निवेदन।


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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

160......क्रिसमस की शुभकामनाएँ

बड़ा दिन
यानि क्रिसमस
साल के अंत में
मनाया जानेवाला
एक बड़ा पर्व
इसे सभी वर्ग के लोग
धूम-धाम से मनाते हैं
कहते हैं रात में


बाबा सान्ता क्लाज़ आते हैं
और बच्चों के मोजों में
उपहार भर देते हैं

क्रिसमस पर रचनाएं तो नहीं है
पर चित्र जरूर दे रही हूँ



छान्दसिक अनुगायन में
नया साल आया है  
इसको गले लगाना है | 
इसकी आँखों में कुछ  
सपना नया सजाना है |



आहुति में
क्यूँ ना मैं... 
इक किताब बन जाऊं, 
तुम अपने हाथों में थामो मुझे, 
अपनी उंगलियों से... 
मेरे शब्दों को छू कर, 
मुझे अपने जहन में....
शामिल कर लो..


जिन्दगी की राहें में
बहुतों बार उस कुत्तें ने अपने
गरीब मालिक में भरी थी गर्मी
उस ठन्डे जाड़े की रात में चिपक कर स्पर्श से
बताया था उसने अपने मालिक को हाँ, मैं हूँ तुम्हारा अभिन्न !!




पिताजी में
शील से कोई सरोकार नहीं पुलिस का 
पुलिस चाहे दिल्‍ली की हो 
मुंबई की 
चैन्‍ने की 
कोलकाटा की 
पुणे की 
आंध्र प्रदेश की
या किसी भी  शहर की
अथवा गांव की 
क्रूर ही होती है 



गुज़ारिश में
आज फिर 
दर्द हल्का है 
साँसें भारी हैं 
दिल अजीब सी कशमकश में है 
कोई गाड़ी छूट रही हो जैसे...


ये रख दी मैंनें आज की अंतिम कड़ी
थोड़ी सी मुस्कुराहट  लाइए चेहरे पर
और पूरी रचना पढ़िये


नीत-नीत में
लड़का जब " आवारा गेंद" 
हो जाए तो 
वो मोटरसाइकिल उठाए फिरता है,
और कोई प्रधानमंत्री जब 
" आवारा गेंद" 
हो जाए तो 
वह हवाई जहाज उठाए फिरता है.....

इज़ाज़त दें..
यशोदा..
रचना तो कोई नहीं 

ये गीत सुनिए क्रिसमस पर
गुजरात से आयातित..



















गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

मेरा पता है कि लापता हूँ मैं ..............159

आप सभी को संजय भास्कर का नमस्कार
 पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग में आप सभी का हार्दिक स्वागत है  !!


मेरा पता है कि लापता हूँ मैं..
कभी होता, उसके खर्राटों से वह ख़ुद जग जाता।
जग जाता के साथ लेटे सब न जग जाएँ।
सबके सोते रहने पर वह उठता। उठकर बैठ जाता। बैठना, थोड़ी रौशनी के साथ होता।
करनी चापरकरन पर  शचीन्द्र आर्य

पैसे के पीछे कभी तो दौड़ना छोड़िये
हालाँकि आजकल मनुष्य की औसत आयु ( लाइफ एक्सपेक्टेंसी एट बर्थ ) लगभग ७० वर्ष है ,
लेकिन मनुष्य की जिंदगी कब गुजर जाती है ,
पता ही नहीं चलता।
अंतर्मंथन पर  डॉ टी एस दराल

मेरे गाँव के कुत्ते
मेरे गाँव के कुत्ते
मान लो, उन्हें मिल जाए ऐसा कुछ मौका
कि, शहर  का देशाटन करने पहुंचे वो
मानो न, तो होगा क्या ?
सबसे पहले तो होगा नाम परिवर्तन
जिंदगी के राहें पर मुकेश कुमार 

तुम्हारे प्रेम के नशें में भी स्थिर हूँ
देर रात
मैं जब भी लिखता हूँ
कोई प्रेम कविता
लोग सोचते हैं
मैं नशें में होता हूँ
सुनो दोस्त,
लोग सही सोचते हैं
मेरी संवेदना पर नित्यानंद गायन 

कविताये कुछ नही कहती.
कभी-कभी कुछ कविताये,
कुछ नही कहती है...
ख़ामोश चुप सी बेतरतीब,
बिखरी सी रहती है...
कुछ कविताये कभी,
कुछ नही कहती है..
कभी-कभी कुछ कविताये,
'आहुति' पर शुष्मा वर्मा 

