सादर अभिवादन
भीतर के "मैं" का मिटना ज़रूरी है.... !
सुकरात समुद्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर
खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी।
वो उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा , -''तुम क्यों रो रहे हो?''
लड़के ने कहा- 'ये जो मेरे हाथ में प्याला है मैं उसमें इस समुद्र को भरना चाहता हूँ
पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।''
बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं रोने लगे।
अब पूछने की बारी बच्चे की थी।
बच्चा कहने लगा- आप भी मेरी तरह रोने लगे पर आपका प्याला कहाँ है?'
अब रचनाएं देखिए
परदा होता है जब
प्रतीक मर्यादा व लज्जा का ,
अच्छा होता है .
परदा चाहे साड़ी या चुन्नी का हो
या हो फिर आँखों का .
लेकिन
परदा गिरना आँखों पर
अभी अभी तो जगा नींद से
अभी अभी फिर सो गया दिन !
कितना छोटा हो गया दिन !
जाड़े का ये कैसा जादू
सूरज पर है इसका काबू
शाल - दुशाले, दुलई - कंबल
ओढ़ के मोटा हो गया दिन !
रास लीला के समय
सुना है कुछ ऐसा ही हुआ था
गोपियां
थी तो सही कहीं
पर उन्हें पता ही नहीं था
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मनोबल को रखें उन्नत।
सदा जिनसे हुयें आहत।।
करें उनका पराक्रम क्षय।
मिलेगी जीत बिन संशय।।
उदंडी दंड को पायें।
धरा का न्याय अपनायें।।
रहे मन में न अब दूरी ।
'नमन' यह चाह हो पूरी।।
ं
लकड़ी की औकात नहीं होती, पर लकड़ियों के गट्ठर की होती है। खुले हाथ की कोई औकात नहीं होती, कोई भी उंगली तोड़ सकता है। लेकिन बंद मुट्ठी और मुक्के की बहुत औकात होती है। ये सब मजदूर, कर्मचारी, किसान, दुकानदार, मेहनतकश जब इकट्ठा हो कर गट्ठर और मुट्ठी हो जाते हैं। जब वह मुट्ठी तन कर मुक्का हो जाए तो तो सर्वशक्तिमानों को पैदल दौड़ा देती है।
ं
आज बस
कल फिर
सादर




