निवेदन।


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बुधवार, 11 मार्च 2020

1699..“सिर्फ़ एक दिन ही उत्सव क्यों?


।। भोर वंदन।।
“सिर्फ़ एक दिन ही उत्सव क्यों?
पूरा जीवन ही उत्सवपूर्ण होना चाहिए”- ओशों

फाल्गुनी पर्व के बाद एक अहद..
बुराई में अच्छाई ढूंढों तो कोई बात बने..
और जादा समय न गवाते हुए नज़र डालें लिंकों पर..✍
रचनाकारों के नाम क्रमानुसार पढ़ें...
आ०उषा किरण जी
आ० संजय कौशिक 'विज्ञात जी
आ० विश्वमोहन जी
आ० सुधा देवरानी जी
आ० पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी
🎊🎊




आज हमारी मित्र वन्दना अवस्थी दुबे ने होली के संस्मरण लिखने को कहा है...तो याद आती है अपने गाँव औरन्ध (जिला मैनपुरी) की होली जहाँ पूरा गाँव सिर्फ चौहान राजपूतों का ही होने के कारण सभी परस्पर रिश्तों में बँधे थे इसी कारण एकता और सौहार्द्र की मिसाल था हमारा गाँव ।प्राय: होली पर हमें पापा -मम्मी गाँव में ताऊ जी -ताई जी के पास ले जाते थे ...
🎊🎊



ताकता प्रेमी मन श्रृंगार,
जहाँ गोरी करती आराम।
चाँद का चकोर पावन प्यार,
मेघ करता घूंघट का काम॥ 

चमक है चंद्र-किरण के तुल्य,
देख मुख मण्डल आभा तेज
🎊🎊




बाउर बयार, बहक बौराकर
तन मन मोर लपटायो.
शिथिल शबद, भये भाव मवन
सजन नयन घन छायो..
🎊🎊



दुखी दुखी से हो धरा के पास क्यों.....?
फाग के रंग भी तुमको न भा रहे,
होली हुड़दंग से क्यों जी चुरा रहे ?
धरा के दुख से हो इतने उदास ज्यों !
दुखी दुखी से हो धरा के पास क्यों ?..
🎊🎊




विशाल हृदय, वो स्नेह भरा दामन, 
इक सम्मोहन, वो अपनापन,
विस्मित करते, वो आकर्षण के पल,
बसे, नज़रो में हैं, हर-पल!

गुजारे थे कल, पहाड़ों पे कुछ पल....

रोक रही राहें, खुली पर्वत सी बाँहें,
इक परदेशी, लौट कैसे जाए
🎊🎊
हम-क़दम का नया विषय
यहाँ देखिए
🎊🎊
।। इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह ‘तृप्ति’..✍

मंगलवार, 10 मार्च 2020

1698..होली के बहाने

पाँच लिंक परिवार की ओर से
सभी पाठकों को
रंगों के पावन त्योहार पर
होलीयाना नमस्कार
------

रस में तैरते मालपुए,दही भल्लों की चटखारे हैं
रंगों की बरसात हो रही,उल्लास में डूबे सारे हैं,
हमजोली,हँसी-ठिठोली,टोलियों की मस्ती हो ली,
 बहाने होली के, मिटे फासले ऐसे भी नज़ारे हैं

★★★★★
 आइये आज के विशेष अंक में आनंद लेते हैं कुछ
कालजयी रचनाओं का।
★★★★★★

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
मार दी तुझे पिचकारी,
कौन री, रँगी छबि यारी ?

   फूल -सी देह,-द्युति सारी,
   हल्की तूल-सी सँवारी,
   रेणुओं-मली सुकुमारी,
   कौन री, रँगी छबि वारी ?

