निवेदन।


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सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

465.........हिम्मत कर छाप

सादर अभिवादन

अभी समय किसी के पास नहीं है
सब फरमाईशें पूरी करने व करवाने में लगे हैं

आज की मेरी पसंद की रचनाएँ...

लिख देती हूँ.......प्रतिभा स्वाति
आप लिखें वेदना 
और... बिचारा पाठक 
वाह -वाह कर जाता है !
दोष उसका नहीं ,वो 
शिष्टाचार निभाता है !



दिल जो  जलेगा जिन्दगी भर
इच्छाएं रह जाएगी आँखों में
खून खोलेगा मजबूरियों पर
दर्द में होगा बदन, और 
होकर वास्तविकता से रूबरू
होगा इस सफर का अंत.



बिटिया चिंता मुक्त है, रक्षित घर की सींव
प्रहरी भी निश्चिन्त लख, नव नीड़ों की नींव

सेना के संकल्प का, बिटिया रखती मान
देते सैनिक हौसला, छुटकी भरे उड़ान 


चिरनिद्रा सी जीवन तम में,
विराज रही जाने किस भ्रम में!
इक आहट जो होश में लाये,
भयाक्रांत, व्याकुल कर जाए।  
जो क्षण सत्य का भान कराये,


हँसते हुए पति को देख नार मुस्काई
तनखा तेरी बढ़ी नहिं, मुस्कान कहाँ से आई
जा मुस्कान कहाँ से आई, पूछे नार मुंह पिचकाय
आज हंसे तो हंसे भले, आगे अब नै हंसी आए


चार साल पहले 

को
बता कर 
स्पैम
रिपोर्ट 
फटाफट
कर दी 
जायेगी
पोस्ट 
तुरन्त
डीलिट कर
सूचना 
प्रसारित
की जायेगी

आज्ञा दें यशोदा को

रविवार, 23 अक्टूबर 2016

464....कैसे नहीं हुआ जा सकता है अर्जुन बिना धनुष तीर और निशाने के

सादर अभिवादन
आज के सरदार विरम सिंह जी छुट्टी पर हैं

आज मेरी पसंद की रचनाएँ.....

काव्य....जो 2012 को बाद से बन्द है
ज़िन्दगी मुहब्बत के लिए कम है लोग नफरत में बिता देते हैं
शय ए दोस्ती को आखिर कैसे यूँ आसानी से भुला देते हैं

बहुत मुश्किल से बनती है रिश्तों में बेबाकियाँ यारों
दोस्ती को भी आजकल कितनी बेबाकी से सज़ा देते हैं



ये ज़िंदगी तो है रहमत........राहत इंदौरी
हरेक चहरे को ज़ख़्मों का आइना न कहो
ये ज़िंदगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो

न जाने कौन सी मजबूरियों का क़ैदी हो
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो

हारती रही हर युग में सीता...साधना वैद
राम जानकी
सतयुगी आदर्श
आज भी पूज्य

न पाया सुख
सम्पूर्ण जीवन में
राजा राम न


एक चिड़िया मरी पड़ी थी...एम.वर्मा
बलखाती थी
वह हर सुबह
धूप से बतियाती थी
फिर कुमुदिनी-सी
खिल जाती थी


परिंदों का जहाँ शोर हुआ करता था.....मालती मिश्रा
अशांत और भागदौड़ भरा जीवन है नगरों का,
पहले हँसता-मुस्कुराता शांत गाँव हुआ करता था।
मुर्गे की बाँग और कोकिल के मधुर गीत संग,
सूर्योदय के स्वागत में चहल-पहल हुआ करता था।



मन साफ करे........कंचन प्रिया
करते हैं लोग साफ रेत-ईंटों की मकाँ
रखते   हैं  गंदगी  अंदर   संभाल  के

जला आतें रावण  बुराईयों  के  नाम
ले आते हैं  बुराईयाँ  दिल में डाल के


आज का ताजा शीर्षक..
जरूरी है बस 
मछली की आँख 
का सोच में होना 
खड़े खड़े रह गये 
एक जगह पर 
शेखचिल्ली की 
समझ में समय 
तब आता है जब 
बगल से निकल 
कर चला गया 
कोई धीरे धीरे 
अर्जुन हो गया है

आज्ञा दे
यशोदा
कल फिर मिलेंगे

जाते-जाते थोड़ा हँस लीजिए..

