपनाम,जाति,
धर्म,शहर,गाँव के स्टीकर को अलग करके
पहचानने का प्रयास किया है?
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आज की रचनाऍं- 

मैं रोज़
थोड़ा-थोड़ा छूटती रही।
मैंने तुम्हें
पीठ फेरते नहीं देखा,
मैंने तुम्हें
मेरे भीतर से
खिसकते हुए देखा है।
स्त्रियाँ
दूरी कदमों से नहीं नापतीं,
हम दूरी
बदलते स्पर्शों से पहचानती हैं।



कारण-ए-मौत को
परिस्थितिजन्य लिख देना,
और परिस्थितियाँ
हम तय करेंगे।

खून अगर सड़क पर फैला हो
तो लिखना
नमूने सुरक्षित नहीं थे।

आँसू अगर गवाह हों
तो लिखना
भावनात्मक साक्ष्य अमान्य है।



वैसे भी स्वामी विवेकानंद बहुत ज्यादा दिनों तक एक जगह पर नहीं रहते थे। पैदल, रेल या बस से वह यात्रा किया करते थे। वह पूरे भारत का भ्रमण करके देश की दशा को समझना चाहते थे। एक स्टेशन पर जब रेलगाड़ी रुकी, तो दो अंग्रेज अफसर उस डिब्बे में चढ़े जिसमें स्वामी विवेकानंद बैठे हुए थे। वह दोनों अंग्रेज एक महिला के बगल में बैठ गए। उस महिला की गोद में बच्चा था। 




दोहे-चौपाई, कलमा, ख़ूब रटे, पर पलटे नहीं संविधान के पन्ने,

बस इतना ही काफ़ी है हमारा मौसमी देशभक्त बनने के लिए।



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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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सोमवार, 26 जनवरी 2026

4634...गर्व से कहें हम सब एक हैं, दुनिया को ये दिखाएँ...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया कविता रावत जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

गणतंत्र दिवस के 77 वें उत्सव की शुभकामनाएँ।

चित्र साभार: गूगल

26 जनवरी 1950 का दिन हमें पूर्ण स्वतंत्रता को स्मरण कराता है जब हमारा संविधान इस तारीख़ से लागू हुआ था। 76 वर्ष के लंबे अनुभव में भारत ने दुनिया के समक्ष अपनी मज़बूत स्थिति को गर्व के साथ रखा है। सामरिक दृष्टि से मज़बूती के तौर पर भारत दुनिया की आणविक हथियारों की क्षमतावाली शक्तियों-महाशक्तियों (भारत के अलावा अमेरिका,रूस,चीन,फ़्रांस,ब्रिटेन,इज़राइल,पाकिस्तान और उत्तर कोरिया) में उल्लेखनीय रूप से शामिल है.

भारत अपनी आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षमताओं के लिये विश्व विख्यात रहा है किंतु आज भारत के समक्ष विकराल समस्याओं के रूप में जनसंख्या वृद्धि, बेरोज़गारी,सामाजिक विषमता, शिक्षा की  गिरती गुणवत्ता, स्वास्थ्य क्षेत्र में सीमित संसाधन और ढाँचागत कमियाँ, ग़रीबी जैसे मुद्दे समाधान की राह ताक रहे हैं। युवा ऊर्जा का सदुपयोग करने हेतु नवीनतम आयामों को विकसित करना और देश की एकता व अखंडता के लिये नागरिकों को सक्षम और सशक्त बनाना बड़ी चुनौतियाँ हैं।

आज के दिन केवल महापुरुषों के योगदान और स्वतंत्रता के संघर्ष में राष्ट्रीय आंदोलन को याद करना मात्र हमारा लक्ष्य नहीं है बल्कि हम अपने देश के लिये सदैव समर्पित होकर कर्तव्य पथ पर डटे रहें।

'पॉंच लिंकों का आनन्द' परिवार की ओर से आप सभी को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय प्रस्तुति में आज पढ़िए गणतंत्र दिवस के उत्सव से जुड़ी रचनाएँ-

आओ मिलकर अलख जगाएँ: गणतंत्र दिवस पर एक विशेष देशभक्ति गीत

शपथ उठाएँ उन वीरों की, जो सीमा पर लड़ते हैं,
मातृभूमि की रक्षा में जो, हँसकर प्राण चढ़ाते हैं!
यही समर्पित श्रद्धांजलि हो, उन अमर सपूतों को,
सर्वोपरि हो देश हमारा, यही संकल्प दोहराते हैं!
गर्व से कहें हम सब एक हैं, दुनिया को ये दिखाएँ
*****

एक देशगान -संविधान का गर्व तिरंगा

संविधान का गर्व तिरंगा

भारत का अभिमान है.

एक -एक धागे में इसके

वीरों का बलिदान है.

*****

बहे अटूट प्रेम की धारा

पावन संस्कृति अति पुरातन

विश्व साथ दे हर उत्सव में,

भजन क्लबिंग कर युवा आज के

भक्तिभाव जगायें उर में!

*****

देश मेरा सरताज है बना

नीला आसमान है

हरी है वसुंधरा

बिखरा वैभव देश में

सोना सा खरा .

*****

सरस्वती पूजा

कंठ में पहने देवनागरी की वर्णमाला

सुगंधित सतरंगी कुसुम कली मुक्ता मणि

कर में धारण कर कमल और जपमाला,

करकमल में कलम से लिखी स्नेह पाती

 चित्रकला, नृत्य, नाट्य की वरद हस्तमुद्रा।

*****

श्रद्धांजलि

मधुर आवाज़, कोमल भावों के शायर ताहिर फ़राज का मुंबई में निधन, प्रशंसकों में शोक

सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को
फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी

ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार
घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 

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