पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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गुरुवार, 23 मार्च 2017

615...ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।

आज 23 मार्च है यानि शहीद दिवस.
आज ही के दिन वर्ष 1931 की मध्यरात्रि को अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के तीन सपूतों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटका दिया था.
शहीद दिवस के रुप में जाना जाने वाला यह दिन यूं तो भारतीय इतिहास के लिए काला दिन माना जाता है पर स्वतंत्रता की लड़ाई में खुद को देश की वेदी पर चढ़ाने वाले
यह नायक हमारे आदर्श हैं....
मैं पांच लिंकों का आनंद  परिवार की ओर से  भारत माता के इन  अमर सपूतों को कोटी कोटी नमन करता हूं...

जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो अक्‍सर ऐसे टीचर और नेताओं से मुलाकात होती, जो हमें तो भगत सिंह के विचारों से प्रेरित होने और उनके रास्‍ते पर चलने की सलाह देते।
लेकिन अपने बेटे- बेटियों से हमेशा यह राह छिपा कर रखा करते। अगर किसी का बेटा या बेटी भटकता हुआ उधर गुजरने की कोशिश करता तो उसे यह समझाकर वापस लौटा लाते
कि अभी हालात ऐसे नहीं हैं। (भौतिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हुई हैं।) ‘यानी भगत सिंह बहुत महान। बहुत अच्‍छे। लेकिन भगत सिंह मेरे घर में नहीं बल्कि पड़ोसी
के घर पैदा लें।‘  यही आज के मध्‍यवर्ग का मानस भी है। आज इसी मानस का फैलाव दूर-दूर तक है। इसलिए भगत‍ सिंह की वीरता के गान हम भले ही आज जितना गा लें। उनके
विचार से दो चार होने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते क्‍योंकि विचार बड़े बदलाव की ओर ले जाते हैं। बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती।
 ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है … दूसरो के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।
भगत सिंह जब पांच-सात साल के थे तब वे एक खेल खेला करते थे,  जिसमे अपने सभी दोस्तों को सो टुकड़ियों में बाट देते थे और एक दूसरे पर आक्रमण करते थे।
जब अंग्रेजो द्वारा पंजाब के अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड हुआ, उस वक्त भगत सिंह अपनी स्कूल में पढ़ रहे थे और जैसे ही उसे यह पता
चला तब वो स्कूल से 12 किलोमीटर पैदल चलकर जलियावाला बाग आ पहुचे और इस हत्याकांड को देखकर भगत सिंह की सोच पर गहरा असर पड़ा।
समय रहते एक तरफ गांधीजी का असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों के हिंचक आंदोलन शुरू हुए, जिनमे भगत सिंह को अपने लिए रास्ता चुनना था कि वे
किस आंदोलन का हिस्सा बने। कुछ समय बाद गांधीजी का असहयोग आंदोलन को बंध कर दिया गया और भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए क्रांति के रास्ते पर चलना ठीक समझा,
उसके बाद वें क्रन्तिकारी दलो के सदस्य बनने लगे।
अब आज की चुनी हुई रचनाएं...
एक बार फिर...ब्लौगों के दबे खजाने से ही...






जीवन
तेरा मेरा सबका जीवन पल दो पल का लेखा है
गिन कर सबकी साँसे, चोला पञ्च-तत्त्व का पहना है
सागर की लहरों सा जीवन तट की और है दौड़ रहा
किस को मालुम तट को छू कर लहरों को तो ढहना है
लिंगदोह कौन है ? पता करवाओ
आओ मिल
बाँट कर चाय
समोसे खाओ
बिल थानेदार
के नाम
कटवाओ
शासन के
जासूसों के
आँख में
घोड़ों के
आँख की
पट्टियाँ
दोनो ओर
से लगवाओ
जब तक सांस चल रही है जीवन है। सांस गई जीवन गया। दिल का काम तमाम हुआ। ऑक्सीजन उठानी बंद ,खून का संचरण बंद। यही मृत्यु है चिकित्सा विज्ञान की शब्दावली में
मौत का मतलब है देहांत बोले तो देह का अंत। सब कुछ खत्म नहीं होता है ,देह मरती है। देही नहीं। शरीर
मरता है शरीरी नहीं।
जब तक सांस चल रही है जीवन है। सांस गई जीवन गया। दिल का काम तमाम हुआ। ऑक्सीजन उठानी बंद
,खून का संचरण बंद। यही मृत्यु है चिकित्सा विज्ञान की शब्दावली में इसे नैदानिक मृत्यु (Clinical death )कह
लो। क्या फर्क पड़ता है।दिल धड़कना बंद  हुआ ,दिमाग भी चंद मिंटो बाद ठंडा हो जाता है।ऑक्सीजन दिमाग
को भी चाहिए दिल को भी। दौरा दिल का भी पड़ता है दिमाग का भी दोनों काम करना भी बंद करते हैं पूर्णतया।
साइंसदान दिमागी मृत्यु को आखिरी मृत्यु , मानते बूझते हैं।  
पांच मकान मालिक थे इस देह के वायु -अग्नि -आकाश -पृथ्वी -जल.
 मौत के बाद पाँचों अपना हिस्सा ले लेते
हैं।
विचारों की श्रंखला
 अब कोई बच्ची  नहीं
जो भय मन में पालूँ
कर्तव्य से मुंह मोड़ कर
पलायन करूं  |
चाहती हूँ रखूँ
अस्तित्व अक्षून्य अपना
ना हो बाधित
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
अवाध गति से बढ़ती जाए
विचारों की श्रंखला |
मौत क्यूँ ........ ? जीवन अनमोल है ......! "
जिन्दगी पथ है ,मंजिल की तरफ जाने  का ,
  मौत गीत है , सदा मस्ती में गाने का .
 जिन्दगी नाम है ,तूफान से टकराने का ,
 मौत  नाम  है  आराम  से  सो  जाने  का ."
किसी  शायर  की  ये  चंद  लाइन  कुछ  न  कहते  हुए  भी  बहुत  कुछ  कह  जाती  है . जिन्दगी  के   प्रति हिम्मत  दिलाती  हुई  इन  चंद   पंक्तियो  ने   जिन्दगी 
और  मौत  के  अंतर  को  आसानी  से  व्यक्त  कर  दिया है  .  पर  लगता  है  यह  सिर्फ  किताबो  के  बंद  पन्नो  में  ही  उलझ  कर  रह  गयी  है  और  जिन्दगी
धन्यवाद।















6 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    आओ मिल
    बाँट कर चाय
    समोसे खाओ
    बिल थानेदार
    के नाम
    कटवाओ
    क्या सच में होता है क्या
    अच्छी प्रस्तुति
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर प्रस्तुति कुलदीप जी। आभार 'उलूक' के एक पुराने पन्ने 'लिंगदोह कौन है ? पता करवाओ' का जिक्र भी करने के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदर संकलन, शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति है आपकी। भविष्य के लिए शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं

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