और अंत में मेरी एक पुरानी रचना माँ तुम्हारे लिए हर पंक्ति छोटी है

मेरी प्यारी माँ
तुम्हारे बारे में क्या लिखू
तुम मेरा सर्वत्र हो
मेरी दुनिया हो
तुम्हारे लिए हर पंक्ति छोटी है !
हर स्पर्श बहुत छोटा है
सारी दुनिया न्योछावर कर दू
शब्दों की मुस्कुराहट पर संजय भास्कर 


इसके साथ ही मुझे इजाजत दीजिए ...... अगले गुरुवार फिर मिलेंगे 

-- संजय भास्कर 


बुधवार, 23 दिसंबर 2015

158...दुनिया और ब्रह्मांड की बात क्या करना, इस छोटे से नक्शे में भी उसका नामो निशान नहीं है।

जय मां हाटेशवरी...

बहुत पुरानी बात है। किसी शहर में एक बड़ा धनी सेठ रहता था। वह सेठ दिल का उदार था और परोपकार में भी आगे रहता था। जो भी संत उस शहर में आता, उनका वह जी भर सत्कार करता। इसके चलते उस शहर में ही नहीं, दूर-दूर तक सेठ के दान-पुण्य के कार्यों की चर्चा रहती थी। इन सबकी वजह से सेठ के मन में अहंकार आने लगा था। वह दान-पुण्य तो करता ही रहा, लेकिन धीरे-धीरे अपने सद्गुणों को लेकर अपनी श्रेष्ठता का भाव उसके अंदर बैठता चला गया।

कुछ समय बाद एक बड़े संत उस शहर में आए। सेठ को जब इसका पता चला तो वह संत के पास पहुंच गया। उसने संत से कहा, 'हमारा सौभाग्य है कि आप हमारे शहर आए। आप मेरे घर को भी अपनी चरण धूलि से पवित्र कर दें तो मैं कृतार्थ हो जाऊंगा।' यह कहकर वह संत को अपना भव्य बंगला दिखाने ले आया। संत अलमस्त थे, पर सेठ अपने बड़प्पन की डीगें हांकने में व्यस्त था। संत को उसकी हर बात में अहम नजर आ रहा था।

आखिर संत ने उसकी मैं-मैं की महामारी मिटाने के उद्देश्य से दीवार पर टंगे मानचित्र को दिखाते हुए पूछा, 'इसमें तुम्हारा शहर कौन सा है' सेठ ने मानचित्र पर एक बिंदु पर उंगली टिकाई। संत ने हैरान मुद्रा में पूछा, 'इतने बड़े मानचित्र पर तुम्हारा शहर बस इतना सा ही है। क्या तुम इस नक्शे में अपना बंगला बता सकते हो।' उसने जबाव दिया, 'इतने बड़े नक्शे में भला मेरा बंगला कहां दिखेगा महाराज। वह तो ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है।' संत ने पूछा, 'तो फिर इतना अभिमान किस बात का।'

शर्मिंदगी के मारे सेठ का सिर झुक गया। वह समझ गया कि दुनिया और ब्रह्मांड की बात क्या करना, इस छोटे से नक्शे में भी उसका नामो निशान नहीं है। अपनी मूर्खता में वह बेवजह ही स्वयं को अति महत्वपूर्ण मान रहा था।
संकलन: सुभाष बुड़ावनवाला

अब चलते हैं...आज की हलचल की ओर...

अश्क आँखों में सदा सबसे छुपाना
क्या खरी ही तुम सदा कहते रहे हो
मिर्च तुमको इसलिए कहता जमाना
वे चुरा लेते हमेशा भाव मेरे
है नहीं आसान अब इसको पचाना
तुम हँसो तो साथ में हँसता जमाना...ऋता शेखर मधु