Charlie Chaplin - The Lion's Cage








शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

463 ... कठपुतली






सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष



डुग्गी
दोरंगी
चिर-संगी
माया बानगी
लोक-कथा जंगी
कठपुतली अंगी
<><><>
चै
कश्ती
अबाती
कुर्रा-ए-गीती
पुत्तलिकाओं
हत्थे खुराफाती
अय्यार पटाक्षेप



मेरे अंतर की कालिमा की
परवाह किसी को ना होती
चाहे अंतर से मैं खोखला
या कोई पत्थर होता
मेरे चेहरे की रोनक पर
हर कोई दिल फेक होता




काश! वो जान पाता कि 
समय मिलता नहीं, 
निकालना पड़ता है.
काश! इन्तजार की बजाय 
उसने संतुलन के 
महत्व को समझा होता.






कभी करुण कभी रौद्र कभी श्रृंगार रस में नहाई हूँ
      कभी चढ़ती ख़ुशी की धूप कभी सुलगती गम की धूप 
      हर हाल में मुस्काई हूँ !
      जो किरदार दिया प्रभु ने उसे निभाने आई हूँ !




एक दूसरे से जुड़ने के लिये
कुछ धागे हैं 
आप मुखौटा हटाइये 
धागा टूट जाएगा 
ये कठपुतली का खेल है 
थोड़े वक़्त बाद 
खेल खत्म होता है




बेजान कठपुतलियां
फिर टंग जाती हैं
बरसों पुरानी खूंटी से
बार बार छली जाती हैं
मालूम होते हुए भी 
उनके प्राण किसी 





और जीने की उम्मीद  फिर से जगाती है....
 जब राह तकते हैं खुशियों की
वह आंसू की बारात लेकर आती है ...!!!!
ना जाने किस खुशफहमी में जीते रहते हैं ???
कहते रहते हैं .....
हम जो चाहे कर सकते हैं





वे, जिनके अंदर कोई कहानी नहीं पलती
कठपुतली बन जाते हैं!


फिर मिलेंगे .... तब तक के लिए

आखरी सलाम


विभा रानी श्रीवास्तव

चलते-चलते एक गीत तो बनता ही है






शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

462.....बाअदब बामुलाहिजा होशियार सब्र कर जल्दी ही आ रहे हैं ठेकेदार

सादर अभिवादन स्वीकार करें
आज परेशान सी हूँ
मेरे घर से कुछ घर पश्चात
अखण्ड रामायण का आयोजन है
कोलाहल तो नहीं कह सकते
पर हाँ कानों को विचलित अवश्य कर रहे हैं
खैर चौबीस घण्टे में शान्ति मिल जाएगी...

चलिए चलते हैं आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर....

मैं संग्रहित करता रहा 
जीवन पर्यन्त 
द्रव्य रिश्ते नाते 
तेरे मेरे 
सम्बन्ध अनगिनत 
नहीं एकत्रित करने का - 
ध्यान गया



बहकर भावों की धारा में,
कवि बैरागी नहीं बनना
चाहत को क्यों लिखना,
देवदास ही क्यों बनना
अब प्यार नहीं करना ।


एकांत में एकदम चुप
कँपते ठंडे पड़े हाथों को
आपस की रगड़ से गरम करती
वो शांत है
ना भूख है
ना प्यास है
बस बैठी है
उड़ते पंछीयों को देखती


