निवेदन।


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रविवार, 25 दिसंबर 2022

3618 ...धर्म कोई भी ना होता, देशधर्म ही होता धर्म एकमात्र

 सादर अभिवादन

आज बडा दिन
क्रिसमस का पर्व


क्रिसमस या बड़ा दिन ईसा मसीह या यीशु के जन्म की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। यह 25 दिसंबर को पड़ता है और इस दिन लगभग संपूर्ण विश्व मे अवकाश रहता है। क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है। एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म, 7 से 2 ई.पू. के बीच हुआ था। 25 दिसंबर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं हैं और लगता है कि इस तिथि को एक रोमन पर्व से संबंध स्थापित करने के आधार पर चुना गया है। आधुनिक क्रिसमस की छुट्टियों मे एक दूसरे को उपहार देना, चर्च मे समारोह और विभिन्न सजावट करना शामिल हैं।

और साथ ही साथ
आज की थीम लाईन
धर्म कोई भी ना होता, देशधर्म ही होता धर्म एकमात्र
भारतरत्न स्मृतिशेष अटल जी की जयंती भी
......
मिली-जुली रचनाएं पढ़िए



जन-जन को सन्देश दिया,
सच्ची बातें स्वीकार करो!
छोड़ बुराई के पथ को,
अच्छाई अंगीकार करो!!
कुदरत के ज़र्रे-ज़र्रे में,
रहती है प्रभु की माया।
निर्धनता में पलकर जग को
जीवन दर्शन समझाया।।




पीर पंजाल का नाम होता
पञ्चालधारा  पर्वत माला?
पी ओ जे के होता भारत में,
गिलगिट पर फहराता तिरंगा निराला?

अटल होते आज अगर
रग रग हिन्दू मेरा परिचय,
भारत का वेद वाक्य होता
सत्य सनातन  ही
देश का अभिनव साक्ष्य होता.




उम्मीद का रंग कैसा होता है
जाने बगैर उस रोज मैंने
अपनी हथेलियों पर
एक बादल बनाया था.

आगे बढ़ते हुए
अपनी हथेलियों को कसकर बांधे थी
बरसों से बीत रहे को
बीत चुका है की मुहर लगने को है




" फिर क्या? फिर मेरे आत्मचेतना के अँखुए उग आए उन्हें महसूस किया। कुछ समय पश्चात धीरे-धीरे मुझे दिखने लगा।” साँची ने उसके विश्वास को और गहरे विश्वास के रंग में रंगते हुए कहा परन्तु न जाने क्यों फिर भी उसने पैर दहलीज के अंदर खींच लिए?

आज्ञा दीजिए
सादर नमन

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

3617... याद



 हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

जब किसी यौगिक शब्द  शब्द से किसी रूढ़ अथवा विशेष अर्थ का बोध होता है अथवा जो शब्द यौगिक संज्ञा के समान लगे किन्तु जिन शब्दोँ के मेल से वह बना है उनके अर्थ का बोध न कराकर, किसी दूसरे ही विशेष अर्थ का बोध कराये तो उसे योगरूढ़ कहते हैँ।

आप भुलाकर देखो, हम फिर भी याद आएंगे,

आपके चाहने वालों में,

आपको हम ही नज़र आएंगे,

आप पानी पी-पी के थक जाओगे,

पर हम हिचकी बनकर याद आएंगे.

देखती रह गयी तलवारें सब, बिछड़ते वक्त..

उनके लफ्जों का वार इतना कमाल का था।

कहीं यादों का मुकाबला हो तो बताना जनाब..

हमारे पास भी किसी की यादें बेहिसाब होती जा रही हैं।

एक ही हादसा तो है और वो यह के आज तक

बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई

बाद भी तेरे जान-ए-जां दिल में रहा अजब समाँ

याद रही तेरी यां फिर तेरी याद भी गई

दिल की हर बात कहना कोई जरूरी नही,

अपने लबों पर खामोशी सजाए रखिये|

तनहा न रहोगे इस दुनिया में कभी भी

यार न सही, एक दुश्मन बनाए रखिये|

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पुनः भेंट होगी...
>>>>>><<<<<<