मुसका दी, आभा ला दी,
उर-उर में गूँज उठा दी,
   फिर रही लाज की मारी,
   मौन री रँगी छबि प्यारी।



हरिवंशराय बच्चन

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।
अंबर ने ओढ़ी है तन पर
चादर नीली-नीली,
हरित धरित्री के आँगन में
सरसों पीली-पीली,
सिंदूरी मंजरियों से है
अंबा शीश सजाए,
रोलीमय संध्या ऊषा की चोली है।
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र
गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में

नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे
ये आशिक की है उमड़ी आहें आतिशबार होली में

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में

है रंगत जाफ़रानी रुख अबीरी कुमकुम कुछ है
बने हो ख़ुद ही होली तुम ऐ दिलदार होली में

रस गर जामे-मय गैरों को देते हो तो मुझको भी
नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में

केदारनाथ अग्रवाल
फूलों ने
होली
फूलों से खेली

लाल
गुलाबी
पीत-परागी
रंगों की रँगरेली पेली

काम्य कपोली
कुंज किलोली
अंगों की अठखेली ठेली

मत्त मतंगी
मोद मृदंगी
प्राकृत कंठ कुलेली रेली



नज़ीर अकबराबादी

 फागुन रंग झमकते हों तब
देख बहारें होली की।


और दफ़ के शोर खड़कते हों 
तब देख बहारें होली की।


परियों के रंग दमकते हों 
तब देख बहारें होली की।

ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों
जब तब देख बहारें होली की।


महबूब नशे में छकते हो 
तब देख बहारें होली की।

गुलज़ार खिलें हों परियों के 
और मजलिस की तैयारी हो।


कपड़ों पर रंग के छीटों से 
खुश रंग अजब गुलकारी हो।

मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो 
और हाथों में पिचकारी हो।


उस रंग भरी पिचकारी को 
अंगिया पर तक कर मारी हो।

सीनों से रंग ढलकते हों 
तब देख बहारें होली की।
....
आज का विशेष अंक
आनन्द आएगा आपको


अब बारी है विषय की
एक सौ ग्यारहवां विषय

दिलदार
उदाहरण हेतु
इसी अंक से
भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी की
रचना पढ़ें।

सादर..
#श्वेता


सोमवार, 9 मार्च 2020

1697...हम-क़दम का एक सौ दसवां अंक.. अभिसार

स्नेहिल अभिवादन..
अभिसार...
'अभिसार' भारतीय साहित्यशास्त्र का एक मान्य पारिभाषिक शब्द है, जिसका अर्थ है- "नायिका का नायक के पास स्वयं जाना" अथवा "दूती या सखी के द्वारा नायक को अपने पास बुलाना"। अभिसार में प्रवृत्त होने वाली नायिका को 'अभिसारिका' कहते हैं। दशरूपक के अनुसार जो नायिका या तो स्वयं नायक के पास अभिसरण करे अथवा नायक को अपने पास बुलावे वह 'अभिसारिका' कहलाती है- 'कामार्ताभिसरेत्‌ कांतं सारयेद्वाभिसारिका'। कुछ आचार्य अभिसारण का कार्य वाकसज्जा का ही निजी विशिष्ट व्यापार मानकर इसे अभिसारिका का व्यापक लक्षण नहीं मानते, परंतु प्राचीन आचार्यों के मत के यह सर्वथा विरुद्ध है। भरत मुनि ने तो कांत के अभिसाररण को ही अभिसारिका का प्रधान लक्षण अंगीकर किया है। 'भावप्रकाश' का भी यही मत है। कवियों की दृष्टि में अभिसारिका ही समस्त नायिकाओं में अत्यंत मधुर, आकर्षक तथा प्रेमाभिव्यंजिका होती है।...और आगे की जानकारियाँ...

आज रविवार को महिला दिवस के चक्कर में
हम भूल ही गए कालजयी रचनाओं को

उदाहरणार्थ दी गई रचना

कविवर नरेश मेहता जी की रचना-

यह सोनजुही-सी चाँदनी
नव नीलम पंख कुहर खोंसे
मोरपंखिया चाँदनी।

नीले अकास में अमलतास
झर-झर गोरी छवि की कपास
किसलयित गेरुआ वन पलास
किसमिसी मेघ चीखा विलास
मन बरफ़ शिखर पर नयन प्रिया
किन्नर रम्भा चाँदनी।

मधु चन्दन चर्चित वक्ष देश
मुख दूज ढँके मावसी केश
दो हंस बसे कर नैन-वेश
अभिसार रंगी पलकें अशेष
मन ज्वालामुखी पर कामप्रिया
चँवर डुलाती चाँदनी।

गौरा अधरों पर लाल हुई
कल मुझको मिली गुलाल हुई
आलिंगन बँधी रसाल हुई
सूने वन में करताल हुई
मन नारिकेल पर गीत प्रिया