नया सूरज निकाला जा रहा है
दिए में तेल डाला जा रहा है

हमीं बुनियाद का पत्थर हैं 
लेकिन हमें घर से निकाला जा रहा है 



तुम्हारा ख़याल...........प्रतिभा कटियार
तुम्हारा ख़याल
कोयल को कर देता है बावला
और वो बेमौसम गुंजाने
लगती है आकाश
टेरती ही जाती है
कुहू कुहू कुहू कुहू


कारगर है डेंगू का एलोपैथिक के साथ आयुर्वेदिक उपाय....कविता रावत
 डेंगू का आयुर्वेदिक उपचार के तहत् पहले कब्जी दूर करने के लिए हरड़े का चूर्ण एक चम्मच रात को गर्म पानी में लेने और मुनक्का भिगोकर खाने को दिया जाता है। शरीर में बाहरी त्वचा पर कर्पूर, पानी में मिलाकर लगाने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही तुलसी के पांच पत्ते, नीम के पांच पत्ते पीसकर उसकी तीन गोली बनाकर एक-एक गोली दिन में तीन बार लगातार 5 दिन तक पानी से लेने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही हल्दी आधा चम्मच, दो काली मिर्च, तुलसी के दो पत्तों को 250 ग्राम पानी में उबालकर आधा पानी शेष रहने पर नींबू के रस या चीनी के साथ मिलाकर पीने, बिना दूध की नींबू की चाय पीने, एक कप गर्म दूध में हल्दी दो ग्राम, तुलसी के तीन पत्ते पीसकर मिलाकर दिन में दो बार लेने से लाभ होता है।
          इसके अतिरिक्त तुलसी के पत्तों का रस पाव चम्मच, शहद पाव चम्मच, एक चुटकी सौंठ के मिश्रण को दिन में तीन बार लेने, नींम की सात कोंपल, पांच काली मिर्च पीसकर दो चम्मच पानी में मिलाकर दिन में तीन बार लेने और सौंठ, काली मिर्च, पीपल, अजवायन, तुलसी के पत्ते, नीम के तीन-तीन पत्तों को लेकर उन्हें पीसकर दो चम्मच पानी में मिलाते हुए थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर तीन बार लेने से विशेष लाभ होता है।




ये है आज का शीर्षक..जो आज भी ज्वलन्त है
पुरानी बकवास नया लिबास
कोई किसी
से नहीं
डर रहा है
किसी को
ऐ कम्पनी
का भरोसा है
कोई डी
कम्पनी तक
सीधे अपनी
भी पहुंच
बता रहे हैं

.....
आज यहीं तक
सादर
यशोदा

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

461....करवा चौथ बनाम सुखी गृहस्थी


जय मां हाटेशवरी...

कुछ दिन पहले दशहरा बीता है...
और  कल करवा चौथ  था...
मैंने अनुभव किया है कि...
कुछ समय से...
हमारी प्राचीन परम्पराओं व पर्व त्योहारों का...
सोशल साइटों पर मजाक बनाया जा रहा है...
जो किसी भी तरह उचित नहीं है...
प्रत्येक पर्व,  त्योहार का अपना महत्व है...
कुछ लोग, मैं जिन्हे अक्सर मूर्ख कहता हूं...
किसी विशेष धर्म या जाति  को बदनाम करने के उदेश्य से...
इस प्रकार का भ्रामक प्रचार करते हैं...
ये घोर  मजाक हैं...
ये किसी की भावनाओं को आहत कर रहे  हैं...
मैने विजय शंकर महता द्वारा रचित एक लेख पढ़ा था...
जिसे कुछ अंश...
जितने उत्सव और त्योहार हमारे देश में मनाए जाते हैं संभवत: किसी मुल्क में नहीं मनाए जाते। हमारे पूर्वज कुछ काम ऐसे कर गए हैं, जो हमारे डीएनए में उत्सव और त्योहार बनकर बह रहे हैं। हमें समझना चाहिए कि ये केवल हुड़दंग नहीं है। त्योहार हमें आपस में जोड़ते हैं और विश्राम के लिए पड़ाव देते हैं। आज व्यावसायिक जगत में इतनी चुनौतियां व प्रतिस्पर्द्धा हो गई है कि यदि शीर्ष पर पहुंचकर थक गए तो आप सफलता की दुनिया में भूतपूर्व ही नहीं, स्वर्गीय हो जाएंगे। कुछ लोगों के मन में तो यह बात बैठ गई है कि आगे बढ़ना है तो दूसरे को पीछे नहीं छोड़ना, उसे समाप्त ही कर देना है। ऐसे प्रतिस्पर्द्धी माहौल में त्योहार विराम देते हैं, शांति
देते हैं। रचनात्मक सोचने का मौका और दूसरों के साथ खिलवाड़ न करने का संदेश देते हैं। खासतौर पर यह संदेश देते हैं कि जो भी करें, पूरी तरह डूबकर करें।

