।। उषा स्वस्ति ।।
दिल्ली को दिया गया ये दर्द असहनीय है...सर झुक रहा,क्या..
ये हमारे किसान या हमारे लोग हैं अगर ये है तो इन्हें क्या कहा जाये...
अज्ञेय जी के शब्दों के साथ आज लिंको पर नज़र डालें...
"सुनो हे नागरिक! अभिनव सभ्य भारत के नये जनराज्य के
सुनो! यह मंजूषा तुम्हारी है।
पला है आलोक चिर-दिन यह तुम्हारे स्नेह से, तुम्हारे ही रक्त से।
तुम्हीं दाता हो, तुम्हीं होता, तुम्हीं यजमान हो।
यह तुम्हारा पर्व है.."
अज्ञेय
पक्षियों को आजाद कर दीजिए
आजाद कर दीजिए घरों में कैद पक्षियों को ये पिंजरा हमारी भौतिक इच्छाओं की पराकाष्ठा है...। हम पक्षी को नकली मानकर उसे भी पिंजरे में ही देखना पसंद करते हैं... जिस तरह से असल पक्षी होता है...। हमें पक्षी को आखिर कैद क्यों करना है, क्यों हमने इस मानसिकता को इतना जड़ बना लिया है कि बाजार भी समझ गया कि हम पक्षी को कैद में रखने की इच्छाओं पर काबू नहीं कर पाएंगे... हालांकि एक और तर्क ये भी हो सकता है कि असली पिंजरे सेतो यही सही है लेकिन मेरी
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धन्य कोख,सैनिक जो जन्म करती है।
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शपथ लेते,
वर्दी देह पर धरते ही
साधारण से
असाधारण हो जाते
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| Dr. Varsha Singh |
- डॉ. वर्षा सिंह
हमने दिल में ये आज ठानी है
एक दुनिया नई बसानी है
जिनके हाथों में क़ैद है क़िस्मत
हर ख़ुशी उनसे छीन लानी है
दिल के सोए हुए चरागों..
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ये भारत के वीर
प्राण हथेली पे लिए
चौकस रहते वीर
गर्मी बर्षा शीत में
होते नहीं अधीर।
हर्षित मात वसुंधरा
पाकर ऐसे रत्न
अरिदल चकनाचूर
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पीले पुष्पों से लदे वृक्ष
जल में से झांकती
उनकी छाया
हिलती डुलती बेचैन दीखती
अपनी उपस्थिति दर्ज..
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।। इति शम ।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️




