सादर नमस्कार
भूले बिसरी रचनाएं
पोंछ कर अपने चेहरे से
छलकता तमाम
अपराध बोध...
आगे बढ़ती रहे बेटियां...
बार-बार जन्म लेती रहे बेटियां...
वक़्त ने सोख ली रोशनाई , सो खामोश हैं हम
अब ना रही वो बीनाई , सो खामोश हैं हम
ग़म-आशना हुए इस कदर की निढाल हो हो गए
दो बरस रोते रहे इस कदर कि बदहाल हो गए
तंग होते जा रहे हैं शहर सब,
गाँव की पगडंडियों को मोड़ दो.
दर्द हो महसूस बोले ही बिना,
दिल से दिल के तार ऐसे जोड़ दो.
जिस्म ए दरख़्त का है अब पतझड़ का दौर,
इक लम्बी सी फ़स्ले बहार गुज़र गई,
कुछ ख़त रहे ग़ैर मत्बु'अ कुछ
हवाओं के हमराह उड़
गए, दूर दूर तक
थे पत्तों के
ढेर,
आज बस
सादर वंदंन