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

3616.....कौन यहाँ किसका साथी

शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
--------- 
दिसंबर की हाड़ कँपाती सर्दियों में
अनगिनत ठिठुरते दृश्यों के साथ
कुछ अनदेखी कल्पनाएँ
मेरे मन को बैचेन करती है 
क्या आपने सोचा है कभी
सरहद के रखवालों की बर्फीली रातों के बारे में
उन्हें हृदय से नमन करती हूँ-

हिमयुग-सी बर्फीली
सर्दियों में
सियाचिन के
बंजर श्वेत निर्मम पहाड़ों 
और सँकरें दर्रों की
धवल पगडंडियों पर
चींटियों की भाँति कतारबद्ध
कमर पर रस्सी बाँधे
एक-दूसरे को ढ़ाढ़स बँधाते
ठिठुरते,कंपकंपाते,
हथेलियों में लिये प्राण
निभाते कर्तव्य
वीर सैनिक।


--------
आइये आज की रचनाओं के संसार में चलते हैं।

मन में हर समय हजारों लाखों विचारों जन्म लेते रहते हैं। मानों मन एक सागर की तरह हो, जिसमें विचारों की लहर उठती ही रहती है। इसका कोई ओर कोई छोर नहीं। यह एक पल में ही हजारों मील की दूरी तय कर लेता है। मन बहुत चंचल है। मन कभी आकाश की ऊंचाई तक चढ़कर अनंत आकाश में विचरण करने लगता है, और कभी गहरे पाताल में जाकर गिर पड़ता है। कभी यह श्रेष्ठ विचारों का सृजन करता है तो कभी यह नीच विचारों पर चिंतन करने लग जाता है। कभी यह भी परमात्मा परमेश्वर में खुद को रमा कर विरक्ति भाव लिए  गहन चिंतन में लीन हो जाता है, तो कभी इसके ठीक विपरीत सांसारिक विषय वस्तु के चिंतन में डूब जाता है।
पढ़िए एक मननशील रचना
कौन यहाँ किसका साथी है 
जान न पाया कोई 
कर्म बंधन से बंधे हुए सब 
कैसे पाएँ आज़ादी ? 
नित बंधन ही काट- काट 
मन होगा  आह्लादी।
रे मन !  चल तू एकाकी !  

हर तस्वीर की अपनी कहानी होती है
 अनकहे ख़्यालात की बोलती निशानी होती है
रंग जो पलभर में क़ैद हुए वक़्त के दायरे में
उनमें  ज़ज़्बात की ज़िंदा रवानी होती है।

भैंस को कथरी 
ओढ़ा रहे हैं
एक अकेली कुतिया
पिल्ले जिला रही है,
एक अकेला 
पाड़ा 
थर-थर कांप रहा है।


सब हारे से मायूस होंगे बैठे उसदिन
दिशाओं में गूँजेगी तुम्हारी आवाज़
पर्वतों से होगा कविता का शंखनाद
दिन का समूचा प्रकाश भींचकर
रात की आँखों से अंधेरा खींचकर
तुम बदल दोगे हौले से संसार उसदिन

खूब दौड़े थे मगर वक़्त कहाँ हाथ आया,
यूँ ही किस्मत ने हमें खूब छकाया उस दिन.
 
होंसला रख के जो पतवार चलाने निकले,
खुद समुन्दर ने हमें पार लगाया उस दिन.



दरख़्तों, दीवारों, मयखाने में न मिली
किसी अपने और बेगाने में न मिली 
वफ़ा की तलाश में भटकता रहा उम्रभर
उसकी परछाईं भी ज़माने में न मिली।

किस्से भी फाख्ता हुये रांझों के,
कशिश  हीर के फसाने  में न रही।

बेवजह भटक रहा तू तलाश में,
वो वफा अब जमाने में न रही।


और चलते-चलते परिस्थितियों पर आँसू बहाने से
कोई हल तो नहीं निकलता, जरूरत है दृष्टिकोण 
बदलकर बदली हुई परिस्थितियों को
देखने की

क्या तुम्हारा बेटा किसान बनने के लिए तैयार हुआ?"

