निवेदन।


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शनिवार, 25 जून 2022

3435...ऊब

                   


 हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

तंग

ऊब

बर्ट्रेण्ड रसेल अपनी पुस्तक "द कॉनक्वेस्ट ऑफ हैप्पीनेस" (सुख का अभियान) में कहते हैं - “जो पीढ़ी ऊब सहन नहीं कर सकती वह तुच्छ व्यक्तियों की पीढ़ी होगी। इस पीढ़ी को प्रकृति की धीमी प्रक्रियाओं से कुछ भी लेना देना न होगा।”

ऊब

"धरती पर रहकर आकाश बनने के

हरकोई सपने देखता है--

आकाश बन जाने के बाद

धरती के सपने कोई नहीं देखता !

ऊब

जो लोग ऊब गए हैं, वे हैं जिन्हें पहचानने और प्रबंधित करने में सबसे अधिक कठिनाइयाँ होती हैं। इस आधार से शुरू करना कि बोरियत बाहरी संतुष्टि पाने की प्रवृत्ति है, यह मान्य है कि इस बात की पुष्टि करना कि खुद के साथ अकेले रहना खुद को जानने के लिए समस्या पैदा करेगा। इसलिये, यदि आप अक्सर "मैं ऊब रहा हूँ" कहते हैं, तो यह एक स्पष्ट संकेत है कि आपको अपने आंतरिक दुनिया से जुड़ने की आवश्यकता है।

ऊब

सुबह हो रही थी

कि एक चमत्कार हुआ

आशा की एक किरण ने

किसी बच्ची की तरह

कमरे में झाँका

कमरा जगमगा उठा

“आओ अन्दर आओ, मुझे उठाओ”

शायद मेरी ख़ामोशी गूँज उठी थी।

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पुनः भेंट होगी...
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शुक्रवार, 24 जून 2022

3434 / अथ श्री बुलडोज़र कथा .....

 


शुक्रवारीय अंक में 

आप सभी का स्नेहिल अभिवादन |

******************

आज 

हर स्त्री के मन की बात 

*************

सोते हुए ही 

किसी भी स्त्री का 

रुकता है सोचना ,
 
वरना तो पल पल 

कुछ भी करते हुए 

स्वयं से ही 

चलता रहता संवाद 

विषय कोई भी हो 

करती रहती है 

स्वयं की स्वयं से बात ,


कभी अतीत की गलियाँ 

घूम आती है  

गूँथते हुए आटा ,

तो कभी भविष्य 

सोचते हुए 

चिंतित मन के आगे 

खिंच जाता सन्नाटा । 

संगीता स्वरुप 

*************************

अब  आज की रचनाओं का आनंद लें .......


अब बहुत हो गयी श्वेता की नक़ल ......... कोशिश कर रही थी कि उसके जैसी प्रस्तुति लगा सकूँ ....... लेकिन सबका अपना ही तरीका होता है ...... एक जैसा तो नहीं हो सकता  , तो भई मैं आ जाती हूँ अपने ही अवतार में ......
बात अवतार की चली है तो  डॉक्टर रश्मि ठाकुर हिंदी लेखन में अवतरित हो रही हैं ...... पढ़िए और उत्साहित कीजिये ......... वैसे उन्होंने हम सब लिखने वालों के मन की बात कह दी है .... 

कभी भावनाओं से बुहारती हूँ,
कभी आंसूओं से पखारती हूँ,
कभी इतना कोलाहल करते हैं,
कि चुप कराना मुश्किल,
कभी ऐसे चुप,
कि बोलवाना मुश्किल।
ये मेरे दोस्त हैं, मेरे हमनवा,
जो आते हैं, कहीं मन के कोने से,
जब मैं अकेली होती हूँ।

शब्द कभी भी आपको अकेले नहीं रहने देते ........... ऐसे ही बड़े बुजुर्ग भी अपने बच्चों का सदा ध्यान रखते हैं ........ लेकिन क्या जिस तरह आप शब्दों को  पकड़ कोई नयी रचना बुन लेते हैं वैसे ही क्या बुजुर्गों का हाथ पकड़ते हैं ?   ....... एक लघु कथा जो मन को छू गयी ..... 

बाबू जी की उमर


वो तो ..वो तो.. ऐसे ही..वो बाबू जी को अचानक देख
शालिनी हड़बड़ा गई ।
उसने जल्दी से अपना आँचल ठीक किया और पैरो में झुकते हुए बोली..चरण स्पर्श बाबू जी ।
बाबू जी ने उसके शीश पर हाथ रखते हुए कहा जीती रहो बेटी । सानंद रहो, भगवान तुम्हें लंबी उमर दें ।

हर जगह विसंगतियाँ  दिखाई देती हैं ........  वो चाहे परिवार की बात हो या समाज की .अब आलम ये है  कि सब कुछ अच्छा ढूँढने  का प्रयास कर रहे हैं .......

इस कंक्रीट के जंगल में मकान तो बहुत हैं

पर घर कहाँ हैं।

मकानों में, हवेलियों कमरे तो हैं अनगिनत

पर उनमें रहने वाले अपने कहाँ हैं।


यही सब कहाँ है ढूँढते हुए पहुँच गए ऐसे घर में जहाँ पितृ दिवस पर बच्चों से कुछ चित्र बनवाए गए थे ....... परिणाम आप लघु कथा पढ़ कर जानिये .......

पितृ दिवस _ लघुकथा


बच्चों के चित्रों में विविधता थी ! किसीमें पापा बच्चों के लिए घोड़ा बने हुए उन्हें सवारी करा रहे थे,

 किसीमें बच्चों को चॉकलेट और गुब्बारे दे रहे थे, किसी में बच्चे पापा के कंधे पर सवार थे तो किसीमें

 बच्चों को पापा किताब से कहानी सना रहे थे !

अब इस कथा के परिणाम से तो आप परिचित हो गए .....लेकिन देखिये नशा और क्या क्या गुल खिलाता है ......  पढ़ते  हैं एक और लघु कथा ......


मँहगाई


मगरू मन ही मन बुदबुदाया- साली पैसे भी ऐसे गिनकर देती है, जैसे खुद कमाती हो। फिर सब्जी वाले से बोला-अबे ठीक लगा ले चाचा। पीछे 20 का किलो दे रहा है, और तुम तो सीधे 50 पे पहुँच गए! ज़्यादा नहीं तो 20 का किलो लगा ले चाचा..

इसमें स्त्री के लिए गाली का प्रयोग हुआ है ...  यानि कि हमेशा ही  हमारे देश में नारी को दोयम दर्ज़ा ही मिला है ...... लेकिन आज हर क्षेत्र में जहाँ नारी आपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है वहीँ  अपने काम में निपुण भी है ...... इसी को आप पढ़िए इस लेख में ..... 

पायलट मोनिका खन्ना: एक 'beauty with brain' 

कुछ लोग कहते है कि महिलाएं कमजोर और डरपोक होती है। महिलाओं को अच्छे से गाड़ी भी चलाना नहीं आती। जो महिलाएं सुंदर है वे बुद्धिमान नहीं होती और जो महिलाएं बुध्दिमान है वे सुंदर नहीं होती। उन लोगो को अपनी बुध्दिमानी और बहादुरी से पायलट मोनिका खन्ना ने करारा जवाब दिया है . 

एक सैल्यूट मोनिका खन्ना को तो बनता है  ......... और आगे के लिए शायद आप इनको भी सैल्यूट करें .......... जिनका नाम देश के राष्ट्रपति पद के लिए चयनित किया गया है ......... थोड़ी जानकारी उनके बारे में .... 


 संघर्षशील और जुझारू महिला आदरणीया द्रौपदी मुर्मू मैडम जी के नाम से लोकप्रिय हैं।ओडिशा राज्य के मयूरभंज जिले के रायरंगपुर से आने वाली श्रीमती द्रौपदी मुर्मू यानी मैडम जी की भगवान शिव में गहरी आस्था है।मैडम जी प्रजापति ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय मिशन से जुड़ी जनजातीय समाज से पहली महिला हैं जो देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद हेतु राजग प्रत्याशी बनाई गई हैं | 

 मेरी निजी इच्छा तो यही है  कि द्रोपदी जी ही इस पद की गरिमा को   बढ़ाएँ  ....... आगे देखिये होता है  क्या ........ क्या फैसला आता है ......... और रही फैसले की बात तो चलिए पढ़िए एक लघु कथा .... 

एक फैसला ऐसा भी…,


तभी घूँघट मे रोती नाथूराम की पत्नी अपनी बेटी को दोहत्थड़ जड़ते हुए चिल्लाई - “करमजली ! सास थी तेरी

 दो लात मार भी दी तो मर तो नहीं गई थी तू ! घर से बाज़ार तो कभी गई नहीं , सकूल का मुँह माथा देखा नहीं और चल पड़ी 

सीधी दिल्ली ।”


 मैं तो इस फैसले के साथ हूँ  और आप ?  बेचारी के मन में कुछ अरमान थे , अभिलाषा थी ........अब चाह तो कोई भी ,कुछ भी कर सकता है ....... ऐसे ही एक चाह आप पढ़िए यहाँ ...... 


कभी तुझसे कोई शिकायत नहीं हो
चाहे जैसे रहूँ चाहे जो भी सहूँ !
कभी तुझसे कोई..

अब जब ऐसी अभिलाषा कर ली तो फिर क्या शिकायत ?    वैसे आज कल शिकायतों का बड़ा दौर चल रहा है ........ राजनैतिक गलियारे में तो विशेष रूप से ...... खैर हम राजनीती की बात तो करते ही नहीं बस अपने मन की बात करते हैं ......... अरे मन की भी नहीं करते वरना कह देंगे लोग कि  मोदी  भक्त हैं ........चलिए सीधे सीधे ले चलते हैं एक व्यंग्य पर ......


चेतावनी: इस पोस्ट में योगी जी का न तो हाथ है न ही दिमाग इसलिए कृपया MYogiAdityanath योगी जी जैसे अनुभवहीन को इससे जोड़ कर न देखा जाए।🤭🤪
समय के साथ सोच, शब्द, भावनायें और उनकी परिणति ही नहीं बदली बल्कि तेजी से बदलते समय, मशीनीकरण और मानसिकता से प्रेम भी अछूता नहीं रहा है। अभी तक शब्दों और भावनाओं का मानवीयकरण हो रहा था पर आज यहां शब्दों, भावनाओं और मुहावरों का मानवीयकरण न होकर मशीनीकरण होगा। आज के घोर मशीनीकरण और घनघोर टीवीकरण के कर्कश, कर्णकटु स्वर 🥺🥺के प्रदूषण से उपजी एक अनोखी, अनहोनी सी प्रेम कथा .....

लीजिये .... आप आनंद उठायें इस प्रेम कथा का ....... और अब मुझे दें इजाज़त ......... अरेएएएएए ...................... ओह , इतनी लम्बी पोस्ट ............. . मैं तो भूल ही गयी थी कि ये पोस्ट तो श्वेता की थी .......खैर अब झेलिये मुझे ....... ... और रहिये तैयार सोमवार को मेरे मन की बात सुनने के लिए ......

तब तक के लिए ......... नमस्कार

संगीता स्वरुप ...


गुरुवार, 23 जून 2022

3433..बूँदों की सरगोशी सुनकर सोंधी मिट्टी महक उठी...

शीर्षक पंक्ति:आदरणीया सुधा देवराणी जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के साथ हाज़िर हूँ।  

नदिया ज्यों नदिया से मिलती

तू बुला रहा हर आहट में

हर चिंता औ' घबराहट में,

तूने थामा है हाथ सदा

आतुरता नहीं बुलाहट में !

बरसी अब ऋतुओं की रानी

गर्मी से कुछ राहत पाकर

दुनिया सारी चहक उठी

बूँदों की सरगोशी सुनकर

सोंधी मिट्टी महक उठी

1045-अगर मेरी मानो

यह जीवन सारा

वसीयत में

तुम्हारे नाम पर

मैंने क्यों लिखा

जिस- जिसको दिखा

हस्ताक्षर में

मेरी लिखावट का

पुख्ता निशान

चैल, शिमला के पास एक सुंदर, शांत हिल स्टेशन --

आप चैल से शिमला घूमकर भी शाम तक वापस आ सकते हैं। रास्ते में एक चोटी पर स्टोन टेम्पल बना है, जहां तक पहुंचने में आपकी ड्राइविंग स्किल्स का पूरा इम्तिहान हो जाएगा। शिमला के रास्ते मे कुफरी भी आता है, जहां आपको भीड़ के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन कोई बात नहीं, वहां आप सरकारी कैफे में कॉफी पीकर आगे बढ़ सकते हैं।

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस: बुद्धि और चेतना क्या टकराएंगी?

यह तकनीक मनुष्य के मस्तिष्क में काम करने वाले करोड़ों-अरबों न्यूरॉन्स की डीप लर्निंग के सिद्धांत पर काम करती है। शुरू में लगता था कि इसकी भी सीमा है, पर हाल में विकसित फाउंडेशन मॉडल्स ने साबित किया है कि पहले से कई गुना जटिल डीप लर्निंग सम्भव है। आप कम्प्यूटर पर जो वाक्य लिखते हैं, उसे व्याकरण-सम्मत आपका कम्प्यूटर बनाता जाता है। आप चाहते हैं कि आपके आलेख का अच्छा सा शीर्षक बन जाए, बन जाएगा। लेख का सुन्दर सा इंट्रो बन जाएगा।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 22 जून 2022

3432 ..नाम कभी मिटा नहीं..

