सादर अभिवादन
एक अभिनव कार्यक्रम (पाक्षिक)
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...
सादर अभिवादन
सादर अभिवादन
अगस्त माह से एक अभिनव कार्यक्रम
लघुकथा लिखिए ....
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट--
।।भोर वंदन।।
सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती।
अवतार सिंह संधु ‘पाश’
सारगर्भित विचारो के साथ नजर डाले ..✍️
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट--
शब्द विशेष है "कल्पना"
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए
हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म
आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी
साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा प्रकाशित होने वाली
त्रैमासिक पत्रिक में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा
कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो...
यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है।
यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती, बल्कि उन छोटी-छोटी चूकों का आईना दिखाती है जिन्हें हम अपने अहंकार, जल्दबाज़ी और पूर्वाग्रह से इतना बड़ा बना देते हैं कि रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं।
जीवन में गलतियां होना अस्वाभाविक नहीं है। अस्वाभाविक तब होता है, जब हम उन गलतियों को इलास्टिक की तरह खींचते चले जाते हैं, इतना कि वे केवल भूल नहीं रहतीं, किसी के सम्मान पर चोट बन जाती हैं। क्योंकि हर गलती अपराध नहीं होती, और हर चुप्पी दोष स्वीकार..
✨️
ज़िंदगी की धूप में
पाँव के छालों की
परवाह किये बगैर
बिना रुके बिना थमे
✨️
मेरी ज़रूरतों पर ज़रा
नीयत-ए-हलाल रखा करो,
कि बेशकीमती हो तुम
मेरी जां, तुम अपना ख्याल रखा करो.......
✨️
ग़ज़ल
मुझे चाँदी न सोना चाहिए था
फकत सपना सलोना चाहिए था
अगर देना था भाषण मुफ़लिसी पे
तुम्हें कंकड़ पे सोना चाहिए था..
✨️
बना रहे जागरण ह्रदय में
धरा-गगन पावन बन जाते,
दें दृष्टि सम्मान की भीतर
ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते !
ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता
ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,
धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा ..
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ' तृप्ति '..✍️
सादर अभिवादन
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
सोमवारीय अंक में प्रस्तुत हैं पाँच+ रचनाएँ-
अस्वीकरण: अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना
ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय कंटेन्ट प्रकाशित हो रहा है वह
पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
सम्मान करता है।
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आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-
देखो…,
मेरे पास काम बहुत हैं
और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत
मेरी मानो तो ..,,
खाली वक्त में थोड़ा
आत्ममंथन करना
*****
मन में उमङ-घुमङ रहे थे बादल
अश्रु धारा में घुल गया काजल,
घनघोर घटा-सी घिर आई रात,
नींद में सुना मंद मधुर शंखनाद
स्वप्न में मेरे आए स्वयं जगन्नाथ ।
*****
यह धरा ऊसर है तुम बिन
नद स्तर है निम्न तुम बिन
कितने जोड़े सूखी आँखें
बाट जोहती रोज दिन गिन
तप्त धरती, शुष्क वन हैं
आस में सूखे नयन हैं
*****
उनका क्या जो वोट न दें या जिनके वोटों की ज़रूरत न हो?
*****
देश में
माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना
जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की
पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने
के लिए क्या कोई अनशन किया था? बेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का
नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी
दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखे, जिन्हें वे
आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ(अंक
प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी
नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष
प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)
हालात की दुश्वारियों ने
इस तरह कर दिया लाचार
कि हम आज गर्दिशों के
उफनते सैलाब में
तिनके की तरह
बहते रहे
बहते ही रहे
*****
श्वासें ही रस्ता दिखलायें
जब भी कोई भीतर जाता,
भीतर की गुंजन को सुनकर
मन का शावक थिर हो जाता !
*****
उसकी देह की दरारों में
चाक की स्मृति
अब भी बची है।
"वह टूट गया।"
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लोग सियासत
में आते हैं और ही मक़सद से,
जन-सेवा के दा'वे - ना'रे महज़ बहाने हैं।
हँसते-हँसते लाँघ गए हैं साहस के बल पर,
बाधाओं के पर्वत को हम कब गर्दाने हैं?
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Khari
Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 11 to 19 July 2026
जिसने कभी शिक्षा शास्त्र या
बाल मनोविज्ञान नहीं पढ़ा - वो शिक्षाविद और टैक्स्ट बुक के लेखक, जिसने कभी प्रशिक्षण तकनीक या प्रशिक्षण नहीं किए किसी के - वो राष्ट्रीय स्तर
का ट्रेनर, जिसने जिंदगी भर सुबह चार बजे उठकर बसों से अखबार के बंडल उतारकर हॉकर के रूप
में शहर भर में साइकिल पर अखबार बाँटें - वो पत्रकार, जो अपनी जात बिरादरी के विधायक या सांसद को सेट करके कुछ भी ऊलजुलूल बकने लगे
- वो चैनल का दल्ला - भले चेहरा गधे या सुअर के समान हो, जिसने कभी आंदोलन न किए हो - पर ज्ञान बांटने में सबसे अव्वल, जिसने कभी अपने घर एक पौधा ना लगाया हो - वो क्लाइमेट चेंज का फेलोशिपजीवी
पत्रकार, जिसके नाम एक सेमी की जमीन नहीं इतनी बड़ी धरा पर वो कृषि का ज्ञाता, जिसको कही कोई काम ना मिला या विशुद्ध ठुल्ला हो - वह मेंटोर, जिसको हर जगह दुत्कार के सिवा कुछ ना मिला - वो ख्यात बुद्धिजीवी, जो सत्तर - पचहत्तर पार की उम्र में खजुआए कुत्ते की तरह हो गया हो - वह
किशोरों और युवाओं की नीतियों का विशेषज्ञ, जिसके दांत श्मशान में और हाथ
पांव लकवा ग्रस्त वो सफर का बादशाह हो रहा, मतलब विचित्र दुनिया है यह और सब चलता है, धकता है
वो गाना था ना - "सीने
में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा
क्यों है"
*****
फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव