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बुधवार, 28 जून 2023

3802 ....आत्मा का बोझ उठाए कौन?

 

सादर अभिवादन
सखी पम्मी जी प्रवास पर हैं
सो जवाबदारी निभाना परम कर्तव्य है
देखिए आज क्या है
ये लगातार तीसरी प्रस्तुति है
.....
शब्दों को नाकाफी देख
मैं तुम तक पहुँचाना चाहता हूं
कुछ स्पर्श
लेकिन केवल शब्द ही हैं
जो इन दूरियों को पार कर
परिन्दों से उड़ते पहुँच सकते हैं तुम तक
- पुरुषोत्तम अग्रवाल


आइए रचनाएं देखें


जीवन एक पहेली जैसा ! .....अनीता जी

छोटा  मन  विराट हो  फैले

ज्यों बूंद बने सागर अपार,

नव कलिका से  कुसुम पल्लवित 

क्षुद्र बीज बने वृक्ष विशाल ! 




मूँदी पलकों से ... सुबोध सिन्हा

धुँधलके में जीवन-संध्या के 

धुंधलाई नज़रें अब हमारी,

रोम छिद्रों की वर्णमाला सहित 

पहले की तरह पढ़ कहाँ पाती हैं भला

बला की मोहक प्रेमसिक्त .. 
कामातुर मुखमुद्राओं की वर्तनी तुम्हारी ..



आसन नहीं है पिता होना ..... अरुण साथी

कहां आसान है
किसी के लिए
पिता होना
और
आसान कहां है 
पिता के लिए
कुछ भी,
यहां तक रोना भी


हर तरह से खैरियत है ,होनी भी चाहिए,

गर, जेठ की दोपहरी में कुछ खास मिल जायें,

तो फिर क्या बात है..!!

पर....

कहॉं आसान होता है,

शब्दों में बयां करना।


आसान है शायद ... श्वेता सिन्हा
वर्तमान परिदृश्य में...
चमकदार प्रदर्शन की होड़ में

बाज़ारवाद के भौड़े शोर में

सिक्कों के भार से दबी लेखनी, 

आत्मा का बोझ उठाए कौन?

बेड़ियाँ हैं सत्य, उतार फेंकनी



आज बस इतना ही
सादर









2 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभात! निज कर्त्तव्य के प्रति आपकी निष्ठा के लिए साधुवाद! शानदार अंक, 'मन पाये विश्राम जहां को' शामिल करने हेतु आभार यशोदा जी!

    जवाब देंहटाएं
  2. शानदार प्रस्तुति सभी लिंक्स उम्दा एवं पठनीय।
    सभी रचनाकारों को बधाई ए्वं शुभकामनाएं ।

    जवाब देंहटाएं

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