 ।।प्रातः वंदन ।।

"पौ फटी....

चुपचाप काले स्याह भँवराले अंधेरे की घनी चादर हटी..

मग़रूर आँखों में गई भर जोत

जब फूटा सुनहला सोत.. 

सिंदूरी सबेरा बादलों की सैंकड़ों स्लेटी तहों को 

चीरकर इस भाँति उग आया 

कि जैसे स्नेह से भर जाय मन की हर सतह..!! "

 जगदीश गुप्त

सुबह की नर्म, उमस भरी बढ़तीं धूप संग चल रहा बहुत कुछ आजकल,  जब भी नई कुछ बात होतीं है...चलिए ये तो हुई जमाने की बात  हम बढ़ते हैं ब्लॉग की दुनिया में..कि हमें...✍️






इश्क -ओ - की बंदिशों में बंधकर रहना नहीं आता..

ये दायरे, ये बंदिशें

किसी और पर थोपो


मैं हवा का झोंका हूं

मुझे आवारगी पसंद है.

🔴

पलटन: नाम, नमक और निशान 


 मेरा नाम कभी मिटा नहीं, 
मेरी कहानियाँ मशहूर थी।
 यादों का जो सिलसिला था,
 वो पीढ़ियों का ग़ुरूर थी ।

जो फ़क़्र था एक हिस्से का, 
सबके ह्रदय का मीत था।
लक्ष्य पाया किसी एक ने ,
सब का वो आशीष था। 

🔴








 काश के तुमने 
 दिए होते जल को नेत्र
 तो देख पाता कि 
 उसके तीव्र वेग में
 समा हुए खेत,
 गहने गिरवी रख कर
 बनाया गया 

 कच्चा मकान,..

🔴

योग कर निरोग हों 











जल,अग्नि,भू, नभवायु

का इस हृदय में संयोग हो 

आइए नित भोर संग 

हम योग कर निरोग हों 


ये सृष्टिये धरतीगगन..

🔴

खाली बन्द मुट्ठियाँ

वह मुस्कान जो आँखों और   
ओठों से बाहर आकर  
अपने अस्तित्व से विभोर करने से पहले ही  
इर्द-गिर्द की रेखाओं में..

🔴

।। इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️



मंगलवार, 21 जून 2022

3431..स्वस्तिक पर खून के छींटे

सादर अभिवादन.....
विद्यालय का जमाना याद आया...
मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झरिणी मचली!


मेरा पग-पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली,
- महादेवी वर्मा



मेरे जैसे ही तुम भी हो
इतना खुद ही समझ लोगे
उड़ने को जो पंख मिले हैं
बंधन में क्योंकर जकड़ोगे  




आज नजर पड़ी
बिना पांव के
उन प्रिय जूतों पर
जो पिताजी के प्रिय थे
लोकलाज
शान सम्मान के द्योतक थे,




ये टूटती आस्था उन्हें तोड़ने लगती हैं और वो बहुत दुःखी हो जाती हैं और हर तरह की प्रार्थना छोड़ देतीं हैं | शेल्डन के लिए उसकी माँ ही दुनियां में सब कुछ हैं क्योकि उसके तेज बुद्धि उसे बाकियों का दुश्मन बना चुकी हैं |

 


मैं - फिर आपने रश्मि बनने के लिए क्या किया ?

रश्मि प्रभा - मैं क्या करती ! मैं एक साधारण नहीं,अति साधारण लड़की रही, जिसकी आंखों में अलादीन के चिराग़ की ख्वाहिश थी, मुट्ठी में थे कुछ सपने, जिनको सौदागर की तरह मैं परिचित,अपरिचित सबको देना चाहती थी, लगता था ज़िन्दगी बस खुल जा सिम सिम सी है।




"आपको क्या लगता है,
कथा-कहानी, गीत-कविता
लिखने से स्थिति बदल जाने वाली है?
लिखते रहिए,
कुछ नहीं होने वाला।
पचासी साल के
बुजुर्ग वकील से डर लगता है...,




दादा-दादी न केवल ज्ञान के मोती बिखेरते है
बल्कि बच्चों के जीवन को प्यार और खुशियों से भर देते है।
वह लोग बहुत भाग्यशाली है
जिनकी चार नहीं तो कम से कम
दो पीढ़िया एक ही छत के नीचे रहती है।
दादा-दादी के बिना बचपन अधुरा सा लगता है।


आज बस

सादर 

सोमवार, 20 जून 2022

3430.. / क्या यार पापा .... मनोज मुन्तशिर .

