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बुधवार, 4 मई 2022

3383.. मुट्ठी में सिक्का..

 ।।प्रातः वंदन ।।

शाम को गिरता है तो सुब्ह सँभल जाता है 

आप सूरज की तरह गिर के सँभलते रहिए...

कुँवर बेचैन 

साकारात्मक आशा की रश्मियों के साथ आइए

अब नज़र डालें चुनिंदा लिंकों...✍️


चित्र सभार गूगल


एक ग़ज़ल -झीलों में सुर्खाब


गालों पर गेसू बिखरे हैँ आँखों में कुछ ख़्वाब

खिड़की में हैँ चांद चांदनी दरिया में सुर्खाब


देख रहे थे हम भी जादू मंतर महफ़िल में

उसकी मुट्ठी में सिक्का था कैसे हुआ गुलाब..

🌼

कुछ अपने साथ भी...

 चुपचाप निराश और सौ कमियाँ 

कुछ भी तो अच्छा नहीं था मुझमें 

न बैठने का शऊर न चलने फिरने 

🌼


देश के बाजार पर हलाल

इकॉनॉमी का कब्‍ज़ा...सभी को ये सच जानना जरूरी है







 पूरे देश में हलाल प्रमाणित उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने, 
ऐसे उत्पादों को बाजार से वापस लेने और 1974 से 
जारी हलाल सर्टिफिकेट को शून्य घोषित करने के निर्देश
 देने की मांग करने वाली एक याचिका
 वकील विभोर आनंद और रवि कुमार तोमर की ओर से 

🌼

शब्द से ख़ामोशी तक – अनकहा मन का (२४)



                            मनुष्य अपने कृत्य का उत्तरदायी खुद होता है । दूसरे के प्रत्युत्तर से मिलने वाला क्षणिक सकून सही मायने..

🌼

बुलेवर्ड स्ट्रीट की एक शाम.

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पिछले दो वर्ष से अधिक समय से कोरोना के मारे घर में मुर्गा-मुर्गियों के दबड़े की तरह उसमें दुबक कर रह गए थे। अभी मौसम का मिजाज क्या गर्मियाया कि अब हर सुबह-शाम घूमने-फिरने की आदद पड़ गई है। हर दिन 


कौन सुनेगा किसको सुनाये

कौन सुनेगा किसको सुनाये

इस लिए चुप रहते हैं..


।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर अंक..
    उम्दा रचनाओं का गुलदस्ता
    आभार..
    सादर..

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति में मेरी ब्लॉग पोस्ट शामिल करने हेतु आभार!

    जवाब देंहटाएं

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