"बेरोजगारी दूर करने के लिए नौकरी ना मिलने के कारण अपना धंधा शुरू करना गलत नहीं है .. । पढ़ा-लिखा नौजवान है, देश को आगे बढ़ानेवालों में से एक होकर चलेगा। "

---------

आज के लिए इतना ही 
कल का विशेष अंक लेकर
आ रही है प्रिय विभा दी।

---
-श्वेता












गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

3615...तुम्हारे लिए हम क्या कर सकते है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया आशा लता सक्सेना जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

कोविड-19 की चौथी लहर की चर्चा रफ़्तार पकड़ रही है। सावधानियों का पालन कीजिए और अपने स्वास्थ्य का ख़याल रखिए।

गुरुवारीय अंक में पाँच रचनाओं के लिंक्स के साथ उपस्थित हूँ-

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

तुम देश के रखवाले

कदम पीछे नहीं लौटाना

मन में दृढ संकल्प रखना

तुम्हारे लिए हम क्या कर सकते है

केवल प्रार्थना के अलावा। 

६८६.आइसक्रीम

वह जो बच्चा

मेरे मुहल्ले में

आइसक्रीम बेचता है,

उसका भी मन करता है

कि वह भी खाए

कभी कोई आइसक्रीम.

परिवर्तन--

विकास,

विप्लव-विद्रोह, काया-कल्प, रुपातन्तरण
सब कुछ छुपा
रहता है
सिर्फ़
काग़ज़ कलम में, वही रास्ता वही संघर्षरत-चेहरे,

नए रचनाकारों के लिए आवश्यक जानकारी 

साधारणतः अच्छी फार्मेटिंग में प्राक्कथन, भूमिका. मेरी बात, लेखक परिचय , विषय सूची, आभार, समर्पण प्रथम रचना इत्यादि दाहिने पृष्ठ से शुरू की जाती हैं। इससे कुछ पृष्ठ खाली छोड़ने पड़ते हैं। क्योंकि यह पृष्ठ लागत में गिने जाते हैं इसलिए इसमें लेखक की सहमति जरूरी होती है।

सआदत हसन मंटो की ये पांच लघुकथाएं...इंसानियत के परखच्‍चे उड़ा देती हैं

सआदत हसन मंटो भारतीय उपमहाद्वीप के महान उर्दू कहानीकार थे। उनकी कहानियां भारत-पाक विभाजन के दंश का प्रामाणिक दस्तावेज हैं। बंटवारे के दर्द को बेहद गहराई से समझने, उसके संवेदनात्मक व मानवीय पहलू को बेहतरीन रूप से प्रस्तुत करने का नाम है मंटो! मानवीय त्रासदी उनकी रचनाओं में बेहद शिद्दत से उपस्थित हुआ है, इसीलिए वे दोनों देशों में आज भी लोकप्रिय हैं।

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 21 दिसंबर 2022

3614 रचनाएं, जो पढ़ी नहीं गई पर पढ़ी जानी चाहिए थी

सादर अभिवादन
कल ही आपने सखी सुधा जी की पसंदीदा
बेहतरीन रचनाओं का आस्वादन किया...और
आज एक ही ब्लॉग से
एक नई सोच
सखी सुधा देवरानी अपरिचित नहीं है
ब्लॉग जगत में
उनकी लिखी कुछ
चुनिन्दा अपठित रचनाएँ
जो पढ़ी नहीं गई पर
पढ़ी जानी चाहिए थी
आज पढ़िए...
.......


काम नहीं राम मंदिर की चर्चा इन्हें प्यारी है,
शुक्र है इतना कि अभी मोदी जी की बारी है।
                                        
मोदी जी का साथ है,देश की ये आस है।
कुछ अलग कर रहे हैं,और अलग करेंगें,
यही हम सबका विश्वास है।




जब जान लिया पहचान लिया,
नहीं वो तेरा यह मान लिया ।
बेरुखी उसकी स्वीकार तुझे,
फिर घुट-घुट जीवन जीना क्या ?
हर पल उसकी ही यादों में,
गमगीन तेरा यूँ रहना क्या ?......
तेरा छुप-छुप आँसू पीना क्या ?