यहाँ हर रिश्ता जायज  है, रिश्ते को नाम न दो।  लोग खुलकर बोल रहे हैं।  खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हैं।  भावनाओं की चाँदी है और कामनाओं
की भी।  प्रीत के तार ऐसे जुड़ें हैं कि टूटने का नाम ही नहीं लेते हैं. नैन मटक्का अब चैन मटक्का बनता जा रहा है, कुछ नए रिश्ते गुदगुदा रहें है, कुछ प्रीत
की डोर से बँधने के लिए तैयार बैठें हैं।  कुछ रिश्तें सेलिब्रिटी बनकर अपने जलवे दिखा रहें है.  चैन लूटकर ले गया बैचेन कर गया  ........ यहाँ हर आदमी बैचेन
हैं।  कोई कुछ पाने के लिए कोई कुछ खोने को।
चैन लूटकर ले गया। .......shashi purwar


ऐसी भी अन्जान नहीं मैं अब सजना
बिन देखे मुझको दिखता है सब सजना
अच्छा--तो वो क्या है
वो सागर है---उस सागर में
इक नैया है--अरे तूने कैसे जान लिया
मन की आँखों से नाम लिया
वो क्या है....
कवर प्रस्तुति -गायक --सफीर और अल्पना
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सुनो ,माँ का पत्र आया है .बच्चों सहित घर बुलाया है ---कुछ दिनों के लिए घर हो आते है .बच्चों की
छुट्टियां भी है .”पति ने कहा .
“मैं नहीं जाऊँगी उस नरक में सड़ने के लिए .फिर तुम्हारा गाँव तो गन्दा है ही ,तुम्हारे गाँव के और घर
आग्रह...भगीरथ



दो दिन बाद क्रिसमस  आने वाला है...
इस लिये  अब अंत में....
क्रिसमस स्पेशल केक बनाने की विधि - Christmas Special Cake Hindi Recipe
अगर केक पूरी तरह से बेक हो गया है, तो उसे खुले में रख दें और ठंडा हो जाने दें। ठंडा होने पर केक में चाकू की सहायता से कुछ छेद करें और उनमें ब्रैंडी भर
दें। उसके बाद केक को प्लेट में निकाल लें। उसके बाद केक पर मेवे लगाकर ऊपर से आइसिंग शुगर छिड़कें। फिर चाकू की सहायता से चारों ओर खुबानी/ऐपल जैम लगाएं। उसके
बाद मार्जपेन की कोटिंग करें और ऊपर से नींबू का रस छिड़क दें।
अब आपका क्रिसमस केक तैयार है। इसे चाकू की सहायता से छोटे-छोटे पीस में काटें और सर्व करें।

आज्ञा दें
फिर मिलते हैं
कुलदीप सिंह ठाकुर

   

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

157....इन्द्रधनुष तुझसे बढ़कर रंगीन नहीं होगा

सादर अभिवादन स्वीकार करें
अभी सारा जग
आगत-विगत के
स्वागत और विदाई मे जुटा है
नया नहीं है यह
साल दर साल यही होता है

चलिए चलते हैं आज की प्रस्तुति की ओर...


क्यारी में खिलें फूल  
तो खेतों में फसल हो , 
सागर से जो निकले तो  
हो अमृत न गरल हो , 
चिड़ियों की चहक  
फूलों की खुश्बू को बचाएं |


आकर्षण तुझसा चुम्बक में भी न कहीं होगा ॥
सौन्दर्य तेरे आगे आसीन नहीं होगा ॥
आँखों को भाने वाले इतने रँग हैं तुझमें 
इन्द्रधनुष तुझसे बढ़कर रंगीन नहीं होगा ॥


जब जरा मन उदास हुआ 
इक प्यार भरी 
थपकी सी लगा देती है 
माँ की याद !!


उलूक टाईम्स में
बिना डाक्टर को 
कुछ भी बताये 
कुछ भी दिखाये 
बिना दवाई खाये 
बने रहना पागल 
सीख लेने के बाद 
फिर कहाँ कुछ 
किसी के लिये बचता है 


मन का मंथन में
जो वतन को बांट रहे हैंं,
लोकतंत्र की जड़े काट रहे हैं,
कह दो उनसे
दिन नहीं अब उनके,
अब दल तंत्र नहीं
जनतंत्र ही होगा,


किताबों की दुनिया में
नहीं चुनी मैंने वो ज़मीन जो वतन ठहरी 
नहीं चुना मैंने वो घर जो खानदान बना 
नहीं चुना मैंने वो मजहब जो मुझे बख्शा गया 
नहीं चुनी मैंने वो ज़बान जिसमें माँ ने बोलना सिखाया 


और ये है आज की अंतिम कड़ी..

