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बुधवार, 15 जुलाई 2026

4804..हम चले आए

 

।।प्रातःवंदन।।
झीलों के पानी खजूर हिलेंगे,
    खेतों में पानी बबूल,
पछुवा के हाथों में शाखें हिलेंगे,
पुरवा के हाथों में फूल,
    आना जी बादल ज़रूर !

धान तुलेंगे कि प्रान तुलेंगे,
   तुलेंगे हमारे खेत में,
   आना जी बादल ज़रूर !!

~ केदारनाथ सिंह
आव्हान सब के लिए...प्रकृति भी विरासत लिए तैयार कि अब तो जमीन पर बिखर ही जाए..


मैंने
एक शब्दकोश के
समस्त शब्दों को
निर्देशित किया—

एक कविता के लिए।

और उन्हें

एक विस्तृत जाल की तरह..
✨️
  1.

हम चले आए हैं घर को 

तुम्हारे छलकते प्यार के संग 

लबालब भरा ही तो छलकता है 

आँखों से कोई रंग बिखरता है 

मन है कि उसी को पकड़ता है ..
✨️


सुख-दुःख उन्हें संभाले रखना।


जीवन का क्या, पल दो पल है

उसकी यादों के उजाले रखना।
✨️
भूल जाओ इसे रख के पाताल में.
ग़म न बाँटों किसी से किसी हाल में.

जीत ख़रगोश की हो या कछुए की हो,
फ़र्क़ होता है..
✨️
पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '...✍️

6 टिप्‍पणियां:

  1. पम्मी जी , चर्चा में शामिल करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद । बढ़िया लिंक्स

    जवाब देंहटाएं
  2. मैं सारे लिंक्स खोल नहीं पाई , कुछ तकनीकी कारण है क्या ? कृपया देखें ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात! सुंदर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं

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