वन-पाँखी-सी चाँदनी।
रचनाकार श्री नरेश मेहता



नियमित रचनाएँ
आदरणीय आशा सक्सेना
पलक पसारे बैठी है
वह तेरे इन्तजार में
हर आहट पर उसे लगता है
कोई और नहीं है  तेरे सिवाय 
हलकी सी दस्तक भी
दिल के  दरवाजे पर जब होती 
वह बड़ी आशा से देखती है

आदरणीय साधना वैद
कुछ तो अनोखी बात है,
दूर क्षितिज पर पहुँची 
अभिसारिका वसुधा का 
 प्रियतम मयंक की बाहों में 
थर थर कम्पित गात है 
कारवाँ बनाने को खुद 
अपनी ही परछाइयों का  
सुकून भरा साथ है,

आदरणीय कुसुम कोठारी
ऐसा अभिसार चातकी का ..

तिमिरावगूंठित थी त्रियामा ,
आकाश के छोर अर्ध चंद्रमा।
अपनी निष्प्रभ आभा से उदास कहीं खोया,
नीले आकाश के विशाल प्रांगण में जा सोया।
तारों की झिलमिलाहट उसे चुभ गई ,
उसकी ये पीड़ा चातकी के हृदय में लग गई ।
चल पड़ी अभिसार को वो, पंख फैलाकर अपने,


आदरणीय मीना शर्मा
शब्दों में प्यार कहूँ कैसे 

प्रेम नहीं, शैय्या का सुमन,
वह पावन पुष्प देवघर का !
ना चंदा है ना सूरज है,
वह दीपक है मनमंदिर का !
है प्यार तो पूजा ईश्वर की,
उसको अभिसार कहूँ कैसे ?

सुजाता.
अभिसार के पल

ओट ले,

पेड़ों की

झुरमुट्टों की।
दबे पाँव मैं
तुम तक थी पहुँची।

जाने किन

स्वप्नों में थे तुम लीन।

शायद थी मैं
तेरे अहसासों में विलीन।



आदरणीय विश्वमोहन कुमार
पुरुष की तू चेतना ...
छवि अगणित,
कंदर्प का,
शतदल सरसिज,
सर्प-सा.

काढ़े कुंडली,
अधिकार का,
अभिशप्त मैं
अभिसार का.

मैं छद्म बुद्धि विलास वैभव
मनस तत्व, तू वेदना.
....
आज इतनी ही रचनाएँ
कल मिलेंगी 

सखी श्वेता..
 विषय के साथ
सादर


रविवार, 8 मार्च 2020

1696....मैं गाँधारी नहीं बनूंगी, नेत्रहीन पति की आँखे बनूंगी

जय मां हाटेशवरी.....
पांच लिंकों का आनंद परिवार की ओर से......
आप सभी को महिला दिवस की शुभकामनाएं.....

मै नहीं राधा बनूंगी,
मेरी प्रेम कहानी में,
किसी और का पति हो,
रुक्मिनी की आँख की
किरकिरी मैं क्यों बनूंगी
मै नहीं राधा बनूँगी।

मै सीता नहीं बनूँगी,
मै अपनी पवित्रता का,
प्रमाणपत्र नहीं दूँगी
आग पे नहीं चलूंगी
वो क्या मुझे छोड़ देगा
मै ही उसे छोड़ दूँगी,
मै सीता नहीं बनूँगी।

मै न मीरा ही बनूंगी,
किसी मूरत के मोह मे,
घर संसार त्याग कर,
साधुओं के संग फिरूं
एक तारा हाथ लेकर,
छोड़ ज़िम्मेदारियाँ
मैं नहीं मीरा बनूंगी।

यशोधरा मैं नहीं बनूंगी
छोड़कर जो चला गया
कर्तव्य सारे त्यागकर
ख़ुद भगवान बन गया,
ज्ञान कितना ही पा गया,
ऐसे पति के लिये
मै पतिव्रता नहीं बनूंगी
यशोधरा मैं नहीं बनूंगी।

उर्मिला भी नहीं बनूँगी
पत्नी के साथ का
जिसे न अहसास हो
पत्नी की पीड़ा का ज़रा भी
जिसे ना आभास हो
छोड़ वर्षों के लिये
भाई संग जो हो लिया
मैं उसे नहीं वरूंगी
उर्मिला मैं नहीं बनूँगी।

