निवेदन।


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शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

4813 ...लघुकथा लिखिए .... अब आप लिख ही डालिए

 सादर अभिवादन 


 पांच लिंकों की अगस्त माह से
एक अभिनव कार्यक्रम (पाक्षिक)
लघुकथा लिखिए .... अब आप लिख ही डालिए
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

शब्द विशेष है "कल्पना" 
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 
हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म 
आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी 
साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा त्रैमासिक प्रकाशित होने वाली 
पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा


मेरी पसंदीदा रचनाएं



श्रावण! तुम केवल जलधारा, 
केवल बादल, केवल मेघ नहीं,

तुम जीवन की मौन प्रार्थना, 
करुणा का अनुपमेय स्नेह हो।

तुमसे ही सूखे अन्तरवन में 
फिर हरियाली जन्मे है,

तुमसे ही मानव के उर में 
फिर विश्वास का सेतु रहे।




“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।





नहीं ठहरता काल तनिक,
तुमसे जादा कौन जाने।
कितने आए कितने गए,
लंगड़े, बहरे काने।

ज़ख्म दिल्ली के हरे हुए फिर,
आ गए आलमगीर।
रुन्ड-मुन्ड चीखे दारा का,
हाय! हिंद की पीर।





जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

सावन का महीना आ गया
चलते- चलते एक गीत तो बनता है

सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ 
हो मैं तो छम-छम नाचूँ
सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ
हो मैं तो छम-छम नाचूँ
सांवरिया तेरी याद में
सांवरिया तेरी याद में तेरी चिट्ठियां बाँचूँ
हो-हो सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ
हो मैं तो छम-छम नाचूँ



सादर समर्पित
सादर वंदन

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

4812 ...अगस्त माह से एक अभिनव कार्यक्रम

 सादर अभिवादन
अगस्त माह से एक अभिनव कार्यक्रम
लघुकथा लिखिए ....
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

शब्द विशेष है "कल्पना" 
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 
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साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा त्रैमासिक प्रकाशित होने वाली 
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मेरी पसंदीदा रचनाएं

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया


एक दिन वह नदी किनारे अपने घर के बाहर खड़ा था, उसने देखा कि नल से पानी की बूंद टपक कर जमीन पर गिरी और बर्फ बन गई ! उधर नदी का पानी बेकार बह कर बर्बाद हुआ जा रहा था ! उसके दिमाग में एक विचार आया कि यदि इस पानी को किसी तरह जमा दिया जाए तो लद्दाख में पानी की किल्लत दूर हो सकती है !

उसने अपनी योजना का खाका तैयार किया और गांव वालों को साथ ले, उसे मूर्त रूप देने में जुट गया ! सबने मिल कर वहीं के मिटटी-पत्थरों का उपयोग कर, छोटी-छोटी नहरें बना, नदी के पानी का रास्ता बदल उसे पास की छायादार घाटी में बांध बना संग्रहित कर दिया ! कड़ाके की सर्दी में वह पानी जम कर, बर्फ के विशाल ढेर में बदल वहां स्थित हो गया ! इस तरह इंसान ने प्रकृति से होड़ ले, पहाड़ की छोटी से काफी नीचे अपना एक कृत्रिमिक ग्लेशियर बनाने में सफलता पा ली !



रात के इस दूसरे पहर में



दिखा एक चौपाया
जो देखते ही देखते
खड़ा हो गया तो पांवों पर
दौड़ गई सिहरन मेरुदंड पर
टूट गई नींद
तो पाया कि
सपने के बाहर भी
एक बियाबान जंगल है
चार दीवारों के बंद कमरे में
जिसमें कौंधते हैं
परिचित-अपरिचित चेहरों के
गड्ड-मड्ड होते डरावने चेहरे


पहले होर्डिंग का जन्म


पहले होर्डिंग का जन्म
यकीनन
पहले झूठ के साथ हुआ होगा।

और सतरंगी पहला झूठ
शायद
भाषा के आविष्कार के साथ
जन्मा होगा।


नहीं समझोगे ,,,


जिसने गले लगाया, वो हम थे,
लिबास बदलने से बदल नहीं जाता
फ़क़त कोई किरदार 'परचेत',
तुम जानते हो, तमाशा खडा करने मे
वरना हम क्या किसी से कम थे?

सादर समर्पित
सादर वंदन
  

बुधवार, 22 जुलाई 2026

4811..अपना ख़्याल रखा करो

 ।।भोर वंदन।।

सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है 

जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए 

और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा 

आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए 

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती 

ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती।

अवतार सिंह संधु ‘पाश’

सारगर्भित  विचारो के साथ नजर डाले ..✍️

कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..

एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट-- 

शब्द विशेष है "कल्पना" 

तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए 

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आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी 

साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा प्रकाशित होने वाली
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प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो...


यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है।

यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती, बल्कि उन छोटी-छोटी चूकों का आईना दिखाती है जिन्हें हम अपने अहंकार, जल्दबाज़ी और पूर्वाग्रह से इतना बड़ा बना देते हैं कि रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं।

जीवन में गलतियां होना अस्वाभाविक नहीं है। अस्वाभाविक तब होता है, जब हम उन गलतियों को इलास्टिक की तरह खींचते चले जाते हैं, इतना कि वे केवल भूल नहीं रहतीं, किसी के सम्मान पर चोट बन जाती हैं। क्योंकि हर गलती अपराध नहीं होती, और हर चुप्पी दोष स्वीकार..

✨️

धूप

जलते रहे



ज़िंदगी की धूप में

पाँव के छालों की

परवाह किये बगैर

बिना रुके बिना थमे

✨️

अपना ख़्याल रखा करो

मेरी ज़रूरतों पर ज़रा

नीयत-ए-हलाल रखा करो,

कि बेशकीमती हो तुम

मेरी जां, तुम अपना ख्याल रखा करो.......

✨️

चेहरे को धोना चाहिए था

 ग़ज़ल

मुझे चाँदी न सोना चाहिए था

फकत सपना सलोना चाहिए था

अगर देना था भाषण मुफ़लिसी पे

तुम्हें कंकड़ पे सोना चाहिए था..

✨️

भीतर दीपक एक जला है 

बना रहे जागरण ह्रदय में 

धरा-गगन पावन बन जाते, 

दें दृष्टि सम्मान की भीतर 

ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते ! 

ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता 

ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,

धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा ..

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️







मंगलवार, 21 जुलाई 2026

4810 कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई, ये सोच समंदर उदास है

 सादर अभिवादन 


सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,

विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।
-दिनकर

मेरी पसंदीदा रचनाएं





तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,
कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?
जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,
तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।





जिसमें मेरे प्रेम का मूलधन
और तुम्हारे प्रेम का ब्याज
दोनों शामिल हैं।

क्योंकि यह सिर्फ जमा पूँजी नहीं,
एक साझा खाता है,
जिसकी हर एक किस्त में
हम दोनों का होना जरूरी है।




वो भी विवश होकर कुटिया में जितनी भी खाने की सामग्री थी उससे ही राधा जी का भोग लगाते और खुद भोजन करते ऐसे करते करते कुछ दिन तो बीत गए लेकिन अंत में एसी परिस्थिति हों गयी न तो कुटिया में खाने को कुछ रहा न तो कहीं भिक्षा मिल रही थी ,,,






सर दूसरे का फोड़ के एहसास ही नहीं,
ठोकर लगी तो आज ये पत्थर उदास हैI

कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई,
यह बात सोच कर ये समुन्दर उदास हैI





हम आँख पर पट्टी बाँधकर बैठे हैं
कि वांगचुक छला जा रहा जंतर मंतर पर
सच तो यह है कि 'उस' भीड़ के अलावा
हम सब छले जा रहे
हमारी आत्माओं पर बोझ बढ़ रहा





आप पुराने हो जाएँगे
वे मुझे डराने की कोशिश करते हैं
मैं पहले से ही डरा हुआ हूँ
मैं जानकारी के लिए अपने स्मार्टफ़ोन पर बहुत ज्यादा निर्भर करता हूँ
अपने दिमाग से ज़्यादा
जिसने मुझे सज़ा दी है



‘उलूक’ अपनी खीज अपने पर ही उतार ले आज
कल कत्ल हो खबर आज की मगर होनी ही चाहिए | 



सादर समर्पित
सादर वंदन

सोमवार, 20 जुलाई 2026

4809...देखो…, मेरे पास काम बहुत हैं और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

सोमवारीय अंक में प्रस्तुत हैं  पाँच+ रचनाएँ-

अस्वीकरण: अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो पठनीय कंटेन्ट प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।

**************************************************************************

आइए पढ़ते हैं आज की चयनित रचनाएँ-

“शुरुआत”

देखो…,

मेरे पास काम बहुत हैं

और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत

मेरी मानो तो ..,,

खाली वक्त में थोड़ा

आत्ममंथन करना

*****

जगन्नाथ से संवाद

मन में उमङ-घुमङ रहे थे बादल

अश्रु धारा में घुल गया काजल,

घनघोर घटा-सी घिर आई रात,

नींद में सुना मंद मधुर शंखनाद

स्वप्न में मेरे आए स्वयं जगन्नाथ ।

*****

1506 मेघ से मनुहार 

यह धरा ऊसर है तुम बिन

नद स्तर है निम्न तुम बिन

कितने जोड़े सूखी आँखें

बाट जोहती रोज दिन गिन

तप्त धरती, शुष्क वन हैं

आस में सूखे नयन हैं

*****

उनका क्या जो वोट न दें या जिनके वोटों की ज़रूरत न हो?

