
जय मां हाटेशवरी........
इस बार दिवाली के आगमन पर मन हर्षित नहीं है....क्योंकि पिताजी के बिना पहली दिवाली है....
मुझे याद है जब बचपन में मैं चंडीगड़ में पढ़ा करता था। दिवाली में हमें दो तीन दिन का अवकाश ही होता था। बस द्वारा 10 से 12 घंटे का लंबा सफर करके पिता जी मुझे लेने अवश्य ही आते थे। वे कहते थे, "दिवाली सब के साथ ही अच्छी लगती है" फिर दिवाली के अगले दिन उन्हे मुझे छोड़ने वोही लंबा सफर झेलना पड़ता था। मुझे याद है, एक बार पिताजी काफी बीमार हो गये थे। मुझे दिवाली पर लेने नहीं आ सके। पर दिवाली से एक दिन पहले मुझे उनकी चिट्ठी व मनी-ऑर्डर मिल गया था। क्या रौनक होती थी उनके साथ दिवाली में।
तुम बिन पिताजी
अब हम कैसे मनाएंगे दिवाली
अपने हाथों से लाई मिठाई
खाने में वो आनंद नहीं आएगा....
पर इस दिवाली पर भी,
हम जलाएंगे दीपक
करेंगे प्रकाश,
तुम्हारे लिये....
हम जानते हैं
तुम्हे अपने घर में
फैला हुआ अंधकार
अच्छा नहीं लगेगा...
हम ये भी जानते हैं
तुम आओगे
किसी न किसी रूप में
हमारे साथ दिवाली मनाने....
ख़ाकी
अफ़सोस कि इस रंग पर ,
रिश्वत ,क्रूरता ,बर्बरता,अमानवीयता,ग़ैर-वाजिब हिंसा ,
विवेकाधिकार का दंभ ,भेदभाव का चश्मा, काला पैसा ,
सत्ता के आगे आत्मसमर्पण ,
पूँजी की चौखट पर तर्पण,
ग़रीब फ़रियादी को दुत्कार ,
आसमां से ऊँचा अहंकार ,
मूल्यों-सिद्धांतों को तिलांजलि !
दे दी शपथ को भी श्रद्धांजलि !!
समझ
-आपके पहले मैं या मेरे पहले आप टिकट कटवाएँगे सासु जी..."
-संग-संग चलेंगे... समय के साथ खाद-पानी-हवा का असर होता है" दोनों की उन्मुक्त हँसी गूंज गई...
एक ख़त
जो तुमने मेरे जन्मदिन पर
बड़े जतन से
खत के साथ भेजी थी .,
उनका सुर्ख रंग
कुछ खो सा गया है
हमारे रिश्ते का रंग भी अब
उन पंखुड़ियों की तरह
कुछ और सा गया है
मुक्तक
कभी क्या सत्य छुपता है, अनर्गल झूठ बकने से।
करोगे दान तो थोड़ा, रुपैया खर्च हो जाता।
मगर लक्ष्मी नहीं जाती, अपितु आनन्द-धन आता।।
बात दिल की हमेशा सुना कीजिए
कब बदल जाए नीयत किसी की यहाँ
हर किसी से न हँस के मिला कीजिए
मैंने अहसास दिल का बयाँ कर दिया
यूँ न हैरत से मुझको तका कीजिए
कौन होगा अब निराला
एक अक्खड़ सादगी थे ।
विषमता के पारखी थे ।।
निगलते तो निगल लो -
कष्ट का सूखा निवाला ।।
कौन होगा अब निराला ?
यह रौशनी का त्यौहार है...
यह रौशनी का त्यौहार है...
दुल्हन सा सजा घर-बाज़ार है
जहां तलक भी नज़र है जाती
दिखता सुंदर प्रकाश ही प्रकाश है
और अंत में....
आज ही जुड़ी हैं श्रीमति श्वेता सिन्हा
हमसे, हमारी सहयोगी चर्चाकार के रूप में
उन्हें फिलहाल छठ पूजा तक कुछ नहीं करना है
सिर्फ हम पर नज़र रखनी है
धन्यवाद।