तुम्हारा देव में
पिछले दो घंटों से
ख़त लिखने की कोशिश में
कई कागज़ बेकार कर दिये।
लेकिन तब भी
चार पंक्तियाँ हाथ न लग सकीं।

आज्ञा दीजिए
फिर मिलेंगे
यशोदा
















156..........आखिर चाहते क्या हो?

सादर अभिवादन स्वीकारें
आज मन नहीं था
कुछ भी लिखने पढ़ने का पर..
कर्म-काण्ड में फंसी यशोदा
करे  भी  तो क्या करे..मन व्यथित है..


अपने न्यायालय का नियम भी 
विचित्र है कहता है 
कि दस दोषी भले ही छूट जाए पर.. 
एक निर्दोष को 
सजा नही होनी चाहिए
और आज एक दोषी और रिहा होगा

.....ये तो पुरातन काल से होता चला आ रहा है

चलिए चलें वर्तमान में.....

देहभान में प्राण तिरोहित,
अन्तर आत्मा दुखी बेचारी ।
प्रेम भक्ति की सुधा चखा दो,
राधा माधव, कृष्ण मुरारी ।।


तुमने मुझसे 
वो हर छोटी-छोटी बात 
वो हर चाहत कही 
जो तुम चाहती थी 
कि तुम करो 
कि तुम जी सको 
पर शायद तुमको 
कहीं ना कहीं पता था 


एक बच्ची का बचना
एक बच्ची का मरना
एक बच्ची का गिरना
एक बच्ची का बिगड़ना
आखिर चाहते क्या हो?


बेचैन आत्मा में..
पढ़ लिख कर 
होशियार हो गई थी मेरी बेटी 
नौकरी करने गई थी 
देश की राजधानी में 
पापियों ने 
बलात्कार कर दिया 
मार दिया जान से 
तुम कहते हो 
नहीं होगी सजा 
नाबालिग थे हत्यारे! 
बलात्कार करने वाला बालिग ही हुआ न ? 


रिदम में..
मुझे सुनाई देती हैंआवाज़े
पहाड़ के उस पार की
घाटी में गूंजती सी
मखमली ऊन से हवा
फंदा-दर फंदा
साँस देती हुयी
आवाहन करती हैं
जीने की जदोजहद से निकलने का


कविता रावत में
मैदान  का नजारा देखने के लिए पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है।
परिश्रम में कोई कमी न हो तो कुछ भी कठिन नहीं होता है।।

एक जगह मछली न मिले तो दूसरी जगह ढूँढ़ना पड़ता है।
उद्यम   से   सब   कुछ   प्राप्त   किया   जा   सकता  है।।

और ये रही आज की अंतिम कड़ी

उन्नयन में
तुम बदल न पाये खुद को 
औरों को बार बार कहते हो -
फूटी कौड़ी भी  न दे सके 
जरूरतमंदों को  जनाब 

आज्ञा दें यशोदा को
फिर मिलेंगे..













रविवार, 20 दिसंबर 2015

155...नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे

जय मां हाटेशवरी...
इश्क में पीट के आने के लिए काफी हूँ
मैं निहत्था ही ज़माने  के लिए काफी हूँ
हर हकीकत को मेरी, खाक समझने वाले
मैं तेरी नींद उड़ाने के लिए काफी हूँ
एक अख़बार हूँ, औकात ही क्या मेरी
मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ
सर्दी कुछ अधिक है...
पर सूर्य देव प्रसन्न हैं...
इसी लिये मैं लाया हूं आप के लिये...
पंच-रंगी हलचल....

बुरा भला ब्लॉग पर पढ़ें...
काकोरी काण्ड के स्वतंत्रता सेनानियों का ८८ वां बलिदान दिवस

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दरअसल क्रांतिकारियों ने जो खजाना लूटा उसे जालिम अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के लोगों से ही छीना था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और आजादी के आंदोलन को जारी रखने में करना चाहते थे। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई, जिससे गोरी हुकूमत बुरी तरह तिलमिला उठी। उसने अपना दमन चक्र और भी तेज कर दिया।
अपनों की ही गद्दारी के चलते काकोरी की घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।


Onkar जी को खेद है कि...
मैं बहुत व्यस्त हूँ
ज़िन्दगी भर रहा,
न औरों के लिए,
न अपनों के लिए,
यहाँ तक कि
ख़ुद के लिए भी
वक़्त ही नहीं मिला


नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे

ये गीत गूंज रहा है...उच्चारण:  पर...
नव-वर्ष हमेशा आता है, सुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाई, कितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!
रोटी-रोजी के संकट में, नही गीत-प्रीत के भाते हैं,
कहने को अपने सारे हैं, पर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे



आशुतोष की कलम से हम ये क्या सुन रहे हैं...
बलात्कारी अफरोज की रिहाई और केजरीवाल सरकार का बलात्कार का इनाम
 यदि इस दरिन्दे अफरोज ने खुद के 18 साल से थोडा कम होने के कारण क़ानून का फायदा  उठा के अपनी रिहाई का रास्ता बना लिया है तो क्यों न सरकार इसकी तस्वीर और पहचान सार्वजनिक कर दे जिससे फिर कोई निर्भया अफरोज की हवस और हैवानियत का शिकार न होने पाए..दूसरी ओर सबसे दुखद ये है की अरविन्द केजरीवाल ने अब उस राक्षस को खुला
छोड़ने के साथ साथ उसे 10000 रूपये तथा सभी आवश्यक सहायता देने की घोषणा की है..क्या अफरोज जैसे बलात्कारी को पैसे देकर हमारी बेटियों महिलाओं की सुरक्षा होगी




कैलाश शर्मा जी कहे रहे हैं...
जीवन घट रीत चला
हर पल ऐसे बीता,
जैसे इक युग गुज़रा।
खुशियों का कर वादा,
सपनों ने आज छला।
कण कण है शून्य आज,
हर कोना है उदास।
जीवन में अँधियारा,
आयेगा न अब उजास





आज की हलचल तो यहीं तक...
पर मिलते रहेंगे...
धन्यवाद।


शनिवार, 19 दिसंबर 2015

आस पास की खबरें



सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

ईक लम्हें के लिये रुका तू भी नहीं मैं भी नहीं।
चाहते दोनों बहुत एक दूसरे को हैं।
मगर ये हकीकत है कि
मानता तू भी नही मैं भी नही॥-


रामदेवसिंह बालेसर


जुस्तुजू ही जुस्तुजू है,  उफनते थर्राते सवाल
राह में टकरा गया मुस्कुराता जवाब देखा है
वक़्त के साथ साथ  ज़माने को, होते बे नक़ाब देखा है

किसी पत्थर में नहीं न किसी ताबीज़ में
अपने अंदर झाँककर रहीम -ओ-राम आज देखा है

Raahi


जितनी  योग्यता  बढ्ती  चले  ,
सफलता  की मंजिल  उतनी  ही   प्राप्त  करता  चले  ,
 रास्ता  सबके  लिए  खुला  है  ,  उस  पर  चलकर  कितना
 पार  कर  सकता  है  ,  यह  व्यक्ति  की  अपनी  लगन ,
साहस  और  विश्वास  पर  निर्भर  है

Anjali


नाग व्यापम का अपना कसे पाश है
बेईमानों की सत्ता बनी खास है
ऐसे में न्याय की ना कहीं आश है
आ गये अच्छे दिन आ गये
सच्चे दिन मैं नहीं मानता ।
 मैं नहीं मानता।

amrnath


जीवन  की परिपूर्णता उपलब्धियों पर निर्भर नहीं करती
बल्कि इस बात में है कि उसे सही तरह से जियें।
या वैसे जियें जैसे हमने हमेशा सोचा था।
हम सब इन बंधनों में स्वयं बंधते हैं और फिर खुद को घिरा हुआ महसूस करते हैं।
और एक दिन हम स्वयं से ही बहुत दूर हो जाते हैं
और चाह कर भी जीवन को अपने हिसाब से जी नही पाते

Bhawna


रात की रानी सी ख़ुशबू  शाम के ढलने के बाद
मेरी ज़ुल्फ़ों से उड़ी तो चाँद पागल हो गया

रूठ कर बादल चले हैं रूठ कर तारे चले
रूठ कर बदली चली तो चाँद पागल हो गया

Anita


आस पास की खबरें
आदत बनकर उत्तेजना में
किसी की भी जान ले सकती हैं। ....
चालीस फोटो के साथ चार पृष्ठों में
पति की तारीफ़ से भरा पत्र
जब एक पत्नी से शेयर कर दिया

Kanchan



तन्हा अजमेरी

फिर मिलेंगे ...... तब तक के लिए

आखरी सलाम



विभा रानी श्रीवास्तव

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