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मंगलवार, 14 जुलाई 2026

4803...ललनाओं को राम ने छुआ नहीं, अधिकार कर लिया था राज्य पर...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

मंगलवारीय अंक में पढ़िए पाँच रचनाएँ-

भार्गव राम खण्डकाव्य - 36

ललनाओं को  राम ने छुआ नहीं,

अधिकार कर लिया था राज्य पर।

गर्भ में बालक पल रहे, उन्हें छोड़.

शेष  थे  रुधिर  में डूबे  भूमि  पर।।

*****

मौन

जीना है हर पल को शिद्दत से

न रहे कोई कटु स्मृति

न भीतर रह जाये

कोई अधपका विचार

संतुलन ही वह अग्नि है

जो भीतर जगानी है

*****

861.दृष्टि

और मत झुकाओ मुझे,

ज़रा सीधा होने दो,

इतना झुक चुका हूँ मैं

कि मुझे साफ़-साफ़ दिखने लगा है

अपना ज़रूरत से ज़्यादा झुकना,

तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा तनना।

*****

अशोक कालीन भारत (269–232 ईसा पूर्व) में नारी की सत्ता और सीमाएँ: एक विश्लेषण

 
उदाहरणार्थ, पुण्णा थेरी, एक दासी थी, अपनी गाथाओं में सांसारिक दुःख एवं शोषण से मुक्त होकर धम्म के माध्यम से आंतरिक शक्ति और स्वायत्तता प्राप्त करने के अनुभव को इस तरह व्यक्त करती है:

"सुख से सुख उत्पन्न होता है, दुःख से दुःख ही आता है;
जब मैंने सुख में छिपा हुआ दुःख पहचाना,
तब मैंने दुःख में छिपा हुआ सुख पाया।"

*****

हालात मेरे फैसला मेरा

वक़्त की एक सबसे खूबसूरत और सबसे खतरनाक खूबी यही है कि 'यह भी गुजर जाएगा'। आज जो हालात आपको अपाहिज महसूस करा रहे हैं, कल वो आपकी कहानी का सिर्फ एक हिस्सा होंगे जिसे सुनाकर आप दूसरों को प्रेरित करेंगे।

हालात को खुद को तोड़ने मत दीजिए, बल्कि उन्हें एक ऐसा हथौड़ा बनने दीजिए जो तराशकर आपको और मजबूत बना दे। उठिए, री-प्रोग्राम होइए और आगे बढ़िए!

*****

फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव

 


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