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रविवार, 19 अप्रैल 2026

4717...सब दर्शन को थे लालायित, प्रथम दर्शन हों शिशु राम के...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय अशर्फी लाल मिश्र जी की रचना से।

सादर अभिवादन।

रविवारीय अंक में पढ़िए पाँच पसंदीदा रचनाएँ-

भार्गव राम

जब जाना ऋषियों मुनियों ने,

भीड़ जुटी  ऋषि आश्रम पर।

सब दर्शन  को थे  लालायित,

प्रथम  दर्शन हों शिशु राम के।।

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'गुनाहों का देवता' उपन्यास को एक बार फिर पढ़ना (लेख)

चंदर सुधा से प्रेम तो करता है, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए अहसान और व्यक्तित्व पर हावी उसके आदर्श कुछ ऐसा ताना-बाना बुनते हैं कि वह चाहते हुए भी कभी अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाता। सुधा की नजरों में वह देवता बने रहना चाहता है और होता भी यही है। सुधा से उसका नाता वैसा ही है, जैसा एक देवता और भक्त का होता है। प्रेम को लेकर चंदर का द्वंद्व उपन्यास के ज्यादातर हिस्से में बना रहता है। नतीजा यह होता है कि सुधा की शादी कहीं और हो जाती है और अंत में उसे दुनिया छोड़कर जाना पड़ता है।

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शांति लाउंज: कहानी (सुशील कुमार)

नीचे उतरते ही शोर छँटने लगा — कदमों की आहट, बच्चों की हँसी, दुकानों के कनफोड़ संगीत — सब पीछे छूट गए। बेसमेंट में हल्की ठंडक थी और दीवारों पर नीली धुँधली रोशनी फैल रही थी। बीचों-बीच एक पारदर्शी केबिन था, जिस पर लिखा था — शांति लाउंज – पाँच मिनट का पूर्ण मौन अनुभव; नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था — कृपया अपनी आवाज़ अपने भीतर रखें। शीशे के पार दो-तीन आकृतियाँ धुँधली दिखीं। उसने फोन साइलेंट किया और काउंटर की ओर बढ़ी।  

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खेद

एक लेखक और एक पेशेवर वकील होने के नाते, मेरा यह सदैव प्रयास रहता है कि मेरे लेखन में 'फिक्शन' भले हो, पर 'तथ्य' पूरी तरह सत्य हों. मेरे ब्लॉग 'अनवरत' पर चल रही कथा श्रृंखला "देहरी के पार" इसी शोध और प्रामाणिकता की कसौटी पर कसी जा रही है. इसकी हर कड़ी बिल्कुल ताज़ा होती हैलिखने और प्रकाशित करने के बीच मुश्किल से 24 से 48 घंटों का अंतर होता है.

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इसरो का पीएसएलवी-सी ५२

जून आज सुबह जल्दी चले गये।शनि व रविवार को उन्हें असोसिएशन के काम में और अधिक समय देना होगा।वह अपने कार्य में बहुत रुचि ले रहे हैं, और उन्हें अपने काम में बहुत आनंद आ रहा है। उसने काव्यालय में एक कविता प्रकाशित की। छोटी ननद ने बताया छोटे पुत्र का कॉलेज दो वर्ष के बाद खुल रहा है। 

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शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों... क्यों शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता

सोमसूत्र : शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

▪️ क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :- सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

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फिर मिलेंगे।

रवीन्द्र सिंह यादव


2 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभात!! अक्षय तृतीया की शुभकामनायें, आज की सुंदर प्रस्तुति में 'एक जीवन एक कहानी' को शामिल करने हेतु बहुत बहुत आभार रवींद्र जी!

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