कोई करवा चौथ   को महिलाओं का ठौंग...
कोई महिलाओं का शोषण कह रहे हैं...
मैं तो करवा चौथ   को...
आज के समय की आवश्यक्ता मानता हूं...
क्योंकि परिवार टूट रहे हैं...
महिलाओं का घरों में शोषण हो रहा है....
तलाक के मामले अदालतों में बढ़ रहे हैं...
यही एक पर्व है...
जो घरेलु हिंसा या तलाक जैसे सामाजिक ग्रहण को...
चांद के दिदार  से मिटाने का प्रयास  कर रहा है...
केवल आवश्यक्ता है...
इस पर्व के महत्व को समझने की...
हमारे प्राचीन प्रत्येक पर्व व  त्योहार में अपनी विधि व परंपरा के साथ समाज, देश व राष्ट्र के लिए कोई न कोई विशेष संदेश निहित  है...
मेरा एक और सवाल है कि सारी रोक टोक हिंदू त्योहारो के लिये ही क्यों?होली पर हुड़दंग के नाम पर दोपहर बाद रंग खेलने पर पाबंदी लगा रहे हैं?तो तमाम विरोध और
तमाशे के बावजूद वैलेंटाईन डे मनाने के लिये पुलिस सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं?दिवाली पर रात दस बज़े के पटाखे फ़ोड़ो तो ज़ेल जाने की धमकी मिलती है तो न्यू ईयर
पर तो पटाखे फ़ूटना ही आधी रात के बाद शुरू होते हैं?क्या तब प्रदुषण नही होता?जल संकट से बचने के लिये एक दिन का अभियान नही उसके असमान वितरण और उसके असामान्य
दोहन पर भी रोक लगाने पर विचार करना होगा,न कि त्योहारो से छेडछाड करने की ज़रुरत है।


मैंने  तो माननीय मोदी जी की तरह...
अपने मन की बात कह दी...
अब बारी है आप की...
पढ़ते हैं...आप के मन की बात भी...

 करवा चौथ बनाम सुखी गृहस्थी
बच्चों की शिक्षा एवं संस्कार सर्वोपरि हैं। बच्चों की शिक्षा संस्कारित तरीके से हो इसके लिए त्याग और समर्पण जरूरी है वर्ना दहन और सम्मान दोनों का कोई मतलब नहीं बचता है।
और अंत में एक दूसरे का विश्वास ,प्रोत्साहन ओर छोटे छोटे त्याग और समर्पण मन में साहस एवं उत्साह भर देतें हैं। क्यों न इस करवा चौथ को अपनी गृहस्थी सँभालने के संकल्प लें।

हर लम्हा खुश होना पड़ेगा............डॉ. फ़रियाद "आज़र"
वो शायद ख़्वाब में दोबारा आये
मुझे इक बार फिर सोना पड़ेगा
निखर जायेगी फिर सूरत तुम्हारी
मगर अश्कों से मुँह धोना पड़ेगा

