निवेदन।


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सोमवार, 18 सितंबर 2017

794..''प्राणी अनुभूति का तरल प्रवाह''

''संवेदना'' 
प्राणी का अनुभव दूसरे प्राणी के कष्टों का अथवा कह सकते हैं प्राणी अनुभूति का तरल प्रवाह बिना किसी दबाव के दूसरे  प्राणी के अनुभव हेतु 
परन्तु वर्तमान काल में यह दृष्टिकोण परिवर्तित हो चुका है। 'संवेदना' मात्र एक शब्द बनकर रह गया है जिसका प्रयोग आज उच्चकोटि का मानव निम्न समझे जाने वाले प्राणी हेतु अथवा यह कहना उचित होगा अभावग्रस्त ,तुच्छ, अक्षम एवं पीड़ा से ग्रसित व्यक्ति का अपनी स्वार्थ सिद्धि को अंतिम गंतव्य तक पहुँचाने के लिए  
'पर' ईंधन के द्वारा चलने वाले जलविमान 
की भांति उपयोग करता है और हरी झंडी दिखाकर जलबाधा पार करने को प्रोत्साहित करता है। 
यदि विमान बीच जल में डूब जाए तो उस उच्चकोटि के प्राणी की कोई अधिक क्षति नहीं परन्तु विमान जलबाधा पार कर ले तो फिर बात ही क्या अर्थात दोनों दिशाओं से एक ही दिशा में लाभ 
परिणाम 
मानव विश्वास की क्षति जिसकी कोई पूर्ति संभव नहीं 
शून्य 'अंतस'
'संवेदनाओं' का विचरण  
जो हमें वर्तमान काल में देखने को मिल रहा है। 
:दार्शनिक भाव :
ईश्वर ने हमें निशंदेह 'त्रिकालदर्शी' नहीं बनाया परन्तु बनने हेतु ज्ञानेन्द्रियाँ अवश्य प्रदान की हैं। 
यह हम पर निर्भर करता है हम दृश्य किस प्रकार देखना चाहते हैं। 
मनोरंजन से भरपूर मिथ्या के 'ऐनक' से 
अथवा 
साधारण ,सादा ,श्याम -श्वेत सत्य चलचित्र !
निर्णय आपका 
( क्योंकि ये मेरे 'मौलिक' विचार हैं )

सादर अभिवादन 

आज का अंक कुछ विशेष,नवीन रचनाकारों का आगमन आवश्यक है। 
                          कविताएँ : आदरणीय ''राकेश तेता''
 चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 

 अक्सर मैंने देखा है तुम्हे
तुम्हारे मजारों गिरजों मस्जिदों और मंदिरों में 
अरदाशों के तले ईश्वरों से सौदा करते हूये  
और तुम्हारे ईश्वर भी तुम्हारी सौदेबाजी से खुश हैं


 'खाता नम्बर' ......आदरणीय ''रविंद्र सिंह यादव''  


बिना अनुमति के खाते में 
न कुछ जोड़ा जाए 
अब जाकर राज़दार का पता 
बैंक से की इल्तिजा में बताया है।   

  कूड़ा 'औ' कचरा .. आदरणीया "दिव्या अग्रवाल" 

 लिखती थी मैं 
कूड़ा 'औ' कचरा 
आती थी बदबू 
दिखाई पड़ती थी 
दिव्या के कूड़ेदान पर,
गलियों के मुक्कड़ में 
भनभनाती थी 
मक्खियाँ 'औ' कुत्तों के झुण्ड 
मंडराते थे कौंवे..

जाली मुस्कान - - - आदरणीय "शांतनु सान्याल" 


 हम गुज़रे, शाम ढलने से पहले, - -
वो लगे महफ़िल सजाने।
वादी ए तारीख़ पे, 
वीरानगी के 
सिवा 
कुछ भी नहीं, यहाँ अब कोई नहीं 
आता रस्मो रिवाज निभाने।



 पर सब अस्त व्यस्त उजड़ा और अधूरा - अधूरा सा 
तुम मेरी हिम्मत का आधा टुकड़ा संभाल कर रखना 
जब तक मैं उस बाकी आधे टुकड़े को ढूंढ  न लाऊं |

तुम्हें लिख दूँ ..   आदरणीया "शिवानी मौर्या'' 


  मैं ग़र गर्मी की तपिश,तो तुम्हें सावन की फुहार लिख दूँ ..
मैं ग़र धरा,तो तुम्हें नीला आकाश लिख दूँ..
मैं ग़र आगाज़ नया ,तो तुम्हें खूबसूरत अंजाम लिख दूँ..
मैं ग़र पंख बेबाक ,तो तुम्हें ऊँचा परवाज़ लिख दूँ..
मैं ग़र नदी इठलाती ,तो तुम्हें गहरा सागर लिख दूँ..

 'अपने मन की भी कहना' ....... 
आदरणीया "नूपुरम" जी


 पहाड़ों पर जमी बर्फ़
खेतों में खिली सरसों
बच्चों से भरी स्कूल बस
पुल पर से गुज़रती रेल
कच्चे पक्के घरों
शतरंज के मोहरों

 ग़ज़ल(ये रिश्तें काँच से नाजुक) .... 
आदरणीय 
"मदन मोहन सक्सेना'' 



 जिसे देखो बही मुँह पर ,क्यों मीठी बात करता है
सच्चा क्या खरा क्या है जरा इसको खँगालों तुम

हर कोई मिला करता बिछड़ने को ही जीबन में
मिले, जीबन के सफ़र में जो उन्हें अपना बना लो तुम

 ग़ज़ल....... आदरणीय कालीपद 'प्रसाद' 