मैं गाँधारी नहीं बनूंगी
नेत्रहीन पति की आँखे बनूंगी
अपनी आँखे मूंदलू
अंधेरों को चूमलू
ऐसा अर्थहीन त्याग
मै नहीं करूंगी
मेरी आँखो से वो देखे
ऐसे प्रयत्न करती रहूँगी
मैं गाँधारी नहीं बनूँगी।

मै उसी के संग जियूंगी,
जिसको मन से वरूँगी,
पर उसकी ज़्यादती
मैं नहीं कभी संहूंगी
कर्तव्य सब निर्वाहुंगी
बलिदान के नाम पर
मैं यातना नहीं संहूँगी
मैं मैं हूँ मै ही रहूँगी

वो सब बहुत महान थी,
शायद मैं उतनी महान नहीं .......
अब पेश है.....आज के लिये मेरी पसंद....


आखिर कब तक ...

भोग वासना, मन के कीड़े
कैंसर का उपचार करो
जो नारी की अस्मत लुटे
वह रावण संहार करो
दूजों की कुंठा का प्रतिफल
आपद से गुजरती बेटियाँ
आखिर कब तक दर्द सहेंगी
क्यों मरती रहेंगी बेटियां
 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर
किसी के लिए भी ज़िन्दगी आसान नहीं होती,
हमें विश्वास रखना चाहिए कि
हमारे अन्दर भी कोई हुनर छिपा है,
जिसे खोजना अनिवार्य है.

-ओप्रा विन्फ्रे

मलिका की तरह सोचिए.मलिका विफलता से नहीं डरती,क्यूंकि विफलता, सफलता की सीढ़ी ही होती है

तंग होली ...

शून्य हो गया जीवन सारा,
ख़ुशियों से नाता टूटा।
चीख उठी तब मौन वेदना,
जीवन जग से है रूठा।
शेष नहीं है अब अभिलाषा,
जलती इच्छा संग सभी।

जीना सीखिए ....

फल नहीं तो छाँव ,मयस्सर होगी जरुर,
बनकर हमदर्द बिरवों को सींचना सीखिए-
मुतमईन होईये मिल्खा व बोल्ट से बेशक
आपके तो पाँव हैं,बे-पांवों से चलना सीखिए-
आप तो भरे पूरे परिवार के चश्मों चिराग हैं
जिनका कोई नहीं उनसे भी जीना सीखिए -

मैं तेरी सोन चिरैया
मेरी फ़ोटो
घर को तेरे सुना करके
पिया का घर बसाऊँँगी
अब तक तेरी दुलारी थी
अब उस घर की सोनचिरिया कहलाउँँगी



थप्पड़ में प्यार, हक़ ढूँढ़नेवालो

है अपनी बिटिया और अपने काम के साथ।  क्योंकि उसने जो पाया है वह इतना भरपूर है कि कोई तमन्ना अब  बाक़ी नहीं रही। वह कहती भी है उसके साथ सबकुछ एफर्टलेस था।
लेकिन आम भारतीय स्त्रियां जानती हैं कि उनकी पूरी गृहस्थी  उन्हीं के एफर्ट्स पर टिकी हुई है जिसमें थप्पड़ जबरदस्ती, उनका कॅरिअर छोड़ना सब सामान्य  है।

कड़ाही
Fry, Potatoes, Pan, Cook, Oil, Boil
उसमें और कड़ाही में
बस इतना-सा फ़र्क है
कि कड़ाही को कभी-कभार
आराम मिल जाता है.

दुनिया पागल है या फिर मैं दीवाना
दीपक में असंख्य पतंगों को जलकर मरते हुए देख कर भी बाकी
पतंगे अपनी प्राण रक्षा की बात नहीं सोचते।
यह आकर्षण भी बड़ा विचित्र है।
और बहुत इसी पुस्तक से...