क्यों ....... सुनो .......
जानती हूँ  .... ये सफर जीवन का
इतना सहज भी नही  ..... 
इसीलिए तो साथ हमारा प्यार है
कहीं किसी राह में लगी ठोकर
लड़खड़ाते कदम भी संभल जाएंगे
थामे एक दूजे के हाथ
शून्य से क्षितिज पर आ ही जाएंगे  ..... निवेदिता

अंग्रेजी के सामने हिन्दी: रावण रथी विरथ रघुवीरा
आजादी के बाद, देश में दो बड़ी समस्याओं, कश्मीर और राजभाषा को दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से हल किया जाना था। हमने सकुचाते हुए और डर से हल करना चाहा। पाकिस्तान ने कश्मीर पर कबाइली हमला किया। हमले को नाकाम करती हमारी सेना पूरा कश्मीर खाली करवा पाती इसके पहले ही हमने संघर्ष विराम कर लिया। संविधान ने हिन्दी को राजभाषा घोषित तो 14 सितम्बर 1949 को कर दिया था, लेकिन प्रावधान करवाया गया कि यह घोषणा 15 साल बाद लागू होगी। तब तक हिन्दी सक्षम हो जाएगी। 1967 में फिर प्रावधान
करवाया गया कि अंग्रेजी अनिश्चित काल तक बनी रहेगी। हिन्दी की सक्षमता कौन,  कब और कैसे नापेगा, इस बार मेें कुछ भी नहीं बताया गया। लीपापोती ने कश्मीर व राजभाषा दोनों समस्याओं को नासूर बना दिया। कश्मीर की समस्या सतह पर है। बाह्य है। दिखती है। राजभाषा की समस्या अन्दर की है। दिखती नहीं है। देश की 95 प्रतिशत से अधिक आबादी की मौलिक प्रतिभा अंग्रेजी के कारण ही दीन व गूँगी बनी रहने को अभिशप्त है। नासूर को चीरा लगाना पड़ता है, पर यह काम काँपते हाथों से न हुआ है और न होगा। 14 सितम्बर 1949 को जैसे ही संविधान में हिन्दी को राजभाषा स्वीकार किया गया देश की बहुत बड़ी आबादी जश्न में डूब गई। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने प्रसन्न भाव से टिप्पणी की - ’हमने जो किया है, उससे ज्यादा अक्लमन्दी का फैसला हो ही नहीं सकता था।’ जश्न मनाते लोग यह समझ बैठे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा
घोषित किया गया है। राष्ट्रभाषा (नेशनल लैंग्वेज) और राजभाषा (ऑफिशियल लैंग्वेज) के अन्तर पर उनका ध्यान ही नहीं गया। सम्विधान सभा ने जब यह प्रावधान किया कि अभी 15 साल तक अंग्रेजी ही राजभाषा यानी सरकारी कामकाज की भाषा बनी रहेगी ताकि हिन्दी को समर्थ होने का वक्त मिल जाए
तब इसके निहितार्थ और फलितार्थ का अन्दाजा भी सदस्यों को नहीं हुआ। इसे उन्होंने  स्वीकार कर लिया। भाषा उपयोग से समर्थ बनती हैै। पैरों को भी चलाया न जाए तो वे कमजोर हो जाते हैं। वाहन भी चलाने से ही तो वाहन चलाना आता है। लम्बे समय तक उसे चलाएँगे नहीं तो हमारा, चलाने का सामर्थ्य भी कम होता जाएगा और वाहन को भी जंग लग जाएगी। सत्ता के सिंहासन पर बैठा दी गई अंग्रेजी जहाँ ताकतवर होती गई, वहीं हिन्दी को कमजोर होते जाना पड़ा। फिलवक्त, अंग्रेजी के सामने हिन्दी 'रावण रथी विरथ रघुवीरा' की तरह है।
80 प्रतिशत जानकारी अंग्रेजी और रोमन में उपलब्ध होती थी। अब वह प्रतिशत 40 से भी कम है। देवनागरी में टंकण की कई समस्याओं को कम्पनियाँ तेजी से सुलझाती जा रही हैं। देवनागरी फोण्ट्स पर लाखों लोगों के हाथ तेज गति से दौड़ रहे हैं। माइक्रोसोफ्ट कम्पनी ने माना है कि भारतीय व्यापार का 95 प्रतिशत अब भी भारतीय भाषाओं और भारतीय लिपियों में हो रहा है। स्पष्ट है कि अंग्रेजी और रोमन लिपि के वर्चस्व की सम्भावनाएँ सिकु़ड़ रही हैं। हिन्दी के सन्दर्भ में निराशा धीरे-धीरे छँट रही है। हम जानते हैं कि अन्ततः राम की ही विजय हुई थी।

