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रविवार, 25 मार्च 2018

782....रामनवमी जन्म हुआ था आज भगवान श्रीराम का


सादर अभिवादन
रामनवमी
जन्म हुआ था आज
भगवान श्रीराम का
प्रणाम करते हैं उनको
आप भी करिए न...
बस ...निहारे ही जा रहे हैं...
श्रीराम को

आज की मिली-जुली रचनाएँ....

........
एक अनजानी कशिश
खींचती है अपनी ओर
एकान्त को भर देती है
महकती रोशनी से
और मैं विलीन हो जाती हूँ



कशमकश....पुरुषोत्तम सिन्हा
ये कशमकश का, कौन सा दौर है अन्दर,
देखता हूं तुम्हें, तो आँखे भीग जाती हैं,
सोचता हूं तुम्हें, तो आँखें मचल सी जाती हैं...


विराट....ओंकार केडिया
पेड़ की डालियों के स्टम्प बनाकर
ईंट-पत्थरों की सीमा-रेखा के बीच
वह छोटा-सा लड़का सुबह से शाम तक
रबर की गेंद से क्रिकेट खेलता है.



छोड़ो मोह! यहाँ तो मन को बेकल बनना पड़ता है
मस्तों के मयख़ाने को भी मक़तल बनना पड़ता है

सारे जग की प्यास बुझाना, इतना आसाँ काम है क्या?
पानी को भी भाप में ढलकर बादल बनना पड़ता है


मैं सब चितवन से दूर, श्रांत अपने गह्वर में
मैं विस्मृत था, बेनूर, छिपा इस जग-चर्चर में
जब दहक रही थी अग्नि मृदा में, और पवन में
हो क्षुधा-त्रस्त, मैं धधक रहा था अपने उदर में    
जब बरस रहे थे मेह, भरे उस तिमिर-गगन में


सैकड़ों खानों में जैसे बंट गयी है ज़िन्दगी
साथ रहकर भी लगे है अज़नबी है ज़िन्दगी

झांकता हूँ आईने में जब भी मैं एहसास के
यूँ लगे है मुझको जैसे कि नयी है ज़िन्दगी


My photo
बुआ कहती थीं,
कड़ाके की ठण्ड में जब तक 
हाथ के बुने स्वेटर ना पहनो 
चैन नहीं पड़ता  . . 
जाड़ा सहन नहीं होता ।
हाथ के बुने स्वेटर में 
बुनी होती हैं 
बुनने वाले की भावनाएं ।

बुधवार, 6 सितंबर 2017

782..ऊँगलियों को भींचकर आए थे हम जमीं पर,

६ सितंबर २ ० १ ७ 

ऊँ रवये नमः
मांगल्यं सुप्रभात

लफ़्ज़ ओ मंज़र में मआनी को टटोला न करो
होश वाले हो तो हर बात को समझा न करो

-महमूद अयाज़ 


विचारों को समेटते हुए 
झुक कर उठा लिया है मैंने..
कुछ विचार विमर्श है, कुछ कथाएँ
तनिक व्यंग्य पर बहुत सारी संवेदनाएँ..

चलिए मुख़ातिब होते हैं
 आज के रचनाकारों से जिनके नामों को क्रमानुसार पढें..

नीतू सिंघल जी, रवीन्द्र सिंह यादव जी,   नवीन मणि त्रिपाठी जी, सुशील कुमार जोशी जी,
 ऋता शेखर 'मधु'जी,
पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा जी और दिगम्बर नासवा जी

सुखसाधन कर सम्पदा निसदिन बिनसत जाए || २ || 

शब्द -प्रहार से कभी चेतना भी रोती है।

शब्द दोस्ती-दुश्मनी याद  कराते हैं,
शब्द  ब्रह्माण्ड में  संवाद रचाते हैं।

वस्ल  के एहसास  पर   नज़रें   चुराना  फिर  कहाँ ।।

कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।
पूछता  ही   रह   गया  अगला  तराना  फिर  कहाँ ।।




सीढ़ियों का
जूतों को
अपनाना


अमृता और सरस पूजा की तैयारी में व्यस्त थे|

अचानक सरस को इमर्जेंसी कॉल आ गया | कोई ऊँची इमारत से गिर

 गया था और तुरंत इलाज की जरूरत थी| 
''यार अमृता, जल्दी निकलना पड़ेगा




ऊँगलियों को भींचकर आए थे हम जमीं पर,
बंद थी हथेलियों में कई चाहतें मगर!
घुटन भरे इस माहौल में ऊँगलियां खुलती गईं,
मरती गईं चाहतें, कुंठाएं जन्म लेती रहीं!




अभी निकला है दहशत से शहर सुनसान तो होगा

घुसे आये मेरे घर में चलो तस्लीम है लेकिन 
तलाशी की इजाज़त का कोई फरमान तो होगा


आज बस यहीं तक..

इति शम
धन्यवाद
पम्मी सिंह






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