सादर अभिवादन
रामनवमी
जन्म हुआ था आज
भगवान श्रीराम का
प्रणाम करते हैं उनको
आप भी करिए न...
बस ...निहारे ही जा रहे हैं...
श्रीराम को
आज की मिली-जुली रचनाएँ....
........

एक अनजानी कशिश
खींचती है अपनी ओर
एकान्त को भर देती है
महकती रोशनी से
और मैं विलीन हो जाती हूँ

कशमकश....पुरुषोत्तम सिन्हा
ये कशमकश का, कौन सा दौर है अन्दर,
देखता हूं तुम्हें, तो आँखे भीग जाती हैं,
सोचता हूं तुम्हें, तो आँखें मचल सी जाती हैं...
विराट....ओंकार केडिया
पेड़ की डालियों के स्टम्प बनाकर
ईंट-पत्थरों की सीमा-रेखा के बीच
वह छोटा-सा लड़का सुबह से शाम तक
रबर की गेंद से क्रिकेट खेलता है.

कशमकश....पुरुषोत्तम सिन्हा
ये कशमकश का, कौन सा दौर है अन्दर,
देखता हूं तुम्हें, तो आँखे भीग जाती हैं,
सोचता हूं तुम्हें, तो आँखें मचल सी जाती हैं...
विराट....ओंकार केडिया
पेड़ की डालियों के स्टम्प बनाकर
ईंट-पत्थरों की सीमा-रेखा के बीच
वह छोटा-सा लड़का सुबह से शाम तक
रबर की गेंद से क्रिकेट खेलता है.
छोड़ो मोह! यहाँ तो मन को बेकल बनना पड़ता है
मस्तों के मयख़ाने को भी मक़तल बनना पड़ता है
सारे जग की प्यास बुझाना, इतना आसाँ काम है क्या?
पानी को भी भाप में ढलकर बादल बनना पड़ता है
मैं सब चितवन से दूर, श्रांत अपने गह्वर में
मैं विस्मृत था, बेनूर, छिपा इस जग-चर्चर में
जब दहक रही थी अग्नि मृदा में, और पवन में
हो क्षुधा-त्रस्त, मैं धधक रहा था अपने उदर में
जब बरस रहे थे मेह, भरे उस तिमिर-गगन में

सैकड़ों खानों में जैसे बंट गयी है ज़िन्दगी
साथ रहकर भी लगे है अज़नबी है ज़िन्दगी
झांकता हूँ आईने में जब भी मैं एहसास के
यूँ लगे है मुझको जैसे कि नयी है ज़िन्दगी

बुआ कहती थीं,
कड़ाके की ठण्ड में जब तक
हाथ के बुने स्वेटर ना पहनो
चैन नहीं पड़ता . .
जाड़ा सहन नहीं होता ।
हाथ के बुने स्वेटर में
बुनी होती हैं
बुनने वाले की भावनाएं ।






