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रविवार, 21 मार्च 2021

2074....थक कर बैठ गये क्या भाई मंजिल दूर नहीं है

जय मां हाटेशवरी.....
 सन् 1999 में पेरिस में हुए यूनेस्को के 30वें अधिवेशन में
तय किया गया कि हर साल 21 मार्च को
विश्व कविता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
ऐसा अभिव्यक्ति व कला के इस माध्यम को बढ़ावा देने के लिए किया गया था।
कविताएं प्राचीन काल से ही न ही सिर्फ़ मानव मन को बल्कि समाज के
विभिन्न मुद्दों को कलात्मक ढंग से कहने का एक ठोस तरीका रही हैं।
भारत में ऋषि-मुनियों ने काव्य व छंदों में कितनी ही बातें कहीं हैं,
कितना साहित्य चौपाई और दोहे में संजोया गया है। 
इसी क्रम में यूनेस्को का मानना है कि कविताएं के माध्यम से
आंचलिक भाषाओं को भी बचाया जा सकता है। 21 मार्च का यह दिन कविता 
के रूप में मानव सभ्यता के भीतर मौजूद भाषाओं की विविधता का उत्सव है।
कविताओं ने सदा से ही अपने समय की गवाही दी है,
मानव मन के राग गाए हैं और लोगों को जोड़ने का काम किया है।कितने ही
आंदोलनों से लेकर पर्वों तक कविताएं ही एक स्वर के रूप में बाहर आती हैं।
 आज की हलचल का आरंभ करते हुए पेश है
हिंदी साहित्य से 'दिनकर' द्वारा जी रचित
 आशा का दीपक 
 
यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है

चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
शुरू हुई आराध्य भूमि यह क्लांत नहीं रे राही;
और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेप है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

सुनो, न तुम वापस आ जाओ
तुम बिन न जी पाऊँगी
रक्तिम हुई क्षितिज सिंदूरी
आज साँझ ने माँग सजाई
तन-मन श्वेत वसन में लिपटे 
रंग देख कर आए रूलाई
रून-झुन,लक-दक फिरती 'वो',
ब्याहता अब 'विधवा' कहलाई

पनपते हैं धागे जो तेरे ही मन में
बनते हैं नगमें वो सुर के चमन में
तेरे राग का तू खुद ही ख़ुदा है

हसीं इस जहाँ में सब ही हसीं हैं
चाहता है तू जिसको वो दिलनशी है
देख लें खुद को तू तुझे क्या कमी है
अपने आपको ही नहीं जानता है

सुधा मैम ने स्कूल के समापन सभा के समय कड़ाई से कहा,
कल से सभी को पूरे स्कूल ड्रेस में आना है और सभी के साथ लंच बॉक्स
और पानी की बोतल होनी चाहिए।" सभा विसर्जित होने के बाद सुधा मैम की
कुलीग ने पूछा, " यह अचानक इतनी कड़ाई क्यों" " इसी कड़ाई की कमी है,
तभी तो सरकारी उपेक्षित है। इसके लिए सरकार क्या करेगी जब
मानसिकता ही सरकारी बनी रहेगी।" सुधा मैम की चाल में
बदलाव लाने की दृढ़ता झलक रही थी।

कल किसने देखा है,
अपने आज में खुश रहो, खुशियों का इन्तजार किस लिए,
दूसरों की मुस्कान में खुश रहो, क्यूँ तड़पते हो हर पल किसीके लिए,
कभी तो अपने आप में खुश रहो, छोटी सी जिन्दगी है
तो हर हाल में खुश रहो !!

कारवां जब  हो निगाहों में
जुस्तजू सिमटी हो बाँहों में ,
ऐसे खुशनुमा माहौल में
किसी तूफ़ान का ज़िक्र न करो ।

 

मृत हैं ये दीवारें
मृत हैं ये दीवारें
या मैं ही मृत हूँ
वो हिलती नहीं
और स्थावर मैं
जिसे रेंगना मना है। 

कल मिलेंगी संगीता दीदी
आभार
 धन्यवाद।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर रचनाएँ..
    विश्व कविता दिवस की शुभकामनाएं
    आभार आपका..
    सादर....

    जवाब देंहटाएं
  2. सुंदर काव्य ! कविता दिवस की हार्दिकशुभकामनाएं 🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँँ 💐💐💐💐 सुंदर प्रस्तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  4. कुलदीप जी
    अनछुए लिंक्स लाये हैं मृत सी दीवारों में , कल किसने देखा है ? कारवां जब हो निगाह में तो धागे पनप जाते मन में और तेरे बिना जीवन की कल्पना भी नहीं । हर ओर सरकारी की उपेक्षा कुछ तो बदलाव हो ।सारे लिंक्स पढ़ लिए ।
    चर्चा का आनंद आया । दिनकर जी की कविता ने पूरा दिन बना दिया ।
    आभार

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर रचनाएँ। आने पर्व ही सभी को बधाई

    जवाब देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  7. शानदार लिंक्स तथा प्रस्तुति ... मेरी ब्लॉग की पोस्ट को शामिल करने के लिए बहुत-बहुत आभार धन्यवाद प्रथम बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ अच्छा ब्लॉग...

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत आभारी हूँ कुलदीप जी आपने इस सुंदर और पठनीय अक में मेरी रचना को मान दिया।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं

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