सादर अभिवादन
जनवरी जा रहे हो तुम
लम्बी प्रतीक्षा देते हुए इकट्ठा
11 माह का इंतजार झेलना होगा
खैर जग की रीति है
जो है सो
रचनाएं देखें
अब
अपनी गुड़िया को सुलाकर सोती है।
उसे नहलाती धुलाती,
ब्रश कराती,
और तो और खुद से पहले खाना भी खिलाती है,
चोट उसे लगी है इस कल्पना में भी,
वो खुद ही रोती है,
समुन्दर की असंख्य लहरों पर
डोलती, झूमता हुआ मस्त खटोले सी
बढ़ता जाता है जहाज
आकाश और समुंदर जहाँ मिलते हैं
क्षितिज पर धूमिल हो गया है भेद
आकाश छू रहा है लहरों को
ज़िंदगी तानाशाही से — नहीं चलेगी!
नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!
सत्ता की भूख में,
लालच की आग में—
इंसानियत जले तो
हुकूमत नहीं चलेगी!
नहीं चलेगी! नहीं चलेगी!
जब रक्षक ही
गोली चलाएँ,
तो बताओ—
"नीलम मैम ने आंखें नीचे कर लीं लेकिन कुछ कहा नहीं। देव सर का हृदय धड़कने लगा। समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें? डर था कि कहीं कोई बात नीलम मैम को बुरी न लग जाए। अचानक नीलम मैम बोली-"एक छात्र कह रहा था आप जैसा गणित कोई नहीं पढ़ाता!"देव सर ने नीलम मैम की तरफ देखते हुए कहा कि आप जैसी हिंदी भी कोई नहीं पढ़ाता। दोनों मुस्कराने लगे। फिर दोनों ही शांत हो गए। लेकिन पिलखन का पेड़ साक्षी था कि इस शांति में भी एक अपनापन था। एक प्रेम कहानी थी और दो प्रेमी थे जो प्रेम डगर पर चल पड़े थे।
चैता के
गीत कहाँ
शहरों के हिस्से,
वक़्त की
किताबों में
टेसू के किस्से,
स्मृतियों में
मृदंग
बजते करताल.
फिर दुनिया के ज्ञानियों से ज्ञान मिला
कि प्रकृति का नियम है परिवर्तन ही।
अपने व सगे ही क्यों भला .. साथ तो तन भी
छोड़ ही तो जाता है हमारा .. कभी-ना-कभी।
लगा फिर तो बौना .. बदल जाना यकायक तेरा .
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मौसम बदल रहा है
देश के कायदे भी बदल रहे हैं
कब क्या हो जाए
पता नहीं
जिधर से तेज हवा आए
पीठ उसकी ओर कर लें
वंदन
देश के कायदे भी बदल रहे हैं
कब क्या हो जाए
पता नहीं
जिधर से तेज हवा आए
पीठ उसकी ओर कर लें
वंदन
आज बस
सादर वंदंन