दिल को छू जाने वाली कहानी
तीन चार महीने गुजर गए थे मैं कैंटीन की तरफ से गुजरी वहां अपनी बोतल में पानी भर रही थी मैंने अजय को देखा आवाज लगाई । वह कुछ नही बोला, मैंने कहा क्या हुआ अजय तुम आज कुछ नही बोले तबियत वगैरह ठीक है, लेकिन उसने कुछ जवाब नही दिया । मुझे क्लास के लिए देरी हो रही थी और एग्जाम की वजह से कॉलेज बन्द भी होने वाला था तो मैंने बैग से 100 रुपये निकाले और उसे देने लगी, लेकिन अजय ने वो रुपये
नही लिए और रोने लगा बोला दीदी अब कोई जरूरत नही क्योँकि पूरे महीने के पैसे बच जाते मेरी मम्मी मर गयी मैं बिलकुल अकेला हो गया। अब कोई जरूरत नही। उसको रोता देख मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने अजय से कुछ भी नही पूछा और वापस क्लास चली आई। मेरा कॉलेज भी छूट गया, लेकिन आज भी जब अजय के बारे में सोचती हूँ तो बहुत तकलीफ होती है । एक सवाल बार बार आता है मेरे जहन में की पता नही अब वो कैसा होगा?

खाली काग़ज़
और फिर.....
शाम की हथेली पर
बस खाली काग़ज़ रख दिया
....................
क्या वो नज़र
पढ़ पाएगी ये अफ़साना ?
साहब ने की बागबानी

आज बस इतना ही...
कहते हैं न...
थोड़े में...
आनंद अधिक होता है...
धन्यवाद।









बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

460..राम ही राम हैं चारों ओर हैं बहुत आम हैं रावण को फिर किसलिये किस बात पर जलाया

सादर अभिवादन
हड़ताल खतम हो गई नेट की
कल भाई कुलदीप जी आएँगे

आज की मेरी पसंदीदा  रचनाएं......


जहाँ भी उम्मीद की छाया दिखती है
साँकल खटखटा ही देती हूँ
सोचती हूँ एक बार
खटखटाऊँ या नहीं
लेकिन अब पहले जैसी दुविधा देर तक नहीं होती
उम्र की बात है - !


बहुत सहन कर चुकी
अब मत बांधो मुझे
मत करो मजबूर
इतना कि तोड़ दूँ
सब बंधन
मत कहना फिर तुम
विद्रोही हूँ मै



तुम बाग़ लगाओ, तितलियाँ आएँगी
उजड़े गाँव नई बस्तियाँ आएँगी

जिन चेहरों सूखा, आँख में सन्नाटा
बादल बरसेंगे, बिजलियाँ आएँगी


ऐसे बेहोशी में बीत रहे हैं. आज दूध देर से आया था, दोपहर को गैस पर रख कर भूल गयी. जून को लंच के बाद बाहर तक छोड़कर आई तो दूध चूल्हे से उतारने के बजाय कम्प्यूटर के सामने बैठ गयी और पतीला बुरी तरह से जल गया. देखें कितना साफ होता है, 


