आपसभी का हार्दिक अभिनन्दन।
आज की रचनाऍं-
मन की क्षितिज पर, रमते अब भी वही, छलक उठते, ये नयन, जब भी बढ़ती नमी, यूं तो, घेरे लोग कितने, पर है इक कमी, संग, उनकी दुवाओं का, असर, वो हैं, इक नूर शब के, दूर कब हुए! वो, आसमां पे रब हुए.....
साथ है उसके वो
कुछ ख़ास
कुछ अपने
कुछ मन पसंद
कुछ लोग बस लोग
मैं चुप हो गई
चुप शांत नहीं
मेरे टुकड़े खोजती
ना खोजती
कहीं गुम
कहीं खुली
बस हूँ।
किसी दिन बरसूँगी
चीखें तुम नहीं सुन पाओगे।
वह लोकल पकड़कर विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पहुँचा और पैदल गेटवे ऑफ इण्डिया तक चला गया. टिकट लिया और थोड़ी देर बाद नाव में बैठ गया. नाव तट से दूर हुई तो समुद्र की लहरें और तेज़ हवाएँ उसे रोमांचित करने लगीं. बाल हवा में उड़ रहे थे. नाव में दस-पंद्रह किशोर भी थे, जो पिकनिक के लिए एलिफेंटा जा रहे थे. नाव में ही उन से परिचय हुआ. नाव एलीफेंटा पहुँचती तब तक किशोरों से उसकी दोस्ती भी हो चुकी थी.




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जवाब देंहटाएं"पूर्वज"... पूर्वजों को याद करते उन्हें समर्पित इस रचना को पाताल पर स्थान देने हेतु, हृदय से आभार आदरणीय श्वेता जी।।।।
जवाब देंहटाएंपटल पर उपस्थित समस्त गुनीजनो को मेरा नमन।।।।
पूर्वज बहुत ही सुंदर रचना है, इसने मेरे दिल को छू लिया
जवाब देंहटाएंआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
जवाब देंहटाएंसुन्दर अंक
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