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रविवार, 15 अक्टूबर 2017

821....भर आँचल में जुगनू तारे बाँट दूँ मैं अंधेरों को

सादर अभिवादन
बस चंद ही कदम की दूरी पर
खड़ी बेचैन सी है
हमारी अपनी दीपावली
असमंजस में है वह..
पता नहीं क्यों..
तमाम बंदिशों को भी 
इसी वक्त आना था...
बात-चीत में वक्त जाया न किया जाए....


सूरज डूबा दरिया में.......श्वेता सिन्हा
थके पाँव पंछी भी लौटे,दीप सपन के आँख जले
बिटिया पूछे बाबा को,क्या झोली में भर लाई शाम।


छोड़ पुराने नये ख़्वाब  नयना भरने को आतुर  हैं,
पोंछ के काजल चाँदनी डाले थोड़ी-सी पगलाई शाम।



तुमने ही तो कहा था 
कि मुझे खुद को तलाशना होगा 
अपने अन्दर छिपी तमाम अनछुई 
अनगढ़ संभावनाओं को सँवार कर 
स्वयं ही तराशना होगा 

दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाए रक्खा
इन चिरागों को हवाओं से बचाए रक्खा

हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी
हमने खुद को तेरी यादों में डुबाए रक्खा

अब बच्ची नहीं रही मेरी जीभ ,
अचानक से बड़ी हो गई है,
आजकल मेरी जीभ 
मेरे ही दांतों की दहशत में है.


मांग का मौसम.... अपर्णा वाजपेई
जब-जब बहारों का मौसम आता है,
वो ज़र्द पत्ते तलाशती है खुद के भीतर,
हरियाले सावन में अपना पीला चेहरा...
छुपा ले जाती है बादलों की ओट,


ब्रम्ह प्रहर...विश्वमोहन
लघु ऊर्मि बन दीर्घ उच्छवास,
सागर के वक्ष पर करे हास.

चढ़े श्रृंग, फिर गर्त में उतर,
सरपट दौड़े नाचे तट पर.

कर सैकत राशि से आलिंगन,
लहरें टूटें बिखरे जलकण.

Image result for ग़ज़ल
तेरी जुबां पे ना आई मेरी ग़ज़ल....सईद राही
एक -एक लफ्ज़ बन के उड़ा था धुंआ -धुंआ
उस ने जो गुनगुना के सुनाई मेरी ग़ज़ल

हर एक शख्स मेरी ग़ज़ल गुनगुनाएं हैं
‘ राही ’ तेरी जुबां पे ना आई मेरी ग़ज़ल
...........
पाँच दिनी पर्व का प्रारम्भ मंगलवार से..
सो मंगलवार तक अबाध
प्रकाशन जारी रहेगा....
दिनांक अट्ठारह से इक्कीस तक
एक ही रचना किसी प्रख्यात साहित्यकार

की प्रकाशित की जाएगी
विनम्र अनुरोध....
पाठकगण कृपया साहित्यकारों के नाम सुझाएँ..

सादर
यशोदा








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