2 दिन बाद होली है......
आप सभी को मेरी ओर से.....
पावन होली की भी शुभकामनाएं.....
धन्यवाद।

शनिवार, 7 मार्च 2020

1695.. नारी

नारी तुझे सलाम Women's Day Special Hindi Poem बस रोटी के भाप,
उबले चाय-दूध के ताप के
जलन से ही अंदाजा है..
नारी का इंसान होना
उतने जलन से ज्यादा है...
प्रत्येक के हिस्से
आ ही जाते हैं
कई किस्से


रंगभरी होली हो,
फगुनाई टोली हो।
प्रेमरस पगी-सी,
कोयल की बोली हो।

मन का अनुबंध हो,
प्रेम का प्रबंध हो।
जीवन को परिभाषित,
करता निबंध हो।


–सवाल है...
2020 ई० में "थप्पड़" जैसी फ़िल्म बन रही है
और चर्चित हो रही आखिर क्यों ?
थप्पड़
. एक चेतन स्त्री को हमेशा खतरे के तौर पर ही देखा गया है.
चेतन स्त्री, घर, परिवार, समाज सबके लिए खतरा है.
वो सब परिवार खुशहाल हैं जहाँ स्त्रियों ने कभी सवाल नहीं किये
और पुरुषों ने यह बात कभी महसूस भी नहीं की.


हर पिता को यह फिल्म देखनी चाहिए और सोचना चाहिए
बेटियों के साथ सुंदर रिश्ता बुनने के बारे में.



स्वयं को पहचान, तुझ में शक्ति अपार है,
स्वयं को नमन कर और आगे बढ़ चल,
ठोकर मार उसे जो तेरा सम्मान करना न जाने,
बढ़ चल, बढ़ चल, नई राहें तेरा रस्ता तके हैं,
तेरे आंचल में हैं अपार खुशियां


महिला सशक्तिकरण : हालात कितने बदले हैं ?

बढाया था तुमने पहला कदम
जीवन भर मिला तुम्हें बस गम

पर नई राह तो दिखला दी
नारी को आज़ादी सिखला दी


आधुनिकता(मॉर्डनाइज़ेशन) सिर्फ हमारे पहनावे में आया है
लेकिन विचारों से हमारा समाज आज भी पिछड़ा हुआ है आखिर क्यों ?

आकडे बतलाते है कि वर्ष १९०१ में जहाँ १००० पुरुषो के मुकाबले ९७२ महिलाए थी ,वही २००१ में महिलाए की संख्या घटकर ९३३ रह गई | लिंग अनुपात की सबसे अच्छी स्थिति केरल और पांडिचेरी में है जहाँ पुरुषो से अधिक महिलाएं की संख्या है | दुःख की बात है कि सबसे ख़राब स्थिति देश के सुंदर वार्ड के शहर चंडीगढ़ और दीव  दमन की है , जहां १००० पुरुषो के अनुपात में महिलाए केवल ८०० है |


 सच का रूप एक यह भी..
><><
पुन: मिलेंगे
><><
हम-क़दम-110 का विषय है-
'अभिसार' 

उदाहरणस्वरूप कविवर नरेश मेहता जी की रचना-
यह सोनजुही-सी चाँदनी
नव नीलम पंख कुहर खोंसे
मोरपंखिया चाँदनी।

नीले अकास में अमलतास
झर-झर गोरी छवि की कपास
किसलयित गेरुआ वन पलास
किसमिसी मेघ चीखा विलास
मन बरफ़ शिखर पर नयन प्रिया
किन्नर रम्भा चाँदनी।

मधु चन्दन चर्चित वक्ष देश
मुख दूज ढँके मावसी केश
दो हंस बसे कर नैन-वेश
अभिसार रंगी पलकें अशेष
मन ज्वालामुखी पर कामप्रिया
चँवर डुलाती चाँदनी।

गौरा अधरों पर लाल हुई
कल मुझको मिली गुलाल हुई
आलिंगन बँधी रसाल हुई
सूने वन में करताल हुई
मन नारिकेल पर गीत प्रिया
वन-पाँखी-सी चाँदनी।
साभार : कविता कोश 




विश्व लघुकथा जगत से लघुकथाकार आमंत्रित हैं
जून 2020 लघुकथा प्रतियोगिता
अन्य की लिखी पिता पे लघुकथा पर समीक्षा
भेजने की अंतिम तिथि 30 मार्च 2020
lekhymanjoosha@gmail.com

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

1694.....मेरी पहुँच से दूर हो फिर भी...

