नमस्कार ........ आज जब ये पोस्ट बना रही हूँ तो आज का दिन पिता के नाम समर्पित है ........ कल हमने पाँच लिंकों के आनंद पर पिता पर लिखी कुछ पुरानी और बेहतरीन पोस्ट्स पढ़ीं ....... आज प्रारंभ करते हैं आत्ममुग्धा की एक बहुत प्यारी पोस्ट से ....
कि बेटी चाहती है अब !
वहाँ मैं संस्कारों का
तुम्हारे मान रक्खूँगी ।
मूल्य का निज के जीवन में
नित्य अवधरण कर लूँगी ॥
मगर मिथ्या अनर्गल
बात पर मुझको नहीं झुकना |
ये तो था पिता और बेटी का प्यार ......... बेटियों के मन की भावनाएँ ....... अब पढ़िए एक भाई का अपने भाई के प्रति प्रेम की एक झलक .......... क्या नायब तोहफा देता है एक भाई अपने भाई को ....
जहाँ से इस तोहफे को उठा लायी हूँ वहाँ ज़बर ताला लगा हुआ है ....... इस लिए आप वहीँ जा कर इस पोस्ट का आनंद लें ........ झलक के लिए कुछ नहीं दिखा पाऊँगी यहाँ .
तोहफे की बात चली है और मौत से जूझते हुए ज़िन्दगी की बात ........ तो एक किस्सा पढ़ते हैं कि ज़िन्दगी रहते हुए भी लोग अपने क्रिया क्रम का क्या और कैसा इंतजाम कर लेते हैं ........ है न बड़ी दिलेरी की बात ..... और ये एक सच्ची कथा है .......
बादल ऊपर चढ़ आए।
मानों यक्षी की पाती का,
हर हर्फ वे पढ़ आए।
इस खूबसूरत रचना के साथ ही आज लिंक्स की चर्चा यहीं समाप्त करती हूँ .......... और इस समापन के साथ मनोज मुन्तशिर की कुछ रचनाएँ ...उनकी ही ज़ुबानी ........ पितृ दिवस पर विशेष पेशकश ......