सादर अभिवादन
पांच लिंकों की अगस्त माह से
एक अभिनव कार्यक्रम (पाक्षिक)
एक अभिनव कार्यक्रम (पाक्षिक)
लघुकथा लिखिए .... अब आप लिख ही डालिए
कम शब्दों में .. बड़ी बात कह डालने का अवसर ..
एक अलक (अति लघु कथा ) लिख डालिए झटपट--
शब्द विशेष है "कल्पना"
तो आइए अपनी कल्पना को साकार कीजिए
हमें प्रेषित करें, माध्यम है ब्लॉग संपर्क फार्म
आपके द्वारा लिखी रचनाएं प्रकाशित की जाएगी
साथ ही आदरणीय विभा दीदी के द्वारा त्रैमासिक प्रकाशित होने वाली
पत्रिका में स्थान पाने का भी अवसर मिलेगा
मेरी पसंदीदा रचनाएं
श्रावण! तुम केवल जलधारा,
केवल बादल, केवल मेघ नहीं,
तुम जीवन की मौन प्रार्थना,
करुणा का अनुपमेय स्नेह हो।
तुमसे ही सूखे अन्तरवन में
फिर हरियाली जन्मे है,
तुमसे ही मानव के उर में
फिर विश्वास का सेतु रहे।
“अब तो लोग दोपहरी में उठाए जाते हैं और खिड़कियाँ खुली रहती हैं, प्रभाकर जी।” रोहन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। उसने अपना लैपटॉप खोला। कई दिनों की मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट सामने थी। उसने प्रकाशित करने का बटन दबाया। कुछ पल तक स्क्रीन पर एक गोल निशान घूमता रहा। फिर सब कुछ सामान्य हो गया। बस उसकी रिपोर्ट कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। कुछ ही देर में उसे एक-एक कर कई सन्देश आए। सोशल मीडिया की कुछ सुविधाएँ बन्द कर दी गई थीं। कुछ लोग, जो रोज़ उसकी फेसबुक पोस्ट पर बहस करते थे, अचानक जैसे उसे देख ही नहीं पा रहे थे। रोहन ने अनायास प्रभाकर जी की ओर देखा।
नहीं ठहरता काल तनिक,
तुमसे जादा कौन जाने।
कितने आए कितने गए,
लंगड़े, बहरे काने।
ज़ख्म दिल्ली के हरे हुए फिर,
आ गए आलमगीर।
रुन्ड-मुन्ड चीखे दारा का,
हाय! हिंद की पीर।
जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी
सावन का महीना आ गया
चलते- चलते एक गीत तो बनता है
सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ
हो मैं तो छम-छम नाचूँ
सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ
हो मैं तो छम-छम नाचूँ
सांवरिया तेरी याद में
सांवरिया तेरी याद में तेरी चिट्ठियां बाँचूँ
हो-हो सावन में मोरनी बन के मैं तो छम-छम नाचूँ
हो मैं तो छम-छम नाचूँ
सादर समर्पित
सादर वंदन