आजकल भी कुछ नेता बड़े दूरदर्शी हो गये,
देखो ! कैसे दल-बदल मोदी -लहर में बह गये

इसी को कहते हैं चलती का नाम गाड़ी,
गर चल दिया तो हुआ सयाना
छूट गया तो हुआ अनाड़ी ।

नीतीश जी को ही देखिये, कैसे गठबंधन छोड़ बैठे !
व्यामोह के चक्रव्यूह से, कुशलता से निकल बैठे !



बसंत की मेजबानी अभी चल ही रही थी,
तभी दरवाजे पर दस्तक दे गर्मी बोली ,
"लो मैं आ गई"

औऱ फिर सब एक साथ बोल उठे,
उफ ! गर्मी आ गई  !



समय तू पंख लगा के उड़ जा....
उस पल को पास ले आ...
जब मैं मिल पाऊँ माँ -पापा से ,
माँ-पापा मिल पायें मुझसे
वह घड़ी निकट ले आ.....
समय तू पंख लगा के उड़ जा ।




लिखने का मन है,
लिखती नहीं लेखनी,
लिखना मन चाहता,
कोई जीवनी कहानी ।
शब्द आते नहीं, मन
बोझिल है दुःखी लेखनी ।




दुख एक फर्ज है,
फर्ज तो है एहसान नहीं ।
फर्ज है हमारे सर पर,
कोई भिक्षा या दान नहीं ।

दुख सहना किस्मत के खातिर,
कुछ सुख आता पर दुख आना फिर ।
दुख सहना किस्मत के खातिर   




जब निकले थे घर से ,अथक परिश्रम करने,
नाम रौशन कर जायेंगे,ऐसे थे अपने सपने.......
ऊँची थी आकांक्षाएं , कमी न थी उद्यम में,
बुलंद थे हौसले भी तब ,जोश भी था तब मन में !!
नहीं डरते थे बाधाओं से, चाहे तूफ़ान हो राहों में !
सुनामी की लहरों को भी,हम भर सकते थे बाहों में




झुक-झुक के ताकने की
कोशिश सभी किये थे,
घूरती नजरों के बाणों से
तन बिधे थे,
ललचायी थी निगाहें
नजरों से चाटते थे......
घूँघट स्वयं उठाया तो बवाल मच गया !!!


आज्ञा दीजिए

सादर नमन 

मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

3613, आइए चलते हैं एक नजरिए के मोड़ से

सादर अभिवादन 
आज की अतिथि चर्चाकार हैं 
आदरणीया सुधा देवरानी जी 
प्रिय सुधा जी की यथार्थ परक सुघड़ लेखनी
से हम सभी परिचित है आज उनकी
रचनात्मकता का एक और रूप इस शानदार
अंक के रूप में आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है-
-----
 नमस्कार मित्रों !
 आज की प्रस्तुति में आप सभी का सादर अभिवादन
आइए चलते हैं एक नजरिए के मोड़ से

बात सिर्फ नज़रिए की है
कौन किस नज़रिए से क्या कहता है ,करता है
कौन किस नज़रिए से उसे सुनता,और देखता है
और इन सबके बीच 
एक तीसरा नज़रिया
उसे क्या से क्या प्रस्तुत कर देता है,
जाने क्या मायने रखता है सबके लिए !!!


जी ,सही कहा सबका अपना-अपना नजरिया है । फिर भी एक प्रश्न तो बनता ही है न कि 
आखिर सृष्टि की चिंता जो है।


अस्त्र - शस्त्र निर्माण कर
स्वयं का ही संहार कर
क्या चाहते हो मानव ?
इस सृष्टि का विनाश कर ।


 रोकने से भी कहाँ रुक रहा है कोई । सृष्टि की  परवाह किये बगैर मनमानी करता मनुष्य आज सृष्टि के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं।यही तो है

और व्यथा से घट झरा है
वेदना की दामिनी से
शूल का भाथा भरा है
नित सुलगती ताप झेले
अध जली काठी जली जो।।



अरे ! विश्व की तो क्या यहाँ तो घर की समस्याएं सुलझाना मुश्किल है। आइये
 *आपकी नहीं हम सबकी सहेली* से सीखें घर की समस्याएं सुलझाकर स्मार्ट ग्रहणी बनना ।