युद्ध से नहीं बचायी जा सकती है दुनिया
युद्ध से बचाया जा सकता है हथियार
युद्ध से बचाया जा सकता है अधर्म
युद्ध से बचाया जा सकता है अन्धापन

उल्लूक टाईम्स का विलंम्बित समाचार
आज तक किसी चर्चाकार की निगाह नही पड़ी

सामने खड़ी सारी 
जनता से उनकी 
खुद की 
रिश्तेदारी मिली 
और रावण बेचारा
सोच में पड़े 
खड़ा रह पड़ा 
किसलिये और 
किस मुहूर्त में 
राम के साथ 
रामराज्य की ओर 
ऊपर से नीचे 
एक बार और 
अपनी जलालत 
देखने निकल पड़ा ? 
........
आज्ञा दें यशोदा को
फिर मुलाकात होगी
सादर




मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

459.....नहीं चलती है तो फौज लगा कर चला दी जाती हैं

सादर अभिवादन
आज भाई कुलदीप जी का नेट हड़ताल पर है
पर पाँच लिंकों का आनन्द में कभी हड़ताल
की गुंजाईश ही नही..
आज देखिए मेरा पसंद की रचनाएँ.....

पहली बार आ रही हैं बहन सविता मिश्रा जी
भोर सी मुस्कराती हुई भाभी साज सृंगार से पूर्ण अपने कमरे से निकली|
"अहा भाभी आज तो आप नयी नवेली दुल्हन सी लग रहीं हैं| कौन कहेगा शादी को आठ साल हो गए|" ननद ने अपनी भाभी को छेड़ा|
"हां, आठ साल हो गए पर खानदान का वारिस अब तक न जन सकी|" सास मुहँ बिचकाते हुए बोली|
"क्या माँ आप भाभी को ही ऐसे क्यों कोसती रहतीं हैं!!" 

एक अरसा हुआ तुमको सोचे हुए 
ज़िन्दगी अनकही सी कहानी बनी 
जो रखा हाथ अपनी तन्हाई पर 
दिल की गहराइयाँ पानी पानी बनी !! 



सफर में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो 



कब और कैसे 
तुमसे जुड़ गई 
मैं खुद नहीं जानती 
बस ! इतना जानती हूँ 
मेरी ज़िन्दगी तुमसे है 
मेरी बंदगी तुमसे है ...




ये आज की शीर्षक कड़ी.....
ही जमा होती हैं 
जैसी जगह मिले 
उसी की जैसी 
हो लेती हैं 
सामंजस्य हो 
बात का बात के साथ 
जरूरी नहीं होता है 
कुछ बातें खुद ही 
तरतीब से लग जाती हैं 
...........
एक आवश्यक सूचना...
हम आप सबको सहर्ष सूचित कर रहे हैं कि 
पुस्तक बाज़ार.कॉम अब पुस्तकों को बेचने के लिए तैयार है। 
एंड्रॉयड उपकरणों (फ़ोन, टैबलेट इत्यादि) की ऐप तैयार है जो कि पुस्तक बाज़ार के होम पेज पर दिये गूगल प्ले के लिंक से 
डाउनलोड की जा सकती है।
            सभी लेखकों के एकाउंट रिसेट हो चुके हैं और अब से उसमें दिख रही राशि ई-पुस्तकों की वास्तविक बिक्री की होगी। 
             पुस्तक बाज़ार.कॉम के प्रचार-प्रसार में आपके सक्रिय सहयोग की आवश्यकता रहेगी इसलिए अनुरोध है कि आप इसके लिंक को 
अपनी ई-मेल, फ़ेसबुक, ट्वीटर इत्यादि से वितरित करें। 
पुस्तक बाज़ार.कॉम का लिंक है:
http://pustakbazaar.com/
सादर -

सुमन कुमार घई (साहित्यकुंज)


इसी के साथ
इज़ाज़त दीजिए दिग्विजय को
फिर मिलेंगे

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