सादर अभिवादन
सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।
-दिनकर
मेरी पसंदीदा रचनाएं
तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, अपना स्पेस (Space) प्यारा है,
कि अब माँ-बाप का कमरे में आना भी गवारा है?
जो पाल-पोस कर तुमको इस क़ाबिल बनाए थे,
तुम्हारी मॉडर्न लाइफ़ में वो महज़ एक 'बाधा' बेचारा है।
जिसमें मेरे प्रेम का मूलधन
और तुम्हारे प्रेम का ब्याज
दोनों शामिल हैं।
क्योंकि यह सिर्फ जमा पूँजी नहीं,
एक साझा खाता है,
जिसकी हर एक किस्त में
हम दोनों का होना जरूरी है।
वो भी विवश होकर कुटिया में जितनी भी खाने की सामग्री थी उससे ही राधा जी का भोग लगाते और खुद भोजन करते ऐसे करते करते कुछ दिन तो बीत गए लेकिन अंत में एसी परिस्थिति हों गयी न तो कुटिया में खाने को कुछ रहा न तो कहीं भिक्षा मिल रही थी ,,,
सर दूसरे का फोड़ के एहसास ही नहीं,
ठोकर लगी तो आज ये पत्थर उदास हैI
कागज़ की नाव कैसे मुझे पार कर गई,
यह बात सोच कर ये समुन्दर उदास हैI
हम आँख पर पट्टी बाँधकर बैठे हैं
कि वांगचुक छला जा रहा जंतर मंतर पर
सच तो यह है कि 'उस' भीड़ के अलावा
हम सब छले जा रहे
हमारी आत्माओं पर बोझ बढ़ रहा
आप पुराने हो जाएँगे
वे मुझे डराने की कोशिश करते हैं
मैं पहले से ही डरा हुआ हूँ
मैं जानकारी के लिए अपने स्मार्टफ़ोन पर बहुत ज्यादा निर्भर करता हूँ
अपने दिमाग से ज़्यादा
जिसने मुझे सज़ा दी है
सादर समर्पित
सादर वंदन


