जब संसार में लोकतांत्रिक व्यवस्था आरंभ हुई थी तो मताधिकार केवल वयस्क पुरुषों को दिया गया था। महिलाओं को मताधिकार नहीं था। संसार की आधी जनसंख्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने से वंचित थी। महिला समुदाय ने यह अधिकार लंबे संघर्ष के उपरांत प्राप्त किया। आज किसी भी लोकतंत्र में महिलाओं की बात और विचार पुरुषों की भांति ही महत्व रखते हैं। स्वतंत्र भारत में वयस्क मताधिकार में महिलाओं को आरंभ से ही सम्मिलित रखा गया। यह पृथक् बात है कि सदनों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

*****

मन के पार ही वह मिलता है

शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना हो तो मन को एक होना सीखना होगा। जहाँ तुलना होगी, स्पर्धा और ईर्ष्या होगी, वहाँ मन बँटा रहेगा। जहाँ बिखराव है, दूरी है, वहाँ दुख है, पीड़ा है। इसलिए योग के पथ पर चलना हरेक के लिए कितना आवश्यक है। कोई संगीतज्ञ, कवि, कलाकार या मूर्तिकार इस एकत्व का अनुभव करके आनंदित होता है, और उस आनंद को अपनी कला के माध्यम से जगत में प्रसारित करता है।

*****

गांधी के उपवास

देश में माँगें मनवाने के लिए अनशन करने की परंपरा है। आमतौर पर इसे गांधी की परंपरा माना जाता है। बेशक गांधी ने उपवास की परंपरा चलाई, पर इस बात की पड़ताल करें कि क्या गांधी जी ने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाने के लिए क्या कोई अनशन किया था? बेशक उन्होंने लंबे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और कुछ उपवासों के मार्फत उन्होंने ब्रिटिश-सरकार के प्रति विरोध भी दर्ज कराया। उस दौरान कम से कम 18 उपवास रखे, जिन्हें वे आत्मशुद्धि और अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह) का सबसे शक्तिशाली हथियार मानते थे।

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


रविवार, 19 जुलाई 2026

4808...सुनाई किसी को भूले से कभी जो दास्ताने गम...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया साधना वैद जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ(अंक प्रस्तुतकर्त्ता का रचनाओं के कंटेन्ट से वैचारिक रूप से सहमत-असहमत होना ज़रूरी नहीं है बल्कि ब्लॉगर डॉट कॉम पर जो प्रकाशित हो रहा है वह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि 'पाँच लिंकों का आनंद' परिवार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।)

धूप

हालात की दुश्वारियों ने

इस तरह कर दिया लाचार

कि हम आज गर्दिशों के

उफनते सैलाब में

तिनके की तरह

बहते रहे

बहते ही रहे

*****

मन का शावक थिर हो जाता 

श्वासें ही रस्ता दिखलायें 

जब भी कोई भीतर जाता, 

भीतर की गुंजन को सुनकर 

मन का शावक थिर हो जाता !

*****

चाक की स्मृति

उसकी देह की दरारों में

चाक की स्मृति

अब भी बची है।

लोग कहते हैं-

"वह टूट गया।"

*****

ताना-बाना

लोग सियासत में आते हैं और ही  मक़सद से,

जन-सेवा  के  दा'वे - ना'रे  महज़   बहाने  हैं।

हँसते-हँसते  लाँघ  गए हैं  साहस के  बल पर,

बाधाओं  के पर्वत  को   हम   कब  गर्दाने हैं?

*****

Khari Khari, Man Ko Chithti and other Posts from 11 to 19 July 2026

जिसने कभी शिक्षा शास्त्र या बाल मनोविज्ञान नहीं पढ़ा - वो शिक्षाविद और टैक्स्ट बुक के लेखक, जिसने कभी प्रशिक्षण तकनीक या प्रशिक्षण नहीं किए किसी के - वो राष्ट्रीय स्तर का ट्रेनर, जिसने जिंदगी भर सुबह चार बजे उठकर बसों से अखबार के बंडल उतारकर हॉकर के रूप में शहर भर में साइकिल पर अखबार बाँटें - वो पत्रकार, जो अपनी जात बिरादरी के विधायक या सांसद को सेट करके कुछ भी ऊलजुलूल बकने लगे - वो चैनल का दल्ला - भले चेहरा गधे या सुअर के समान हो, जिसने कभी आंदोलन न किए हो - पर ज्ञान बांटने में सबसे अव्वल, जिसने कभी अपने घर एक पौधा ना लगाया हो - वो क्लाइमेट चेंज का फेलोशिपजीवी पत्रकार, जिसके नाम एक सेमी की जमीन नहीं इतनी बड़ी धरा पर वो कृषि का ज्ञाता, जिसको कही कोई काम ना मिला या विशुद्ध ठुल्ला हो - वह मेंटोर, जिसको हर जगह दुत्कार के सिवा कुछ ना मिला - वो ख्यात बुद्धिजीवी, जो सत्तर - पचहत्तर पार की उम्र में खजुआए कुत्ते की तरह हो गया हो - वह किशोरों और युवाओं की नीतियों का विशेषज्ञ, जिसके दांत श्मशान में और हाथ पांव लकवा ग्रस्त वो सफर का बादशाह हो रहा, मतलब विचित्र दुनिया है यह और सब चलता है, धकता है

वो गाना था ना - "सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है"

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


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