बुझे रिश्तों का दिया अब तो जला भी न सकूँ 
प्रेम की आग की ये ज्योत बुझा भी न सकूँ 

 गीत "देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ" 
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
 सुमन-कलियों की चमन में,
डोलियाँ सजने लगीं,
भ्रमर गुंजन कर रहे,
शहनाइयाँ बजने लगीं,
प्रणय-मण्डप में मधुर,
बजने लगीं हैं तालियाँ।

 फोटोग्राफी : पक्षी 24 (Photography : Bird 24 )
आदरणीय  राकेश कुमार श्रीवास्तव "राही"
 क्रेस्टेड बाज़-ईगल या चेंजेबल बाज़-ईगल, 
एसिप्रिट्रिडे (शिकार प्रजाति) परिवार  की  का एक पक्षी है।
भारतीय उपमहाद्वीप में मुख्य रूप से भारत और श्रीलंका में, और दक्षिण पूर्व एशिया से इंडोनेशिया और फिलीपींस के दक्षिण-पूर्व हिमालय के  किनारे  ये  नस्ल पाए जाते हैं। यह खुली जंगलों में अकेले उड़ने वाला पक्षी है। यह एक पेड़ में एक छड़ी के आकर वाले घोंसले बनाता है 
और एक अंडा देता है।
वैज्ञानिक नाम: निसातिस सिर्रहातुस

फोटोग्राफर: राकेश कुमार श्रीवास्तव

आज्ञा दें 

"एकलव्य" 

20 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई ध्रुव जी
    चिन्तन-मनम को मजबूर करती
    आज की प्रस्तुति
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात।
    वाह ध्रुव जी बेहतरीन प्रस्तुति !
    आपके भीतर एक धधकता ज्वालामुखी महसूस करता हूँ जो विस्फोट के साथ संसार को अपना परिचय देना चाहता है। ज़ारी रखिये अपने अंतर्मन की परतें खोलना। हम चुन लेंगें उसमें से कितना समाजोपयोगी है और कितना असहज .....
    सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाऐं।
    आभार सादर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मेरी रचना को मान देने के लिए हार्दिक आभार।

      हटाएं
  3. बढ़िया मनभावन प्रस्तुति एकलव्य जी।

    जवाब देंहटाएं
  4. Meri rachna ko itna maan dene ke liye apki dil se abhari hun..bahut dhyanwad. .kripa yun hi meri rachnayein padhte rhe..

    जवाब देंहटाएं
  5. एक ही जगह पर सुंदर रचनाओं को संकलित करके आपने
    लिंक को संग्रहणीय बना दिया।
    सभी चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाऐं।
    आभार।

    जवाब देंहटाएं
  6. Meri rachna ko itna maan dene ke liye apki dil se abhari hun..bahut dhyanwad. .kripa yun hi meri rachnayein padhte rhe..

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति ...

    जवाब देंहटाएं
  8. शुभदोपहर आप की पसंद लाजवाब है....
    आभार आप का।

    जवाब देंहटाएं
  9. आदरणीय धुव जी, दाद देती हूँ आपकी खोजी द्रष्टि की. एक ही स्थान पर इतना उच्च कोटि का साहित्य चुन कर लाये है आप. आदरणीय राकेश तेता जी की कविताओं ने दिल में खास जगह बना ली. वैसी कवितायें समय का साक्ष्य होती है. अन्य सभी रचनाकारों को बधाई . एक से एक रचनाएं संकलित की है आपने . सभी चयनित रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
  10. मनमोहक प्रस्तुति ध्रुव सिंह जी .

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतिकरण एवं उम्दा पठनीय लिंक संकलन...

    जवाब देंहटाएं
  12. आदरणीया नूपुरम जी की पँक्तियों-

    जब सब कह चुको ।
    वेद पुराण बाँच चुको,
    तब एक बात,
    बस एक बार,
    अपने मन की भी कहना।

    को चरितार्थ करती यह ध्रुव-नंदा प्रस्तुति बहुत भायी। ध्रुव जी, आपकी रचनात्मक संवेदनशीलता अलहदा है। अपने अंतर्मन की सुनना और उसे सापेक्ष भावों से पोषित करना उत्कृष्टता का परिचायक है। आनंदित कर देने वाली प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  13. वाह ! क्या बात है ! बेहतरीन लिंक संयोजन ! बहुत खूब आदरणीय ।

    जवाब देंहटाएं
  14. इस पन्ने पर आपने जगह दी ।
    इतने लोगों ने पढ़ी । पढ़ने वालों ने सहृदय सराहना की । कविता तो चहक उठी ! दाना- पानी पा कर ।
    अन्यथा कवि से परिचय ना हो तो कविता पढ़ कर कौन चयन करता है ? आपने किया । ध्रुवजी आपका बहुत बहुत आभार । धन्यवाद करें आप सभी स्वीकार !

    जवाब देंहटाएं
  15. सदैव की भाँती इस बार भी ध्रुव भाई फिर से अपने ही तासीर के अनुरूप अपने विचार एवं रचनाएँ पेश की है। इस चर्चा में सम्मलित सभी सारगर्भित रचनाओं के रचनाकार को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  16. जब कोई न था कवि को जानता ।
    तब जिसने केवल कविता को परखा ।
    उसने ही दी मन से लिखने की प्रेरणा ।
    कविता बन बही अविरल भावों की सलिला ।

    जवाब देंहटाएं
  17. बेहतरीन संकलन सर जी।मेरी रचना को स्थान देने के लिए तहेदिल से शुक्रिया।देर से आभार व्यक्त कर रही हूं क्षमा चाहती हूं।

    जवाब देंहटाएं

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