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल
अभिनंदन
-------
 एक दिन महिला दिवस मनाने का कोई औचित्य मेरी समझ में नहीं आता है।  स्त्रियों की दशा और भावनाओं को समझने और महसूस करने की जरूरत है।  सृष्टि में स्त्री-पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक है इस बात को स्वीकरना आवश्यक न कि सम्मान देने का आडंबर करने की।
स्त्री-पुरुष के पारस्परिक सामंजस्य से ही बेहतर समाज का निर्माण होगा। 
"स्त्रियों को मंच से नहीं मन से सम्मान चाहिए।"

कोरोना के बढ़ते घातक प्रकोप से विश्वभर में भय का माहौल पैदा हो गया है। हमारे देश म़े इस बीमारी की दस्तक  अनिष्ट के संकेत से सभी भयभीत हैंं। कोरोना के गगनभेदी गड़गड़ाहट से महिला दिवस और फागुन के उत्सव के मधुर स्वर मद्धिम पड़ गये हैं। जिस तरह हम बदलते मौसम की आहट के अनुरूप अपनी दिनचर्या परिवर्तित करते हैं वैसे ही अगर इस विश्वव्यापी बीमारी के प्रति सतर्क रहेंगे और बचाव के सारे उपाय करेंगे तो आने वाले समय का प्रत्येक दिन स्वस्थ रहकर उल्लासपूर्वक जी सकेंगे। यह हम सभी नागरिकों की नैतिक जिम्मेदारी है कि हमारे आस-पास के जिन लोगों को इस बीमारी के बारे में जानकारी नहीं है उन्हें सही तथ्यों से परिचित करवाये और जागरूक करें। 
बीमारी सबंधित भ्रामक अफवाहों पर आँख मूँद कर भरोसा न करें, डरें या घबरायें नहीं कृपया धैर्य और विवेक से परिस्थितियों का सामना करें।


---------
आइये अब आज की रचनाओं का आनंद लीजिए-

आज के सम्मानीय रचनाकार क्रमशः

रेणु जी
ज्योति खरे सर
अनीता सैनी जी
सुधा देवरानी जी
कामिनी जी

★★★★★

तुम्हें बदलते देख रही हूँ

 मेरी पहुँच से दूर हो फिर  भी,.
अनजानी -सी ये  जिद  कैसी ?
चाँद खिलौने पर देखो - 
मनशिशु   मचलते   देख रही हूँ !!

★★★☆★★★

यार फागुन
शहर की
संकरी गलियों में भी
झांक लिया करो
मासूम गरीबों के सपने
रंगहीन पानी की तरह 
बहता मिलेंगे
झोपड़ पट्टी में
कुछ दिन गुजारो
भूखे बच्चों के शरीर में
कपड़ों के नाम पर
चिथड़ा ही मिलेंगे

★★★★★★



मनु काल के वही,  
फुँफकारते साँप, 
डंक मारते बिच्छू,  
बदचलनी की, 
वही ज़हरीली हवा, 
पल-पल पड़ते, 
 कुलटा,बाज़ारु नाम के,  
 वही नुकीले पत्थर, 
 तुम्हें मिट्टी-सी,

★★★☆★★★



हाथ पर यों हाथ धरकर,
सब कुछ मिले आराम से ।
हुक्म पर दुनिया चले,
लेना क्या किसी काम से।
नकली डिग्री उच्च पद पर,
बस हरी झण्डी चाहिए ।
आज जीने के लिए ,
इक शिखण्डी चाहिए।

★★★☆★★★


और चलते-चलते 

कोरोना वायरस की होम्योपैथी दवा

मैं खुद एक होमियोपैथिक प्रैक्टिसनर हूँ इसलिए आज मैं आप सब से एक जरुरी जानकारी साझा करना चाहती हूँ। उस पर यकीन कर आप कितना अमल करेंगे वो तो मैं नहीं जानती मगर एक डॉक्टर होने के नाते मैं ये अपना फर्ज समझ रही हूँ कि आप सभी से ये बहुमूल्य जानकारी साझा करूँ। अगर इस पर विश्वास करके आप इसका प्रयोग करेंगे तो यकीन मानिए कोरोना वायरस ही नहीं ,किसी भी तरह के वायरस से आप खुद को और परिवार को सुरक्षित रख पाएंगे। 

★★★★★★★


आज का अंक आपको कैसा लगा?

आपकी प्रतिक्रियाएँ
मनोबल बढ़ाती है।

हमक़दम का विषय

यहाँ देखिये

कल का विशेष अंक पढ़ना न भूलें

विभा दी आ रही है
अपनी अनूठी प्रस्तुति के साथ।

#श्वेता सिन्हा



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