 


नमस्कार ........  आज जब ये पोस्ट बना रही हूँ  तो आज का दिन पिता के नाम समर्पित है ........ कल हमने   पाँच लिंकों के आनंद पर  पिता पर लिखी कुछ पुरानी और बेहतरीन पोस्ट्स पढ़ीं ....... आज प्रारंभ करते हैं    आत्ममुग्धा  की एक बहुत  प्यारी पोस्ट से .... 

 पिता  और चिनार  

बस यूँ ही 
पतझड़ और बसंत को जीते हुए,
हम सब को सीख देते हुए
अडिग रहते हैं हमेशा
 चिनार और पिता .

एक ओर जहाँ बेटी अडिग पिता की तुलना चिनार से  कर रही है वहीँ एक और बेटी पिता से  कह रही है कि वो अपने  संस्कारों  के प्रति तो अडिग है लेकिन समय के साथ चलना चाहती है ....... 

कि बेटी चाहती है अब !


वहाँ मैं संस्कारों का

तुम्हारे मान रक्खूँगी 

मूल्य का निज के जीवन में

नित्य अवधरण कर लूँगी 

मगर मिथ्या अनर्गल 

बात पर मुझको नहीं झुकना  |



ये तो था पिता और बेटी का प्यार ......... बेटियों के मन की   भावनाएँ ....... अब पढ़िए एक भाई का अपने भाई के प्रति प्रेम की एक झलक .......... क्या नायब तोहफा देता है एक भाई अपने भाई को .... 


सबसे नायाब ........


जहाँ से इस तोहफे को उठा लायी हूँ  वहाँ ज़बर  ताला लगा हुआ है ....... इस लिए आप वहीँ जा कर इस पोस्ट का आनंद लें ........ झलक के लिए कुछ नहीं दिखा पाऊँगी यहाँ  . 


तोहफे की बात चली है  और  मौत से जूझते हुए ज़िन्दगी की बात ........ तो एक किस्सा पढ़ते हैं  कि ज़िन्दगी रहते हुए भी लोग अपने क्रिया क्रम का क्या और कैसा इंतजाम कर लेते हैं ........ है न बड़ी दिलेरी की बात ..... और ये एक सच्ची कथा है .......


पाँच मेल की मिठाई ..


भरी तिजोरी की स्वामिनी अपनी जिया की यह फ़रमाइश कंजूसड़े लाला जी को पूरी करनी ही पड़ी और हमारी जैन-जैसवाल बिरादरी के इतिहास में पहली बार किसी बुजुर्गवार के जीते जी उनकी तेरहवीं हुई.
बिरादरी के सैकड़ों लोग इस अजीब सी अग्रिम तेरहवीं में शामिल हुए और एक ऊंची कुर्सी पर बैठ कर ख़ुद को पंखा झलती बूढ़ी अम्मा ने अपनी अग्रिम तेरहवीं के भोज का सुपरविज़न किया.

तू डाल -डाल मैं पात - पात को चरितार्थ कराती ये पोस्ट रोमांचित कर गयी ....... और रोमांच का आना निश्चित है जब भीषण गर्मी के बाद आषाढ़ के माह के पहले दिन का इतना खूबसूरत वर्णन हो ....... बस एक जिज्ञासा कि ये पत्नीटॉप है या पटनीटॉप ........... खैर आप तो कविता पढ़ें जिसमें प्रकृति का खूबसूरत नज़ारा शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है ......


 दिन ओढ़े  आषाढ़ के,

बादल ऊपर चढ़ आए।

मानों यक्षी की पाती का,

हर हर्फ  वे पढ़ आए।


इस खूबसूरत रचना के साथ ही  आज लिंक्स की चर्चा यहीं  समाप्त  करती हूँ .......... और इस समापन के साथ  मनोज मुन्तशिर  की कुछ रचनाएँ ...उनकी ही ज़ुबानी ........  पितृ दिवस  पर विशेष पेशकश ......





अब इजाज़त दीजिये ............ मिलते हैं अगले सोमवार कुछ नयी - पुरानी रचनाओं के साथ ...
नमस्कार

संगीता स्वरुप


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