नई झाड़ू के उपर की पॉलिथीन हटाकर झाड़ू को फर्श पर रखे। मोटी पुरानी कंघी से जैसे हम बालों को सुलझाते है ठीक वैसे ही झाड़ू को सुलझाए। झाड़ू को पलट-पलट कर सभी ओर से सुलझाए। ऐसा करने से झाड़ू का पूरा भूसा निकल जाएगा।  


और अंत में में एक अनुरोध प्रिय श्वेता जी से कि
 *एक थी सोमवारी* के बाद अन्य छःवारी एवं हम इंतजार में बैठे हैं कि कब आयेगी अगली कहानी की बारी। 

वो फिर एक बार और आयी बस जाने किस संकोच में वो  नहीं आती थी। एक दिन अचानक उसी रस्ते पर मिली मैं तो पहचान नहीं पायी , वो खुश लग रही थी, आज चटख गुलाबी दुपट्टा कंधे पर डाला हुआ था उसने।आँखों में काजल की महीन रेखा , बालों को खोला हुआ था घुँघराले बालों की लट उसके होठ़ो को चूम रहे थे। हाथों की लाल हरी और सुनहरी चुडि़यों की मोहक खनक बार बार लुभा रहे थे।  मैंने कहा क्या बात है बहुत सुंदर लग रही हो तो वो खिलखिला पड़ी ।तांबई गालों पे लाली छा गयी , शरमाते हुये पैर के अँगूठे से मिट्टी कुरदने लगी फिर हँसकर भाग गयी।


--------//---------
और अब अंत में एक सच भी बता ही देती हूँ कि नकल करने की बहुत कोशिश की, पर किसी ने सच ही कहा है कि नकल के लिए भी अकल चाहिए होती है।

धन्यवाद सहित क्षमाप्रार्थी--सुधा देवरानी🙏🙏

सोमवार, 19 दिसंबर 2022

3612 / भ्रम से हमें निकलना होगा

 

नमस्कार !  देखते देखते ये साल भी बीतने जा रहा है ......... और अब सब नए वर्ष की प्रतीक्षा में   कुछ नए संकल्प ले कर प्रारम्भ करेंगे नया वर्ष ........ कौन  अपने संकल्पों पर खरा उतरेगा ये भी वक़्त ही बताएगा ......  लेकिन कुछ बातें साल दर  साल नहीं बदलतीं ....... इसी से सम्बंधित पढ़ लीजिये ये रचना .....



कमाई   नौ   दो  ग्यारह      

हो    चली,

हथेली    तप-तप    कर     

तवा        हुई। 

मुश्किल     एक      से        

सवा      हुई।

आप ही बताइए  कि  क्या आज भी यही बात नहीं है ?  छः  साल बाद भी समस्या ज्यों की त्यों है ... और न जाने कब से यही चल भी रही है .... खैर ..... मुश्किल भले ही आपको बढती हुई लगे , लेकिन सच तो ये है कि आज कल साधन ज्यादा हैं और हम इंसान उनके बन्दर बने हुए हैं ... कैसे ? ..... तो समझिये इस रचना को पढ़ कर ...

साधन बने मदारी


सोच मशीनी बनती सबकी

भावों का है सूखा

लिप्साएँ हों मन पर हावी

कैसा बनता भूखा

बंदर जैसे मानव नाचे

साधन बने मदारी।


कितनी सरलता से यह बात समझा दी गयी है कि आज मानव साधन रुपी मदारी की उँगलियों पर नाचता है ....... यदि अभी भी समझ नहीं आया तो चलिए एक और पोस्ट पढवाते हैं कि आज के युग में लोग जितना अधिक  कमा रहे हैं उतना ही  अपने बच्चों के प्रति विमुख होते जा रहे हैं .....


