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मंगलवार, 23 मार्च 2021

2076 ..उठती हुई, हर एक मंज़िल में कहीं, उसे देखा है

सादर अभिवादन..
मार्च का तेईसवाँ दिन
कल का अंक देखी मैं
मुझे फिर से अनार आम सीखना पड़ेगा
सीख जाऊँगी धीरे से..
अलमस्त कुलाँचे मारे दौड़े,
हिरणी जैसी चाल।
शायर की मद मस्त शायरी
रूपसी का भ्रम जाल।

अक्षर आसव आप्लावित,
शब्द छंद मकरंद।
कलि कुसुम मन मालती,
मधु मिलिंद सुगंध।

”लगता है सैर पर निकला हो?”
कहते हुए, मंदी का चश्मा फिसलकर नाक पर आ गया ।
मोटी-मोटी आँखों से दूध और ब्रेडवाले को घूरने लगी।
”नहीं कॉलोनी की गलियों में
दूध और ब्रेड की महक फैलाने निकले हैं,
दिख नहीं रहा तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं क्या?”

उठती हुई, हर एक मंज़िल में कहीं, उसे देखा है,
ढोते हुए सिर पर गारे का घमेला,
किसी और की थी वो ख़्वाबों की सीढ़ियां,
उसे पाया है टिन की टपरी में बहुत अकेला,
रुकता नहीं है, किसी के लिए ज़िन्दगी का मेला।

ज़िन्दगी एक आइसक्रीम है मीठी
जिसे खाकर ख़त्म करे दुगना मज़ा
मगर पिघल जाये तो क्या जिया
छोटी सी सही मिठास देकर जाना !


आज जरुरत है अपने आस-पास के पर्यावरण के साथ-साथ
उसमें रहने-पलने वाले छोटे-छोटे जीवों का भी
ख्याल-ध्यान रखने की ! इसके लिए सरकारों का
मुंह ना जोहते हुए हर नागरिक को यथाशक्ति,
यथासंभव खुद ही कुछ ना कुछ प्रयास करने होंगे !
कहीं ऐसा ना हो कि किसी दिन नीले से
धूसर होता जा रहा नभ, नभचर विहीन भी हो कर रह जाए.........!


सुडौल हैं दोनों
नहीं है कोई नुकीलापन किसी भी कोने में
कोना ही नहीं उनमें
नदी के तल में रहते-रहते जब
दो पत्थर आपस में टकराते हो जाते हैं चिकने
खो जाता है हर खुरदुरापन
.....
आज बस
कल आएगी पम्मी सखी
सादर

 

 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर सराहनीय प्रस्तुति आदरणीया यशोदा दी।
    मेरी लघुकथा को स्थान देने हेतु दिल से आभार।
    सादर नमस्कार।

    जवाब देंहटाएं
  2. एक से बढ़ कर एक लिंक्स , रूपसी के भ्रमजाल से लेकर शिवलिंग तक सभी बढ़िया ।

    जवाब देंहटाएं
  3. सभी रचनाएँ बहुत सुन्दर हैं।

    जवाब देंहटाएं
  4. छोटी से भूमिका के साथ पठनीय लिंक्स की सुंदर प्रस्तुति !

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर लिंकों का संयोजन। बधाई और आभार!!!

    जवाब देंहटाएं
  6. कृपया मेरे ब्लाॅग पर भी एक नजर अवश्य डाले

    जवाब देंहटाएं

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

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