मॉर्निंग वॉक – बाल हठ

हाँ तो आधुनिक बच्चेचूँकि अधिक एक्स्पोसेड़ हैंउनमें जागरूकता या कहें

अंतर्जाल पर उपलब्ध ज्ञान भी अधिक है। जो बड़ों की निगरानी के अभाव में

 उन्हें अनचाहे रास्तों पर धकेल सकते हैं। कच्ची उम्र में जब उन्हें मार्गदर्शन

की ज़रूरत होती हैतब उन्हें नौकरों और आयाओं के सुपुर्द कर दिया जाता है।


इस पोस्ट का शीर्षक मॉर्निंग वॉक  क्यों रखा है ? मैंने पूछा है सरस जी से ...... जवाब मिलते ही  बताउँगी . ......मुख्य मुद्दा शीर्षक नहीं है ...... बात है कि हम बच्चों के प्रति कितने जागरूक हैं ....... अब जागरूक होने की बात करें तो ऐसा नहीं है की लोगों को अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होता ...... सब होता है लेकिन कब किस  संगत में पड़ कर  बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं और अपना ही नुकसान करते रहते हैं ...... लेकिन जानते हुए भी उनको छोड़ नहीं पाते  . बात केवल बुरी आदतों की नहीं है , बात व्यवहार की भी है ...... ज़िन्दगी की तल्खियाँ मन पर किस कदर हावी हो जाती हैं  उनको महसूस कीजिये इस कहानी में .....

मन के घेरे ( कहानी )

'ओहो! कितना प्‍यार करती हो न तुम उनसे..! न जाने मन के कि‍स कोने से एक तंज भरी आवाज आई थी।

 साथ रहते-रहते तो सभी को प्‍यार हो जाता है...क्‍या हुआ जो उनके बीच का प्रेम चुक गया। न, चुका नहीं था, सच तो यह है कि प्यार जैसा लगा था, पर प्यार था ही नहीं... प्यार न हो, न सही, मगर एक बंधन तो हैजि‍समें बंधे है दोनों। वैसे भी कि‍तने शादीशुदा जोड़े हैंजि‍नके बीच प्‍यार नदी सा बहता और सागर सा उफनता है! मगर रहते हैं न साथ...  और इस रि‍क्‍तता की भरपाई के लि‍ए ही तो सब बच्‍चे पैदा करते हैं। सहसा उसे अपने बेटे अंशु की याद हो आई।

 अंशु का चेहरा आंखों में कौंधते ही भय की एक तेज सी लहर कृतिका की रीढ़ में दौड़ गई।


 उम्मीद है  कि मन के घेरे  से निकल एक लम्बी साँस तो ज़रूर ली होगी .......  अब इस गंभीर  कथानक के बाद लग रहा  है कि कुछ मन को प्रफ्फुलित करने के लिए हल्का - फुल्का विषय लाया जाय ...........  हँसी ख़ुशी का माहौल रहे ...... तो चलिए ले आई हूँ एक बतकही ...... मजेदार कहानी ...... 


मिर्ज़ा चाचा की सवारियां


मिर्ज़ा चाचा की बाल-मिठाई की मोबाइल दुकान और उनका चलता-फिरता भोजनालय पूरे कुमाऊँ में मशहूर हो गए थे लेकिन हमारे पैदा होने से बहुत पहले ही रुस्तम के इंजिन का हार्टफ़ेल हो गया और उसे एक्टिव सर्विस से रिटायर कर दिया गया पर उसने चाचा की सेवा उसके बाद भी की.

रुस्तम को मिर्ज़ा चाचा ने सड़क के किनारे एक खाली जगह में उल्टा खड़ा कर दिया और उसे कार्पेन्टर की मदद से एक दुकान में बदल दिया. रुस्तम को एक प्रोविज़न स्टोर में बदल दिया गया है.

 इस किस्से को पढ़ते हुए मैं सोच रही थी कि लेखक की कल्पनाशीलता भी कितनी कमाल की है ....किस तरह बात से बात  निकालते  हुए कहानी  बुन डाली है ....... चलिए कल्पना को छोड़ अभी यथार्थ की बात करें ........उम्र दर उम्र बीतते हुए कितनी स्मृतियाँ  संजो ली जाती हैं  और उनको एक धरोहर की तरह ही सहेज ली जाती हैं ..... पढ़िए इस रचना में ...

बटुआ

एहसास भर से स्मृतियाँ

बोल पड़ती हैं कहतीं हैं-

तुम सँभालकर रखना इसे

अकाल के उन दिनों में भी

खनक थी इसमें!


यहाँ स्पर्श की बात हो रही है तो दूसरी ओर  न जाने क्यों मौन पसर जाता है ....  वैसे मौन मेरा प्रिय विषय है ...... यूँ ही घूमते हुए इस रचना से साक्षात्कार हो गया  और खुद ही आश्चर्य  हुआ  कि ये रचना मैं पहले भी पढ़ चुकी हूँ ....... मतलब की जब लिखी गयी थी तब ही ........ उस समय ब्लॉग जगत में सक्रीय नहीं थी फिर भी इस रचना तक  पहुँची थी ... शायद ये विषय ही मुझे  वहाँ तक ले गया होगा ........  वैसे ऐसे मौन पर यही कहना है  कि अपने भीतर के मौन को बाँट लेना चाहिए ........ 



उठो ! खोल दो मन के द्वार !
सुनो गौरैया की चहचहाहट और -
भँवरे की गुनगुनाहट में उल्लास का शंखनाद ! 
देखो बसंत आ गया है  -- - -- 
निहारो रंगों को  , महसूस करो गंध को  ,
 एक हमारी अनीता जी हैं ....... जो न जाने  क्यों  9  दिसंबर से मौन हैं ....... इनकी कोई पोस्ट नहीं आई इन दिनों .  ...... जो हर दूसरे दिन पोस्ट डालता हो तो स्वाभाविक है  उनके लिए चिंतित होना  .....  उसने पुकारा या नहीं , लेकिन हम ज़रूर पुकार रहे हैं ...... एक उनकी ही  पुरानी रचना के साथ ... 


कभी मौन हो गहन शून्य सा
विस्तृत हो फैले अम्बर सा,
वह अनन्तानन्त हृदय को
हर लेता सुंदर मंजर सा !

इस रचना में भी मौन की बात थी ....... लेकिन हर बार मौन सार्थक नहीं होता ....... कहीं न कहीं  और किसी न किसी को आगाह करना ही  होता है .....  इसी विषय पर एक खूबसूरत ग़ज़ल  पढ़िए और मनन  कीजिये ..... 




कौन यहाँ रहता है हरदम
हमको भी तो ढलना होगा

आज मिला है किस्मत से जो
मौका शायद कल ना होगा

 सच तो यही है कि हमें अपने देश की आन -  बान - शान के लिए ही जीना है तो मरना भी है ........ किसी का भी क़र्ज़ चुकाए बगैर नहीं जाना चाहिए ....... 
एक और खूबसूरत ग़ज़ल ...

 क़र्ज़ - -


हर इक को गुज़रना होता है उतार चढ़ाव के ग्राफ से,
मंज़िल नहीं आएगी  कभी ग़र अपने ही में ठहर गए,

हम यहाँ अलग अलग किस्म के क़र्ज़ की बात कर रहे हैं ........ माता - पिता का क़र्ज़ भी हमें हर हाल में चुका देना चाहिए ....... ये क़र्ज़ पैसों के रूप में नहीं चुकाया जा सकता ...... आप सब समझदार हैं तो सब अपने अपने तरीके से कोशिश कीजिये ...... जैसे इस लघुकथा में देर  से ही सही पर मन में ठान तो लिया ही न  .....

बँटवारा 


माधव की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने से पापा ने मुझे कई बार समझाया तो कई बार फटकारा भी। उनका कहना था कि बराबर नहीं तो व्यवसाय का कम से कम चालीस प्रतिशत हिस्सा तो माधव को दिया ही जाना चाहिए था। मेरी पत्नी ने मुझे स्पष्ट कह दिया था कि उनकी यह बात मुझे नहीं माननी चाहिए। पत्नी को ही क्यों दोष दूँ, मैं स्वयं भी तो उसे और अधिक देना नहीं चाहता था।

केशव तो समझ गया ........ हम सब भी इस कथा से सीख लें और इस तरह की नौबत न आने दें ....... और मन में परिवार के हर सदस्य के प्रति स्नेह बनाये रखें ...... इसके साथ ही आज की हलचल को विराम देती हूँ .... लेकिन आप सब हलचल मचाये रखियेगा ....... पाठक वृन्दों से कह रही हूँ ...... थोडा वक़्त निकाल कर प्रतिक्रियाओं से भी नवाजें ......

नमस्कार
संगीता स्वरुप




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